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पोस्ट क्वारेंटाइन 

मूल कहानी (अँग्रेज़ी): डॉ. नंदिनी साहू 
अनुवाद: दिनेश कुमार माली 

क्वारेंटाइन से आगे

 

मैं हूँ जयंत, मुझे कभी-कभी वह ‘जॉय’ से संबोधित करती थी। 

जोयिता का जयंत, मगर अभी नहीं रहा मैं जोयिता का जयंत। 

कोविड-19 का संक्रमण समाप्त होने के पाँच साल बाद यानि वर्ष 2025 के जनवरी माह में देश के व्यस्ततम महानगर नई दिल्ली के हाड़कंपाती सर्दी में, मैं बैंच पर बैठा हुआ था, जोयिता के आलीशान बंगले के लोहे के गेट के पास। मेरी जोई का नया मकान था यह। 

सन् 2020 तक, जब मैं उसे ‘जोई‘ कहकर बुलाता था, उसे बहुत अच्छा लगता था। उस समय हम मुंबई में रहते थे। मैं अपने मोबाइल पर उसका अंतिम मेल देख रहा था, वास्तव में विगत कुछ दिनों से मैं उसे कई बार देख चुका था। 

"जॉय, मेरे प्यार, मेरे जाने का समय आ गया है। मैं और ज़्यादा तुम्हारे जीवन में तकलीफ़ देना नहीं चाहती।  मैं कल सुबह यह शहर छोड़कर दिल्ली जा रही हूँ, जबकि मैंने अपने जीवन में यह कभी सोचा तक नहीं था कि एक दिन मुझे मुंबई जैसी स्वप्न नगरी को भी छोड़कर जाना होगा। जाने से पूर्व, मैं 13 जून 2020, आज के दिन, की बात दोहराना चाहूँगी कि मैंने कभी नहीं चाहा कि तुम अपने बुज़ुर्ग माता-पिता को छोड़कर मेरे साथ चलो, क्योंकि उनकी देखभाल करना तो तुम्हारी ज़िम्मेदारी है। अगर तुम उन्हें छोड़कर चले जाओगे तो उनकी देखभाल कौन करेगा? मैं अपने घर में तुम्हारे लिए एक जगह रखना चाहती थी, जिसे हम अपना ‘घर‘ कह सकें, जिस कमरे में बिस्तर, भोजन, आराम, प्रेम और तुम्हारी व्यस्तता के लिए हमारा बिज़नेस हो – जिसे मैं विगत कई सालों से गंभीरतापूर्वक कर रही हूँ। मैं उसे हमेशा जारी रखना चाहती थी। यह दूसरी बात है कि मैं तुम्हारी माँ के अधिकार जताने और तुम्हारी ज़िंदगी में हस्तक्षेप करने वाली आदत को अच्छा नहीं मानती थी। लेकिन आज मैं, अगर चाहो तो, स्टांप-पेपर पर लिखकर दे सकती हूँ कि मैं तुम्हें अपने बुज़ुर्ग बीमार माँ-बाप से दूर नहीं करना चाहती थी। मैं परिवार का ध्यान रखने वाली महिला हूँ, मैं संबंधों की इज़्ज़त करती हूँ। कृपया उनके साथ हमेशा रहो और उनका ध्यान रखो। 

बाद में हमारे साथ जो कुछ हुआ और ख़ासकर पिछले दो-तीन दिनों में, हम दोनों के लिए बहुत ही ख़राब था। शर्मनाक और डरावना भी। इस घटना के बाद, इस शहर में तुम्हारी पड़ोसी बनकर रहना मेरे लिए संभव नहीं था। मैं हमेशा से तुम्हें कहती आई हूँ कि किसी से भी अपना संपर्क समाप्त करने से पूर्व सही ढंग से ‘गुड बाय‘ कहना चाहिए। जॉय, गुडबाय। जहाँ भी मैं जाऊँगी, तुम्हारे लिए एक कमरा रखूँगी, जहाँ तुम्हारे लिए प्यार रखा होगा, इस अंतराल को कोई नहीं पाट सकता। इस दूरी की वज़ह से पैदा हो रहे निर्वात को कोई नहीं भर सकता, कभी भी नहीं। मेरे जीवन में यह तुम्हारा हिस्सा है। सच में, मैं तुम्हें कुछ ज़्यादा नहीं दे सकी सिवाय प्रेम, सम्मान, आराम, देखभाल और ‘तुम्हारा अपना रूम’- जिसे मैं घर कहती हूँ।”

मैंने यह मेल पढ़ा, बार-बार पढ़ा, कँपकँपाते हुए और दाँत भींचते हुए। ओह! दिल्ली वाले लोग इतनी ज़्यादा सर्दी को कैसे बर्दाश्त करते हैं? हमारे जैसे मुंबई वासियों के लिए तो यहाँ साँस लेना भी दूभर लगता है। जोई ने इस नगर को, पाँच साल पहले कैसे अपनाया होगा, जब उसने टूटे दिल के साथ मुंबई छोड़ा था? और मैंने कभी इन पाँच सालों में मिलने की कोशिश तक नहीं की। कैसे उसने ‘कोविड‘ ख़त्म होने के बाद इस नई नगरी में अकेले जीवन जीना शुरू किया होगा? क्या समय ने मेरी ‘जोई‘ के घावों को भर दिया होगा? किस तरह वह हमारी अवशिष्ट अधूरी कहानी की भरपाई कर रही होगी? हमारा अपूर्व व्यापार?

