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कौन बचाएगा हमको? 

 

कौन बचाएगा हमको? 
अब न सालिम अली हैं
और न चौधरी चरण सिंह। 
‘अब एक पेड़ धरती के नाम’ कहकर, 
अरावली का ठेका देने वाले हैं। 
 
कौन बचाएगा हमको? 
क़िस्सा केवल अरावली का नहीं है, 
क़िस्सा संसार के समस्त बंधुओं का है। 
अब कौन चिपकेगा मुझसे? 
जो चिपको आंदोलन चलाएगा। 
 
कौन बचाएगा हमको? 
कब तक विलुप्त पक्षियों के नाम, 
तुम यूँ ही गिनते जाओगे? 
सारस, गौरैया, फ्लोरिकन, कठफोड़वा
सब तुम्हारे स्वार्थ का ही परिणाम है। 
 
कौन बचाएगा हमको? 
ताल-तलैया, पोखर सूख गए, 
सूख गया मानव का मन। 
विकास के अंधे मोह में, 
सागर तक पर हुआ अतिक्रमण। 
 
कौन बचाएगा हमको? 
गाँव उजाड़े, जंगल काटे, 
पहाड़ों को टुकड़ों में बाँटा। 
माटी का कण-कण लूट लिया, 
कहते हो—“अब नया युग आया!” 
 
कौन बचाएगा हमको? 
अपने ही हाथों चिता सजाओगे, 
अपने बच्चों को रुलाओगे। 
भूकंप, सुनामी, सूखे का मंज़र
अपनी आँखों से देखोगे। 
अपने ही लालच के कारण
एक दिन स्वयं पछताओगे। 
 
अब कौन बचाएगा हमको? 
यह करुण पुकार है प्रकृति की, 
यह वेदना धरती-माता की है। 
यदि अब भी तुम नहीं जागोगे, 
तो रक्षा किसकी, किससे होगी? 
तब तड़प-तड़प कर पूछोगे—
‘कौन बचाएगा हमको?” 
और उस क्षण मैं भी मौन रहूँगी, 
कुछ भी न कर पाऊँगी। 

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