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यहाँ जीवन का अंत भी बिकता है

 

जहाँ मैं पढ़ाता हूँ, ठीक उसके बग़ल में एक आर.टी.ओ. कार्यालय है। रोज़ सुबह जब स्कूल पहुँचता हूँ, तो वहाँ खड़ी नई-नई चमचमाती गाड़ियों की लंबी क़तार देखकर मन खिल उठता है। उनका सौंदर्य देखकर ऐसा लगता है मानो विवाह से ठीक पहले सोलह शृंगार में सजी कोई दुलहन सहमी-संयमी, नई ज़िंदगी की शुरूआत के लिए तैयार हो, पर जैसे ही कुछ समय बीतता है, परिस्थितियाँ बदल जाती हैं। वही नई दुलहन जैसे धीरे-धीरे घर की वास्तविकताओं से जूझने लगती है, वैसे ही ये नई गाड़ियाँ भी सड़क पर उतरते ही संघर्षों से भर जाती हैं। कभी तेज़ कट, कभी खरोंच, कभी किसी बाइक वाले से ठिठोली, कहीं तेज़ रफ़्तार का तिरछा कट, तो कहीं किसी बेचारे बाइक वाले को लंगड़ी मार देना। जैसे आजकल एक औरत ही दूसरी औरत की ज़िन्दगी तबाह कर देती हैं। सौंदर्य धीरे-धीरे ज़िम्मेदारियों के बोझ तले दबने लगता है। बाहर से सब चमकता है, पर भीतर से जीवन का संघर्ष शुरू हो जाता है। 

उस दिन मैं कक्षा में बच्चों को प्रकृति का महत्त्व समझा रहा था ताकि वह एक अच्छा अनुच्छेद लिख सकें। आसमान में उड़ते पक्षी और तैरते बादलों को दिखाने के लिए जब मैंने खिड़की की ओर इशारा किया, तो मेरी नज़र अचानक एक अनोखे दृश्य पर ठिठक गई। 

आर.टी.ओ. के ठीक पीछे पुरानी गाड़ियों का एक शांत, उदास ‘शमशान’ पसरा हुआ था। नई गाड़ियाँ सामने क़तार में सजी थीं और पीछे थकी, टूटी, दम तोड़ चुकी गाड़ियाँ एक कोने में यूँ ही पड़ी थीं। जैसे कोरोना काल में गंगा तट पर अंतिम संस्कार की प्रतीक्षा करते शवों की भीड़। 

मैं खिड़की के पास जाकर ठहर गया। उसी समय हल्की हवा चली और उस हवा के माध्यम से मुझे कुछ आवाज़ सुनाई दी, मानो ऐसा लगा जैसे नई और पुरानी गाड़ियाँ आपस में कुछ कह रही हों . . . 

सामने खड़ी एक नई कार डरते हुए पीछे पड़ी एक पुरानी ऑटो से बोली, “दादी . . . तुम यहाँ क्यों पड़ी हो? क्या तुम्हें दर्द हो रहा है?” 

पुरानी ऑटो ने धीमे, टूटे स्वर में कहा, “नहीं बेटी . . . अब दर्द की भी आदत हो गई है। बस इंतज़ार है कि कब कोई मुझे काटकर कबाड़ में बदल दे। मेरा समय पूरा हो चुका है।” 

नई कार सहमकर बोली, “क्या मेरा भी ऐसा ही अंत होगा?” 

पुरानी ऑटो उदास होकर भी मुस्कुराई, “हाँ बच्ची . . . हम सबका अंत एक-सा ही होता है। फ़र्क़ बस इतना है कि कुछ जल्दी पहुँच जाते हैं और कुछ देर से, पर इस माटी में समाहित सभी को होना है।” 

तभी वहाँ उपस्थित दो आदमी उस मरणासन्न ऑटो को गैस और आरी से बेरहमी से काटने लगे। ठीक वैसे ही जैसे मृत जानवर के शरीर को पक्षियों के हवाले कर दिया जाता है। यहाँ भी ऑटो का हर हिस्सा नोचा जा रहा था ताकि कबाड़ बेचकर पेट की आग बुझाई जा सके। मेरे मन ने कहा कि त्याग और समर्पण का इससे बेहतर उदाहरण नहीं हो सकता। 

