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जब ऋतुएँ रूठने लगीं

 

एक समय की बात है। धरती पर एक बहुत ही ख़ुशहाल और सुंदर देश था। वहाँ सभी ऋतुएँ समयानुसार बारी-बारी से आती थीं और सभी प्राणियों के जीवन को ख़ुशियों से भर देती थीं। वर्षा उतनी ही होती थी, जितनी किसानों के खेतों तथा नदियों, तालाबों, कुओं और बावड़ियों को आवश्यकता होती थी। ठंड उतनी ही पड़ती थी, जितनी मनुष्य, पशु-पक्षी और पेड़-पौधे सहन कर सकें तथा वर्षा का पानी बर्फ़ बनकर गर्मियों में सभी की प्यास बुझाने में सहायक हो सके। गर्मी भी उतनी ही पड़ती थी, जितनी गेहूँ और सरसों को पकने के लिए आवश्यक होती थी तथा हर प्राणी के शरीर में ऊर्जा का संचार कर सके।

इस प्रकार उस देश के राजा को किसी भी प्रकार की चिंता नहीं थी। वहाँ न किसी प्रकार का कर था और न ही कोई जीएसटी। जनता जो कमाती थी, वह सीधे उसके घर तक पहुँच जाता था। राजा के बाद उनका बेटा और उसके बाद उनका पोता भी नागरिकों की भलाई के लिए जितने भी समाज-सेवा के कार्य हो सकते थे, वे सब करते रहें और वह देश सुख-समृद्धि के उच्च शिखर की ओर बढ़ता रहा।

तभी राजा का पोता अर्थात् वर्तमान राजा ने कुछ वर्षों से आबोहवा में परिवर्तन महसूस किया। यह बात उसके मन में खटकने लगी। इससे चिंतित होकर राजा ने देश के बड़े-बड़े पर्यावरण विशेषज्ञों को बुलाया। चूँकि राजा जागरूक थे और सभी प्राणियों तथा ऋतुओं को बारीक़ी से समझते थे इसलिए बदलती आबोहवा पर तत्काल बैठक बुलाई गई।

राजा ने पर्यावरण विशेषज्ञों के समक्ष कहना शुरू किया, “आप सभी को यहाँ बुलाने का कारण यह है कि कुछ वर्षों से देश की आबोहवा में परिवर्तन देखा जा रहा है। न जाने ऐसा क्या हुआ कि गर्मी विकराल होने लगी है। वर्षा ने भी अपना स्वाभाविक रूप त्याग दिया है और पानी के लिए किसान तथा अन्य सभी प्राणियों की बेचैनी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है।”

यह सुनकर वहाँ उपस्थित सभी विद्वानों ने कहा, “महाराज, आपका अनुभव निराधार नहीं है। हमने आपके पिताजी के राज्यकाल को भी देखा है। उस समय आबोहवा में इस प्रकार का परिवर्तन कभी नहीं देखा गया था।”

एक बहुत ही बुज़ुर्ग विद्वान ने कहा, “आपके दादाजी के समय में धूप उतनी ही होती थी, जितनी धरती को आवश्यकता होती थी; परन्तु अब धूप मानो ऐसे निकलती है, जैसे वह संसार के सभी प्राणियों से बैर-भाव रखती हो और सब कुछ जलाकर नष्ट कर देना चाहती हो।”

तभी एक पक्षी-प्रेमी विद्वान ने कहा, “महाराज, गर्मी से बेहाल पक्षियों की स्थिति ऐसी हो गई है कि वे यहाँ-वहाँ मृत अवस्था में पड़े मिलते हैं क्योंकि गर्मी के कारण दूर-दूर तक पेड़-पौधे सूख गए हैं। उनके रहने और छाया पाने के स्थानों पर अब कंक्रीट के ऊँचे-ऊँचे भवन बन गए हैं, जो अपने भीतर से गर्मी बाहर छोड़ते रहते हैं। ऐसे में बेचारे पक्षी जाएँ तो कहाँ जाएँ?”

एक पशु-प्रेमी विदुषी ने कहा, “महाराज, देश के अधिकांश कुएँ, तालाब और नदियाँ सूखते जा रहे हैं, जिसके कारण किसानों और पशुओं के जीवन-यापन की समस्या विकट होती जा रही है। गर्मी के कारण खेतों की फ़सलें पुष्प और फल आने से पहले ही नष्ट हो रही हैं।”

यह सब सुनकर राजा की चिंता सातवें आसमान पर पहुँच गई क्योंकि यदि इसी प्रकार मौसम परिवर्तित होता रहा, तो धरती पर जीवन संकट में पड़ जाएगा। उन्होंने तुरंत इसके कारणों का पता लगाने और उन्हें समझने का निर्देश दिया।

पूरे देश में विद्वानों ने अपने-अपने गुप्तचरों को भेज दिया, क्योंकि प्रश्न देश की ख़ुशहाली और समृद्धि का था। जानकारियाँ एकत्रित होती रहीं और रिपोर्ट विस्तृत होती गई। रिपोर्ट तैयार करते समय कई पीढ़ियों के शासनकाल का गहन अध्ययन किया गया। लगभग एक वर्ष के बाद राजा के समक्ष समस्या का मूल कारण प्रस्तुत किया गया।

