बाबू जी: एक स्वर्णिम संकल्प
काव्य साहित्य | कविता शक्ति सिंह ‘अनमोल’1 Jul 2026 (अंक: 300, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
जग में आया हूँ, तो व्यर्थ नहीं जाऊँगा,
अपने जीवन को किसी उद्देश्य से सजाऊँगा।
लाखों अधूरे सपनों को एक नया आकार दूँगा,
आशा की किरण बनकर हर अँधियारा दूर करूँगा।
समाज की नींव में संस्कारों की गहराई भर जाऊँगा,
मानवता के पथ पर चलकर मानव बनाऊँगा।
नई सभ्यता का सुंदर पुष्प संस्कारों में खिलाऊँगा,
प्रेम, करुणा और सद्भाव का संदेश घर-घर पहुँचाऊँगा।
साथ मिला, तो हर रजकण को चमन तक ले जाऊँगा,
टूटे हुए विश्वासों को फिर से जोड़ जाऊँगा।
हर हृदय में विश्वास और आत्मबल की ज्योति जलाऊँगा,
अपने कर्मों से जीवन को सार्थक बनाऊँगा।
आर्यपुत्रों के सपनों को पंख देकर असीम उड़ान दूँगा,
युवा शक्ति के संकल्पों को नई पहचान दूँगा।
मन पवित्र हो, कर्म परोपकारी हों, यह संदेश दूँगा,
ज्ञान, तप, संस्कृति और स्नेह का अमृत बाँटूँगा।
शिक्षित देश और संपन्न समाज का स्वप्न सजाऊँगा,
हर चेहरे पर मुस्कान का दीप जलाऊँगा।
संस्कृति की गौरवगाथा को पीढ़ी-दर-पीढ़ी पहुँचाऊँगा,
संस्कारों की अमर ज्योति हर हृदय में जगाऊँगा।
हर क़दम से क़दम मिलाकर एकता का गीत सुनाऊँगा,
भेदभाव की दीवारों को प्रेम से मिटाऊँगा।
जहाँ सत्य और संस्कारों का सदैव मान रहेगा।
वहीं राष्ट्र प्रगति के पथ पर अग्रसर रहेगा।
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