हाँ, वह हमेशा से शक्तिशाली महिला रही है, जिसे हर कोई, ‘बोल्ड एँड ब्यूटीफुल‘ कहता था। आज वह वरिष्ठ भारतीय प्रशासनिक अधिकारी है, भारत सरकार की कैबिनेट सक्रेटरी, प्रधानमंत्री और अन्य मंत्रियों के बंगलों के पास जनपथ पर उसका भी आलीशान बंगला है और उसके घर के सामने चमकती हुई मर्सिडीज़-बेंज़ एस-क्लास कार और वर्दीधारी सुरक्षा प्रहरीगण। क्या ये गार्ड मुझे अंदर जाने देंगे? बिना किसी एपाइंटमेंट लिए? पहले से ही एक बंदूकधारी गार्ड मेरी तरफ़ संदेह भरी निगाहों से घूर-घूरकर देख रहा है। जन्मजात अंधा पैदा होना कोई अपराध नहीं है, मगर आँखें अंधी करना? प्रत्येक व्यक्ति एक प्रायद्वीप की तरह है, जिसके चारों तरफ़ गरजते महासागर का शोर, जो समय उफनती लहरों को पकड़कर रखना चाहता है और अपना सिर हवा में रखना चाहता है-कभी दबकर तो, कभी चढ़कर। मगर किसी को भी यह पता नहीं रहता है कि आस-पास की नीरवता और शांति के पीछे कितना दुख-दर्द और दुर्भाग्य की उठा-पटक छिपी रहती है। बाहरी ख़तरों से ज़्यादा, आंतरिक व्यग्रता और तनाव, जिससे मनुष्य अपना युद्ध हार जाता है। मैंने भी अपनी ‘जोई‘ को ऐसे ही खोया। 

मगर उसके होठों पर दिखने वाली ज़िंदादिली मुसकान के पीछे इतनी दीर्घ नीरवता छुपी होगी– पता नहीं था। पाँच वर्षों की नीरवता। 

बँगले के अंतिम कक्ष में रोशनी देखकर, मैं अनुमान लगा रहा था कि हो न हो, वह उसका शयन-कक्ष होगा, जहाँ वह विश्राम कर रही होगी। इसके अतिरिक्त, दिल्ली में सर्दी की रातों में लोग क्या कर सकते हैं? सड़क पर खड़े होकर मैं भवन की ओर ताक रहा था, काँपते हुए, पश्चाताप की अग्नि में जलते हुए, जोई को देखने की उत्कट इच्छा लिए, कम से कम एक बार तो वह दिख जाए!

******

फरवरी 2020 की ऐसी ही ठंडी रात में, मुंबई में, मेरे भाई आदर्श की पत्नी शीला को अस्पताल अकेले भेज दिया गया था, जब वह कोविड-19 की जाँच में पोज़ीटिव निकली थी। यह तो उसकी क़िस्मत अच्छी है कि लंबी बीमारी के बाद वही ठीक हो गई थी। ऐसा कहीं न हो जाए कि उसकी वज़ह से हम संक्रमित हो जाएँ, इसलिए उसने अपने माता-पिता से कुछ समय के लिए अपने घर रखने के लिए कहा था। शीला को मध्य मार्च तक धारावी में अपने घर वालों के साथ एक रूप में ‘होम क्वारेंटीन‘ रहना पड़ा था। शीला के इलाज के दौरान और उसके बाद भी आदर्श उसके संपर्क में था और मार्च आधा बीतते-बीतते शीला घर के काम-काज करने लायक़ स्वस्थ हो गई थी। माँ ने उसे फिर बुला लिया था,क्योंकि घर में नौकरानी नहीं रखी गई थी और माँ के लिए घर में झाड़ू-पोंछा करना और खाना बनाना संभव नहीं था। 

