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ओ माँ, तुम क्यों रूठ गई


ओ माँ, तुम क्यों रूठ गई। 
क्यों दुनिया छोड़ गई॥
अभी तेरी-मेरी उम्र ही थी क्या? 
न तुम्हारी जाने की न मेरी सहने की, 
घर-आँगन की शोभा थी, अभी बाक़ी
नन्ही उँगलियों को थी, अभी ज़रूरत
मोती के दाँतों से अभी फूटे थे, शब्द
आँखों में चित्र भी नहीं खींचे थे, पूरे
पालन-पोषण था, अभी उनका बाक़ी
 
ओ माँ, तुम क्यों रूठ गई। 
क्यों दुनिया छोड़ गई॥
अभी मेरी भी सेवा थी बाक़ी
सोचा था अभी जल्दी भी क्या है
बुढ़ापे की लकड़ी बन जाऊँगा तेरी
पर परमात्मा ने तेरे-मेरे संग छल किया 
वो पुण्य भी मुझसे छीन लिया
लगता है उन्हें भी तेरा वात्सल्य भा गया
ममतामयी तू थी ही कुछ ऐसी
 
ओ माँ, तुम क्यों रूठ गई। 
क्यों दुनिया छोड़ गई॥
दो दिवस में क्यों बदल गया इतिहास
तेरी आँखों में देखा था, उस दिन मैंने
तुझे नहीं थी अभी जल्दी, थी लाचारी
कैसे सहन की थी तुम न जाने की चाह? 
इच्छा न होने पर भी पड़ा था, जाना
जब थी तुम बैठी, भाँप लिया था, मैंने
उसके आगे ना वश था, कोई तेरा
 
ओ माँ, तुम क्यों रूठ गई। 
क्यों दुनिया छोड़ गई॥
तेरी कमी अब भी है खल रही
हृदय की पीड़ा अब भी है दहक रही
सफ़ेद कपड़े में लिपटा तेरा तन
आज भी आँखों में है तैर जाता
माना कि दुनिया की रीत है
पर समय कहाँ उचित था
अभी तो सपने थे, सब बाक़ी
ओ माँ, तुम क्यों रूठ गई। 
क्यों दुनिया छोड़ गई॥

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