एक आदमी उसके तारों को बर्बरता से खींच रहा था, दूसरा लोहे की चादर को हथौड़े से पीट-पीट कर सीधा कर रहा था। ऑटो की शक्ल धीरे-धीरे मिट रही थी। जैसे किसी प्राणी की त्वचा उतारी जा रही हो। लोहे की चादर हटने के बाद अब उसके ढाँचे की हड्डियाँ ही बची थीं। पीछे सीट के नीचे एक सिलेंडर था, जिसे आदमी पूरी ताक़त लगाकर बाहर निकालने की जद्दोजेहद कर रहा था। 

जब सिलेंडर अलग हो गया, तो गैस की नीली लौ से उसके ढाँचे को काटकर टुकड़े-टुकड़े किया जा रहा था। मुश्किल से आधे घंटे में दोनों ने उस ऑटो का पूरा अस्तित्व ही समाप्त कर दिया। जैसे कसाई कुछ ही मिनटों में एक पूरे बकरे का वुजूद मिटा देता है। 

और फिर . . . मेरी नज़र सामने खड़ी नई-नई गाड़ियों पर गई। वे मानो इस दृश्य को देखकर सहमी हुई खड़ी थीं। जैसे कसाईखाने में बँधे बकरे अपने साथी की दुर्दशा देखकर काँप उठते हैं। नई गाड़ियाँ शायद एक-दूसरे से कह रही थीं, “रजिस्ट्रेशन मिलते ही हम अपना जीवन शुरू कर देंगे, लोगों को उनकी मंज़िल तक पहुँचाते रहेंगे . . . पर एक दिन हमारा भी अंत आएगा। हमारे स्थान पर कोई नई गाड़ी ऐसे ही खड़ी होगी और हम पीछे वाले मैदान में बेरहमी से काटे जाएँगे . . .” 

तभी एक नई ऑटो ने काँपते हुए कहा, “बहन . . . यह कैसा संसार है? हम, लोगों को मंज़िल तक पहुँचाते हैं और अंत में हमारा यह हाल?” 

दूसरी नई ऑटो ने जवाब दिया, “डर मत। जब तक हमारी साँसें, मतलब पेट्रोल या बैटरी, चलती रहेंगी, हम जनसेवा करेंगे। पर हाँ . . . एक दिन हमारी जगह कोई और ले लेगा . . . और हम भी इसी पिछवाड़े वाले मैदान में कतरे जाएँगे। यही विधि का विधान है। पुराने जाएँगे और नए आएँगे” 

दोनों नई गाड़ियाँ थोड़ी देर चुप रहीं, मानो अपनी ही मृत्यु को पहले से देख रही हों। 

अचानक पीछे से एक बच्चे की आवाज़ आई, “सर . . . अनुच्छेद लिखकर हो गया।” 

मैं चौंककर खिड़की से हट गया। बाहर की दुनिया से लौटकर फिर कक्षा के बीच खड़ा हो गया। बच्चे उत्सुकता से मुझे देख रहे थे। तभी एक जिज्ञासु छात्र ने पूछ लिया, “सर, आप किस कहानी में खो गए थे?” 

मैं मुस्कराया और कहा, “बेटा, वह कहानी जो हमारे आसपास हर दिन घटती है, पर हम उसे देखने की फ़ुर्सत नहीं निकालते। जीवितों और निर्जीवों की व्यथा, जन्म और मृत्यु की समानता, और मनुष्य के बढ़ते स्वार्थ की कहानी, बस इन्हीं सब के बारे में सोच रहा था।” 

घंटी बज गई। मैं कक्षा से बाहर निकला, लेकिन मन के भीतर केवल एक प्रश्न गूँजता रहा, “क्या मनुष्य सचमुच मनुष्य रह गया है, या स्वार्थ और लालच ने उसे एक असंवेदनशील पशु में बदल दिया है?” 

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