रिपोर्ट में लिखा था:

“महाराज, आपके दादाजी के समय तक आबोहवा बहुत अच्छी थी; लेकिन जब आपके पिताजी गद्दी पर बैठे, तब जनसंख्या तेज़ी से बढ़ रही थी और लोग पेड़-पौधों और वनों को काट-काट कर नई-नई बस्तियाँ बनाने में इतने स्वार्थी हो गए कि उन्हें वनों की पीड़ा न दिखी। साथ ही साथ वैज्ञानिकों ने अनेक नई-नई वस्तुओं का आविष्कार किया, जिनमें सबसे अधिक प्रभाव डालने वाली वस्तुएँ वातानुकूलक और मोटर-गाड़ियाँ थीं। उस समय कुछ पर्यावरण विशेषज्ञों ने महाराज को इनके दुष्परिणामों के बारे में सावधान करने का प्रयास किया था, परन्तु महाराज ने इसे देश की तरक़्क़ी मानते हुए इसकी अनुमति दे दी थी। जैसे-जैसे गाड़ियों की संख्या बढ़ती गई, वैसे-वैसे उनके ज़हरीले धुएँ वातावरण में फैलते गए और गर्मी बढ़ती गई। ऐसे में सबसे पहले अमीर लोगों ने अपने घरों, कार्यालयों और गाड़ियों में वातानुकूलक लगवाने शुरू किए।”

विदुषी ने कहा, “प्रगति वह नहीं, जो प्रकृति के विनाश का कारण बने, बल्कि प्रगति वह है, जो मनुष्य और प्रकृति दोनों का सृजन करे।”

एक विद्वान ने रिपोर्ट में लिखा था:

“महाराज, इन वातानुकूलकों में एक बड़ा पंखा होता है, जो घरों के बाहर लगा रहता है और अंदर की गर्मी को बाहर फेंककर भीतर ठंडक बनाए रखता है। उस पंखे से निकलने वाली गर्मी वातावरण में जाकर मौसम को प्रभावित करती है। अमीरों की हर वस्तु को मध्यम वर्ग के लोग अपनाने का प्रयास करते हैं। यही कारण है कि वर्तमान में देश के अधिकांश अमीर और मध्यम वर्ग के घरों में वातानुकूलक मशीनें लग चुकी हैं। अब इन लाखों-करोड़ों वातानुकूलकों से निकलने वाली गर्मी हमारे वातावरण को इतना प्रभावित कर रही है कि ग़रीबों और अन्य प्राणियों के लिए धरती पर जीवन कठिन होता जा रहा है। जिनके पास धन है, वे अपने आपको सुरक्षित रखने के लिए वातानुकूलकों का उपयोग कर रहे हैं; लेकिन वे यह भूल रहे हैं कि यदि यही स्थिति बनी रही, तो वह दिन दूर नहीं जब धरती पर न पानी बचेगा, न पेड़-पौधे और न ही कोई प्राणी सहज रूप से साँस ले सकेगा।”

रिपोर्ट में प्रस्तुत तथ्यों को सुनकर महाराज के पैरों तले ज़मीन खिसक गई, किन्तु उन्होंने समस्या को संकट नहीं, बल्कि सुधार का अवसर माना। इसलिए उन्होंने सभी विद्वानों और पर्यावरण विशेषज्ञों की सहमति से यह निर्णय सुनाया कि देश में अंधाधुंध विकास के स्थान पर संतुलित और प्रकृति-अनुकूल विकास को बढ़ावा दिया जाएगा। बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण अभियान चलाया जाएगा। प्रत्येक नगर और गाँव में वर्षा जल-संचयन की व्यवस्था अनिवार्य की जाएगी तथा नदियों, तालाबों और अन्य जलस्रोतों के संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी। स्वच्छ ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा दिया जाएगा और सार्वजनिक परिवहन को सशक्त बनाया जाएगा तथा अनावश्यक ऊर्जा खपत को कम करने के लिए लोगों को जागरूक किया जाएगा। साथ ही, प्रत्येक नागरिक के लिए एक पेड़ लगाना और उसकी देखभाल करना नैतिक कर्त्तव्य घोषित किया गया। कुछ समय बाद जब मौसम सामान्य होने लगेगा, तब वातानुकूलकों के उपयोग पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगा दिया जाएगा।

महाराज ने कहा, “प्रकृति हमारी संपत्ति नहीं, हमारी धरोहर है। यदि हमने समय रहते ध्यान नहीं दिया, तो हमें हाथ मलते रह जाना पड़ेगा। यदि हम इसे सुरक्षित रखेंगे, तभी आने वाली पीढ़ियाँ सुरक्षित और समृद्ध जीवन जी सकेंगी।”

राजा की दूरदर्शिता, जनता के सहयोग और वैज्ञानिक उपायों के परिणामस्वरूप कुछ ही वर्षों में वातावरण में सकारात्मक परिवर्तन दिखाई देने लगा। धरती फिर से हरी-भरी होने लगी, जलस्रोत लबालब भरने लगे और पशु-पक्षी तथा मनुष्य एक बार फिर सुख और संतुलन के साथ जीवन जीने लगे और लोगों के चेहरों पर फिर से रौनक़ लौट आई। 

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