शीला कोविड-19 के इलाज के बाद सहज नहीं हो पाई थी। उसे अकेली अस्पताल भेजने के कारण अच्छा नहीं लग रहा था और उसके बाद उसे अपने ननिहाल, होम क्वारेंटीन के लिए भेज दिया गया था। हम सभी को थोड़ी ग्लानि अनुभव हो रही थी, इसलिए उसके घर आने पर अच्छा बर्ताव करने की कोशिश कर रहे थे। हम सभी ‘बबल एपीसोड‘ को भूलने की कोशिश कर रहे थे, क्योकि आदर्श ने किसी की आरडबल्यूए की मदद लेकर उसे हमारे मोहल्ले के बाहर निकाल दिया था। शीला धीरे-धीरे सामान्य हो गई थी, घर के सारे काम-काज करने लगी थी, गुनगुनाती थी, हँसती थी और ख़ासकर, मेरा ज़्यादा ख़्याल रखने लगी थी। हम दोनों ने ऐसा बहाना बनाया था, मानो उसने वे व्हाटस एप्प मैसेज कभी मुझे भेजे ही नहीं हो। जोई ने मेरे फोन से चैटिंग डिलीट कर दी थी, पता नहीं क्यों, शायद वह नहीं चाहती थी कि कोई उसे देखें और मेरे बारे में उलटा-पुलटा बोले। 

मगर मैंने ऐसा मुद्दा उठाया कि जोई हमारे घर की चर्चा का विषय बन गई। एक विचित्र प्रकार की कड़वाहट मुझे घेरे जा रही थी– हो सकता है कुछ इंफ़िरियटी या सुपरियटी कॉम्पलेक्स के कारण। उस दिन जोई ने मुझे बताया था कि अंकल, आँटी, पिताजी और यहाँ तक कि माताजी ने मुझे बिज़नेस में लगाने की उससे अनुनय-विनय कर रहे थे। मुझे ऐसा लग रहा था, मानो कोई धमकी दे रहा हो। रोज़गार? क्या मैं उसका कर्मचारी था? पता नहीं, वे लोग मेरे बारे में उसे अनाप-शनाप कहे जा रहे थे। 

उस दौरान मेरे ऊपर घर का कुछ दबाव था, काम को लेकर। हर कोई ऑफ़िस या घर के कामकाजों में व्यस्त थे, लेकिन मेरे पास करने के लिए कुछ भी नहीं था। मैं जल्दी सो जाता था और देर से उठता था, आराम से अपना नाश्ता-पानी करता था और जब इच्छा होती थी तब नहाता था। फिर और कई घंटे व्हाटस एप्प या टीवी पर चल रही राजनैतिक बहसों को देखने या दूसरों के फ़ेसबुक पोस्ट देखने में गुज़ारता था। 

मम्मी और आदर्श ने कई बार इशारा किया कि सभी को घर के ख़र्च उठाने में अपना योगदान देना चाहिए- मगर मुझे यह सब-कुछ अच्छा नहीं लगता था। मैं अपने माता-पिता का उत्तराधिकारी था और मेरे ख़र्च के बारे में दूसरों को परवाह नहीं करनी चाहिए। मेरी दादी को दिवंगत दादा की पेंशन का बहुत बड़ा हिस्सा मिल जाता था और उनका पोता होने की वज़ह से मुझे उनके बैंकों के खातों का संचालन करने का अधिकार मिल जाता था। उसी से मेरा जेब-ख़र्च निकल जाता था। मगर उन्हें मुझसे यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि दादी का धन घर के ख़र्च में प्रयोग में लाऊँ। इसके अतिरिक्त, मैं इस परिवार का दुबला-पतला आदमी था, इसलिए मुझे काम पर जाने के लिए कोई बाध्य नहीं करता था। 

अंकल, आँटी और पापा ने मम्मी को मेरे जॉब के लिए ‘जोई‘ से बात करने के लिए विवश किया था। इसलिए एक दिन वह मुझे उसके घर ले जाकर कहने लगी, ”मैडम, जयंत के मौसाजी का नोइडा में बहुत बड़ा बिज़नेस है और वे चाहते हैं कि जयंत उनके साथ पार्टनर बनकर काम करें, लेकिन मैं नहीं चाहती कि मेरा बेटा संबंधियों के साथ काम करें। इसलिए मैं सोच रही थी कि अगर वह आपका बिज़नेस जॉइन करता है तो ठीक रहेगा? मेरा बेटा काफ़ी मेहनती है और सफल उद्यमी भी। अगर उसे पसंद आएगा तो काम करेगा और अगर पसंद नहीं आया तो कुछ महीनों बाद काम छोड़ देगा। क्या कहती हो?"

