जब तक अपने लौटते हैं
काव्य साहित्य | कविता शक्ति सिंह15 Mar 2026 (अंक: 294, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
घर के बाहर खड़ा वह बूढ़ा नीम,
अब भी पहरा देता है चुपचाप,
उसकी पत्तियों की सरसराहट में
सुनाई देती है, बीते वर्षों की याद।
पीले पत्ते जब झर-झर गिरते हैं,
मानो स्मृतियाँ धरती पर उतर आती हों,
और कोई अपना झाड़ू लेकर
छत और आँगन को फिर से चमका देता है।
छत की सफ़ाई में उड़ती धूल भी
आज त्योहार-सी लगती है,
हर कोना जैसे कह उठता है—
“मेरी पहचान अब भी बाक़ी है।”
आँगन का चूल्हा, जो बरसों से
धीमी राख तले सोया था,
आज फिर अपनों के स्पर्श से
गर्म होकर सिसक कर जागा था।
घर की पुरानी चौकी भी
चरमराकर मुस्कुरा देती है,
जब वही बच्चे, पचास बरस पहले वाले
अब बूढ़े होकर उस पर बैठते हैं।
कितना अजीब है, समय का चक्र,
जो कभी इस घर में किलकारियाँ भरते थे,
आज सफ़ेद बालों और थकी आँखों संग,
उसी देहरी और झरोखे पर फिर नए रंग चढ़ाते हैं।
जब तक ये लौटने वाले लोग हैं,
तब तक यह घर भी साँस लेता है,
दीवारें चमकती हैं,
दरवाज़े उम्मीद से खुलते हैं।
पर जिस दिन ये पीढ़ी
सचमुच चली जाएगी,
उस दिन यह घर,
सिर्फ़ ईंट और मिट्टी में बदल जाएगा।
नीम की छाँव लंबी तो होगी,
पर उसके नीचे कोई अपना न होगा।
चूल्हा फिर राख हो जाएगा,
चौकी फिर चुपचाप पड़ी रहेगी।
तब यह घर,
हर शाम ढलते सूरज के साथ
अपने अंत की एक-एक घड़ी गिनेगा।
क्योंकि घर दीवारों से नहीं,
लौट आने वाले क़दमों से जीवित रहता है।
और जब क़दम रुक जाते हैं,
तो घर भी धीरे-धीरे
खंडहर बन जाता है . . .
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