माटी
काव्य साहित्य | कविता शक्ति सिंह ‘अनमोल’1 Feb 2026 (अंक: 293, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
माटी से जुड़ जा मानव,
माटी का यह तन है।
माटी में जन्मे थे,
माटी में कर्मे थे।
घाव लगे जब बचपन में,
माँ ने माटी लगाई थी।
माटी के चूल्हे पर,
माँ ने रोटी बनाई थी।
अन्नदाता के श्रम से,
माटी में उपजा अन्न।
श्रमजीवियों के बल से,
माटी से हुए सबल।
माँ की ममता को माटी न करना,
सुन लो ओ माटी के लाल।
बिन माटी के अन्न नहीं है,
बिन माटी वुजूद नहीं है।
सब कुछ है माटी से,
घर भी बना माटी से,
उसकी लिपाई भी माटी से,
बचपन का खेल भी माटी से,
दूर हुए माटी से भले,
पर मन में अब भी माटी है।
वृद्ध हुए भले ही,
पर माटी से फिर जुड़ना है।
चल लौट चलें उस माटी में,
जहाँ से जीवन आया।
माँ की ममता और माटी ने,
हमें मनुष्य बनाया।
माँ की ममता को माटी ना करना,
सुन लो ओ माटी के लाल।
माँ की ममता को माटी ना करना,
सुन लो ओ माटी के लाल।
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Jagriti Verma 2026/06/14 02:17 PM
अप्रतिम रचना ।