”हाँ, क्यों नहीं? उसे मेरे साथ काम करने दीजिए, मैंने अभी-अभी इन बिज़नेस का किसी रिश्तेदार के नाम पर रजिस्ट्रेशन करवाया है, मगर जयंत उसका सीईओ न सकता है।" जोई अपनी मुस्कान छिपाती हुई कहने लगी। 
इस प्रकार हम दोनों ने साथ-साथ काम करना शुरू किया और नियमित रूप से मिलना-जुलना भी। जब मैं उनकी रसोई में पानी का गिलास लेने गया तो मम्मी ने उसे कहा, ”हम उसे काम करने के लिए दबाव नहीं डाल सकते हैं क्योंकि वह कमज़ोर लड़का है, बेचारा हमेशा बीमार रहता है।” 

जोई ने उत्तर दिया, ”हाँ, मैं समझ सकती हूँ।" मगर मैं सोचने लगा कि वह मेरा सम्मान कम करती है, मेरी तरफ़ निगाह घूमाकर सोचने लगी है कि मैं इस परिवार का कमज़ोर बीमार लड़का हूँ। 

उसे मेरी आत्म-मुग्धता, मेरा हाइपोकोंड्रिएक व्यवहार पसंद नहीं था, उसने मुझे बाद में बताया था। मुझे उसका यह व्यवहार पसंद नहीं आया। 

मैं उसमें दिन-ब-दिन अहंकार, विकर्षण, झगड़ालू प्रवृत्ति और ‘वह ही सही है‘ की भावना में बढ़ोतरी देख रहा था। फिर भी मैं उसके साथ रहना चाहता था। मैं उस पर अपना अधिकार जताने लगा था। 

मेरा पहला क़दम था- मैंने मेरे घर के सभी सदस्यों से उसकी दूरी बढ़ाना शुरू किया, यह कहकर कि वह हमारे घर वालों का सम्मान नहीं करती है, वह हमें नीची निगाहों से देखती है, इसलिए जो थोड़ी-बहुत सौहार्द्रता उनके मन में उसके प्रति थी, वह पूरी तरह से ख़त्म हो गई। मेरी यह रणनीति काम आई। 

दोपहर में मेरी माँ और दूसरे घर वाले मुझे घेरकर उसके अतीत, स्वभाव, उसके संबंध, बुरी आदतों आदि के बारे में पूछते थे, क्योंकि क्वारेंटीन के दौरान मैं ही अकेला शख़्स उसके घर जाता था। मैं भी ऐसा बहाना बनाता था, मानो ज़बरदस्ती मुझे बिज़नेस के काम के लिए उसके घर जाना पड़ रहा था और क्वारेंटीन के बाद जैसे ही मुझे अच्छा जॉब मिला, उसी क्षण मैंने उसके साथ काम करना बंद कर दिया। मुझे इस बात का कोई डर नहीं था कि कोई मुझे यह सवाल करें कि वह हमारे घर क्यों नहीं आती है, और मेरा परिवार उससे बात क्यों नहीं करता है। हाँ! यह बात ज़रूर थी। 

मेरे मन में ‘बेरोज़गार‘ को टैग लगा हुआ था क्योंकि मेरे अंकल, आँटी और पिताजी ने उसे कह दिया था कि मैं विगत आठ वर्षो से काम नहीं कर रहा हूँ। शुरू-शुरू में, जब वह हमारे घर आई थी, तब हम अच्छे दोस्त बन गए थे, उस समय मैंने उसे झूठ कहा था कि एमबीए करने के बाद मैं किसी कंपनी में सीनियर एक्सिक्यूटिव का काम कर रहा हूँ। हर रात मुझे ऑफ़िस की गाड़ी दस बजे ले जाती है और सुबह छः बजे छोड़ देती है। जोई मेरे खाने-पीने और सोने की आदतों से परेशान हो गई, लेकिन मैंने उसे कहा, सब ठीक-ठाक है, मेरी आदत पड़ गई है। और मैं सारा दिन सोता रहता हूँ ताकि शाम को फ़्रेश मूड में उससे मिल सकूँ। ओह, वह कितनी ख़ुश थी। वह छोटी-छोटी चीज़ों से ख़ुश रहती थी, उसने कभी भी बड़ी उपलब्धियों के बारे में सोचा नहीं था, यद्यपि वह कई कीर्तिमान स्थापित कर चुकी थी। मगर मेरे लिए सबसे बड़ी दुख की बात यह थी कि हमारी दोस्ती के एक महीने बाद ही, मेरे घर वालों ने उसे सच बात बता दी थी। वह संवेदनशील महिला थी, वह मुझे दुखी नहीं करना चाहती थी, उसने वह बिज़नेस मेरे लिए ही शुरू किया था, और मुझे कभी भी ‘बेरोज़गार‘ की हीन-ग्रंथि का अहसास होने नहीं दिया, जब तक मैंने उसे उकसाया नहीं। और दूसरा प्रहार शीला ने कर दिया था, जब वह जोई के घर जॉब के लिए गई थी और उसे मेरे बारे में बता दिया था कि मैं केवल स्नातक हूँ, मैंने एमबीए नहीं किया है। जोई को दुख पहुँचा क्योंकि मैंने उससे झूठ बोला था, मगर वह चुप रही, हमारे संबंध ख़त्म होने तक। गोपनीयता को दबाकर रखने की उसमें अभूतपूर्व क्षमता थी, भले ही, वह मन ही मन घुटती क्यों न रही। 

जोई मेरे आँटी के यहाँ किरायेदार थी, जो उसी बिल्डिंग में रहती थी, पास वाले माले पर और हम लोग एक-दूसरे के सीधे पड़ोसी थे। दक्षिण मुंबई की मालाबार हिल्स में उसका अपना भी फ़्लैट था, जिसे उसने किराए पर दे दिया था क्योंकि वह उसके ऑफ़िस से दूर पड़ता था। इस बिल्डिंग में नौ फ़्लैट थे, जिसमें हम रह रहे थे और जोई जिस घर में किराए पर रहती थी, उसे देश की आज़ादी के पश्चात,लगभग साठ साल पहले मेरे दिवंगत दादा जी ने अनधिकृत अवैध रूप से उस संपदा को हड़प लिया था। और अब हम दस लोग दादी की प्रोपर्टी पर रह रहे थे। आदर्श के सिवाय, घर में कोई काम नहीं करता था किरायेदारों से मिलने वाला पैसा ही हमारी आय का एकमात्र स्रोत था। 

मेरी आँटी ने जोई से अच्छे संबंध बना लिए थे, हमारे दोस्त बनने से पहले से ही। और उसने हमारे परिवार की सारी गोपनीय बातें उसे बता दी थी कि किस तरह मेरी मम्मी ने धोखाधड़ी से उसकी जायदाद हड़पी, जो हमें दादी के उत्तराधिकार में मिली थी, और उसे युवावस्था में मेरी माँ ने प्रताड़ित किया था, उस समय दोनों परिवार साथ-साथ रहते थे तब वह उसे नौकरानी की तरह बर्ताव करती थी। अब वह शीला के साथ भी ऐसा ही व्यवहार करती है। जोई के पास बहुत सारे ऐसे कारण थे, जिससे वह मेरी ‘असभ्य, क्रूर, कुटिल, अधिकार जताने वाली‘ माँ को नापसंद कर सकती थी। इस दौरान, मेरे और जोई के बीच में अच्छे संबंध बन रहे थे, वह मुझे मेरी योग्यता या कैरियर की वज़ह से जज नहीं कर रही थी, बल्कि मुझे पसंद करती थी और मुझ पर विश्वास भी। यही वज़ह थी कि उसने वह बिज़नेस मेरे लिए ही खोला था ताकि हम दोनों को शाम के समय मिलने का बहाना मिल जाए। उसी दौरान हमारे भीतर प्रेम-कहानी जन्म ले रही थी। मगर कुछ ही समय में कड़वाहट पनपने लगी, आख़िरकार मेरे भीतर। 

*****

अप्रैल 2020 में मेरा भाई आदर्श पुणे भेज दिया गया, ऑफ़िस के एक महत्वपूर्ण काम से, पाँच दिनों के लिए। शीला ने उत्साह से अपने सामान पैक कर लिए। जिस दिन आदर्श गया, उसी दिन मम्मी और पापा भी चार दिन तक पिताजी की फिजियोथैरेपी करवाने के लिए किसी संबंधी के घर चले गए। मैंने यह बात जोई को बताई तो उसने पूछा था, ”अब तो केवल तुम और शीला घर पर हो।"

मैंने कहा था, ”तो क्या हुआ?"

"कुछ नहीं, मेरा मतलब था कि तुम्हारी माँ हमेशा तुम्हें शीला के साथ अकेले छोड़ना क्यों चाहती है।”

”चुप रहो, जोई! तुम्हारा दिमाग़ हमेशा गंदा ही सोचता है।"

मगर मम्मी हमेशा ऐसा ही करती थी। 

उस रात, शीला ने मेरे लिए अच्छा खाना बनाया, मुझे आदरपूर्वक खिलाया। जब मैं खा रहा था, वह मेरे सामने बैठी रही, आँसू बहाते हुए। उसके मुँह से लहसुन की गंध आ रही थी, माँ ने उसे कहा था कि अगर गर्भवती होना चाहती हो तो दिन में तीन लहसुन खाओ। उसका गर्भाधान मेरी माँ के लिए किसी राष्ट्रीय मुद्दे से कम नहीं था। वह कहने लगी, "जयंत, तुमने उस दिन मेरे मैसेज तक नहीं पढ़े? तुम मेरे दोस्त के घर भी नहीं आए?”

"शीला, तुम आदर्श की धर्मपत्नी हो और मुझे वह दिन याद मत दिलाओ।"

"सॉरी, तुम्हारी इजाज़त के बिना मेरे दोस्त के घर जाने से अगर तुम्हें दुख पहुँचा हो तो। सही में, मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था। फिर भी, मुझे आज यह बताना है कि मैं वहाँ तुम्हारे लिए ही थी। आख़िरकर हम सभी एक परिवार हैं। तुम्हारे भाई से तुम्हारा ख़ून का रिश्ता है। तुम्हें परिवार की महत्ता के बारे में समझना चाहिए और घमंडी पड़ोसियों की चाल में नहीं पड़ना चाहिए। वह जोयिता मैडम तुम्हें अपना गुलाम बनाना चाहती है, मुझे यह पसंद नहीं है।"

गुलाम!!

मैने अपने शयन-कक्ष का दरवाज़ा बंद किया, और जोई के मैसेज देखने लगी, मगर उनका प्रत्युत्तर दिए बिना सो गया। नहीं, मैं किसी का गुलाम नहीं बन सकता। उसके कुछ मिस कॉल भी थे, मगर मैंने उनका जवाब नहीं दिया। मम्मी पापा के आने तक मैं उसे मिलने तक नहीं गया, अगली सुबह मैंने उसे मैसेज किया कि मुझे बुखार हो गया था, और शीला मेरी देखभाल कर रही थी। घबराने की कोई बात नहीं है। उन चार दिनों में मैंने शीला से ज़्यादा बात तक नहीं की। वह मेरा बहुत घ्यान रखती थी और मेरी आज्ञा के बिना वह कुछ भी नहीं करती थी। मुझे उसका यह बर्ताव अच्छा लग रहा था। 

मगर ‘आज्ञा‘ ‘अनुमति‘ जैसे शब्द जोई के शब्दकोश में नहीं थे। आख़िरकर वह उन्मुक्त विचारों वाली महिला थी! एक नारीवादी! मेरे और जोई के बीच में और कुछ सामान्य नहीं रहा, हमारे संबंध ख़राब होना शुरू हुए। उन दिनों में, मैं केवल एक ही काम करता था- उसकी ग़लतियाँ खोजना।  हर किसी चीज़ में मुझे उसकी ग़लती नज़र आने लगी और मैं चाहता था कि वह मुझसे माफ़ी माँगे, अगर मुझसे मिलना चाहती हो तो। 

शीला के कोरोना ट्रीटमेंट के बाद जब भी जोई उसकी तबीयत के बारे में पूछती थी, तो मेरा उत्तर होता था, "तुम्हें उससे क्या लेना-देना ?” 

मुझे उसे आघात पहुँचाने में अच्छा लगता था हमारे घर में जोई की ज़िंदगी के बारे में अक़्सर बहस छिड़ती थी, उसके अकेले रहने के बारे में। हम सभी यही कहते थे कि वह घमंडी औरत हैं, इसलिए उसे सब छोड़कर भाग गए। कुछ दिनों तक जोई से मुलाक़ातें नहीं कर मैंने शीला के अहम को तुष्ट किया था। जोई ने पहली बार मेरी शीला के प्रति आसक्ति देखी थी, जब मैंने दो टेडी बियर एक जैसे ख़रीदे थे, एक उसके लिए और दूसरा शीला के लिए। मैंने उसे उचित भी ठहराया था, ”वह मेरी देखभाल करती है, मेरे लिए खाना बनाती है, मुझे उसे धन्यवाद देना ही चाहिए।"

जोई को आश्चर्य हुआ, मगर वह कुछ नहीं बोली। बहुत दिनों के बाद आख़िरकर उसने कहा, जब मैंने उसे किसी दूसरी वज़ह से दुखी किया था। 

कोविड-19 के दौरान, कॉलोनी के हर फ़्लैट में व्हाट्स अप्प ग्रुप बने हुए थे, जहाँ लोग एक-दूसरे का ख़्याल रख रहे थे। मगर हमारे किराएदार एक दूसरे से बातचीत नहीं करते थे क्योंकि हम हर किसी से अलग-अलग किराया वसूल रहे थे। जोई दूसरे किराएदारों मे पाँच हज़ार रुपए ज़्यादा दे रही थी और वह इसे जानती भी थी। मगर उसने कभी भी सौदेबाज़ी नहीं की, उसका ऑफ़िस उसके एचआरए का भुगतान कर रहा था। एक बार उसने मुझे कहा, "जॉय, हम और तुम दोनों अच्छे मौसम के साथी हैं और मुझे कोरोना के समय में असुरक्षित महसूस हो रहा है,अगर मुझे कुछ हो गया तो क्या होगा? तुम्हारी माँ तुम्हें मुझे मिलने तक नहीं देगी। बेहतर यही रहेगा कि मैं कॉलोनी का ग्रुप ज्वाइन कर लूँ।”

असल में उसने ऐसा किया भी। मैं कॉलोनी में उसके सहकर्मियों से नफ़रत करता, जो उसे सलाह देते थे और लॉकडाऊन पीरीयड में साज-सँभाल लेते थे। हम घर के मालिक होने के बावजूद भी उसे ही ज़्यादा जानकारी रहती थी, भले ही, कॉलोनी के लोगों से ही सही। वह समझ गई कि कॉलोनी में हमारा घर कोई पसंद नहीं करता है, लोग हमें धोखेबाज़ कहते हैं। उन्हीं से उसे यह भी पता चला कि दूसरों की तुलना में उससे ज़्यादा भाड़ा लिया जाता है। 

जोई एक अच्छी कहानीकार थी, संघर्ष करने वाली, कामयाबी को छूने वाली और दूसरों को बचाने वाली। मुझे उसके संघर्ष की शुरूआती दौर की कहानियाँ अच्छी लगती थी कि वह कैसे बंगाल के किसी गाँव की किसी ग़रीब परिवार में पैदा होकर आईएएस बनी और उसे मुंबई में शानदार पोज़ीशन मिली। मगर मैं उसे कहना चाहता था कि मेरी माँ भी तुम्हारे जैसी महान व्यक्तित्व की धनी है। मगर जब मैंने उसे अपनी माँ के संघंर्षों और सफलता की कहानियाँ सुनाना शुरू किया तो वह नाक-भौं सिकोड़ने लगी, यद्यपि मुझे ऐसी झूठी कहानियाँ बनाने में बहुत मेहनत करनी पड़ी थी। उसके चेहरे पर उभरती हुई व्यंग्य भरी मुस्कान मानो कह रही हो, क्या यह ही संघर्ष है जॉय? जब उसकी सास ने उसे अवैध अनधिकृत बहुत बड़ी संपत्ति उसे भेंट की हो और जिसका पति जोरू का गुलाम हो? और तुम किस सफलता की बात कर रही हो? वह केवल गृहणी है और कुछ भी नहीं!! और वह अब तुम्हें अपना गुलाम बना रही है। 

कभी-कभी मैं उसे कहता था कि मेरी माँ किस तरह ‘संघर्ष‘ कर रही है, आदर्श और शीला की कोख नहीं भरने के कारण और सगे-संबंधी मेरी माँ पर दबाव बनाते जा रहे हैं। जोई पूछने लगी, वे लोग किसी विशेषज्ञ की परामर्श क्यों नहीं लेते। कोई अच्छा डॉक्टर या कोई फ़र्टीलिटी क्लिनिक?

मैं कहता था, "उनके कारण मुझे भी संघर्ष  करना पड़ रहा है।"

"हा हा, जॉय, ऐसा लगता है तुम शीला के लिए बहुत संघर्ष कर रहे हो?”

मैंने ग़ुुस्से में कहा ”जोई, इतना नीचे मत सोचो, वह परिवार है। मेरे घर में, मैं अकेला ऐसा आदमी हूँ जो कार चलाना जानता है, इसलिए मम्मी हर समय मुझे ही उसे फ़र्टिलिटी क्लिनिक भेजती है, मुझे उसके साथ जाना ही चाहिए क्योंकि वह ऑटो मे नहीं जा सकती है।"

फिर से वह पूछने लगी "क्या तुम्हारे साथ उसे गाइनोकोलॉजिस्ट के पास जाना सहज लगता है?”

”क्यों नही, जोई?” 

”आह ... मैं जानती हूँ जॉय। भले ही, वह सुनने में अच्छा लगता हो। फिर भी इतना कह सकती हूँ कि बच्चे पैदा करने के लिए गर्भवती होने की आवश्यकता नहीं है। हमारे देश में अनाथालयों में हज़ारों सुंदर बच्चे परियक्त हैं, वे कभी भी बच्चा गोद ले सकते हैं। इस वज़ह से, देवदूत जैसे बच्चे को उसके माता-पिता मिल जाएँगे और तुम्हारी मम्मी को पोता। फिर तुम्हारी मम्मी का संघर्ष समाप्त हो जाएगा।"

केवल जोई जैसी क्रेज़ी औरत के दिमाग़ में ही ऐसे विचार आ सकते हैं। मैंने कहा, "कैसी घटिया बात कह रही हो। अगर किसी मुसलमान ने अपना बच्चा छोड़ दिया हो और अनाथालय वाले उसे ही दे दें तो।” जोई ने तड़ाक से उसका उत्तर दिया, "तो क्या हुआ? बच्चे तो देवदूत होते हैं, धर्म कोई भी क्यों न हो।"

मेरे लिए दुख की बात थी, न तो मैं जोई को समझा पाता था, और न ही उससे दूर रह पाता था। मुझे उसके द्वारा की गई सिर की मालिश, उसका ख़ुश-मिज़ाज, उसके द्वारा बनाया हुआ खाना, उसका प्रेम-देखभाल-सादगी और उसका आकर्षक शरीर बहुत अच्छा लगता था। इसके अतिरिक्त, मुझे हमारा बिज़नेस भी ज़िंदा रखना था, ऐसे वह मेरी आदत बन गई थी। मगर मैं उसे व्यक्ति के तौर पसंद नहीं करता था। देखिए तो, कैसी विडंबना थी! पूरी तरह से जटिल ही जटिल। 

जब कभी भी हमारे बीच में तनातनी होती थी, मैं हर तरीक़े से उसे नीचा दिखाना चाहता था। एक बार मैं उसे अपने दोस्तों से मिलाने के लिए लेकर गया, वह मेरे साथ ख़ुशी से आई थी क्योंकि उसके मन में धारणा थी कि मैं उसे किसी ‘डर्टी सीक्रेट‘ की तरह छुपाकर रखना चाहता हूँ। वह मुझे अपनी सहेली सीमा के बारे में बताती थी, जिसका अपने डॉक्टर बॉयफ्रेंड से खुला रिश्ता था। वे कहीं पर भी एक साथ जाते थे, अपना प्रेम छुपाए बिना, जैसा कि हम किया करते थे। मैं कहता था, "हाँ, क्यों नहीं? वह उसके साथ खुला रिश्ता रख सकती है क्योंकि डॉक्टर कोई फ़्रेश आदमी नहीं है, वह तो विधुर है।”

जोई निराशा भरी हँसी हँसते हुए कहने लगी, ”क्या तुम गंभीरता से कह रहे हो? फ़्रेश आदमी से तुम्हारा क्या मतलब है? डॉक्टर विधुर है, इसका मतलब तो यह नहीं है कि वह किसी से प्यार करने में पीछे रहेगा? मगर मेरा मानना है कि जोड़ीदार के लिए आवश्यक शर्त है प्यार और सम्मान करना" उसने फिर कहना जारी रखा, ”हा हा हा! हाँ, तुम सही में फ़्रेश आदमी हो।"

मुझे क्रोध तो बहुत आया था, मगर मैं उसे कुछ कहना नहीं चाहता था क्योंकि मुझे उसे अपने दोस्तों से मिलाना था। 

हम मुंबई सेन्ट्रल के एक रेस्टोरंट में गए, जहाँ मेरे दोस्त सोहन, राजेश और लकी इंतज़ार कर रहे थे। वह बहुत जल्दी ही अपनी तत्क्षण प्रज्ञा, सदव्यवहार के कारण मेरे दोस्तों के साथ घुलमिल गई। उसने मेरे दोस्तों से कहा कि वह मुझसे उम्र में कुछ साल बड़़ी है और वह हमेशा मुझसे बड़ी ही रहेगी। मगर मैंने तुरंत उत्तर दिया, "सचिन तेंदुलकर की पत्नी भी तो उससे उम्र में बड़ी थी।”

मैंने उसकी उम्र छुपाने की कोशिश की, मगर उसे इस बात की कोई चिंता नहीं थी। वह अक़्सर कहा करती थी, किसी की भी उम्र जीवन में उसकी उपलब्धियों के समानुपाती होती है, अन्यथा वह उम्र के किसी भी पड़ाव पर वृद्ध और निरर्थक अनुभव करने लगता है। फिर भी उसने थोड़ी-सी शराब पी और थोड़ा-सा खाना खाया। मेरे दोस्त मुझे हर समय प्रेमासक्त रहने पर चिढ़ाने लगे थे। कुल मिलाकर वह एक सुखद संध्या थी। 

घर लौटकर कुछ दिनों बाद हमारे बीच में बहस छिड़ गई, पारिवारिक मुद्दों पर। मैंने उसे कहा- ”जोई, हमारा नहीं बन पाएगा। उस शाम को मेरे दोस्त भी कह रहे थे कि तुम मुझसे उम्र में बड़ी हो। तुम बूढ़ी हो और तुम हमेशा अपना सिक्का चलाती हो। बेहतर यही रहेगा कि हम अलग-अलग हो जाए।”

मुझे अच्छी तरह याद है, मैंने कई बार उसे कहा कि हमें अलग हो जाना चाहिए, मगर फिर भी वह सोचती थी कि वह मेरी अपरिपक्वता है। और उसके अगले ही दिन, वास्तव में मैंने उसके साथ दोस्ती कर ली। उस दिन वह बहुत ही ग़ुुस्से में थी और आहत भी। वह कहने लगी, ”मुझे उनकी बातों की क़तई परवाह नहीं है, क्योंकि मैं उनसे जीवन में दूसरी बार कभी मिलने नहीं जा रही हूँ। तुम मेरे लिए क्या सोचते हो, यह मेरे लिए मायने रखता है।"

वह सारी रात कराहती रही और मैं उसका दिल दुखाकर आनंद की नींद सो रहा था। आह, हाँ ! वह मुझे कहा करती थी, उम्र केवल एक संख्या है। यह जवान रहने का कोई पैमाना नहीं है, किसी को भी उम्र के बारे में ज़्यादा सोचने की ज़रूरत नहीं है। फिर जवानी की परिभाषा क्या है? आज मैं इस बात को स्वीकार करता हूँ कि मेरे दोस्तों ने ऐसा कुछ भी नहीं कहा था, बल्कि उन्होंने उसकी सादगी की तारीफ़ की थी और मेरे जीवन मे इतनी ख़ूबसूरत महिला को पाने के लिए बधाई भी दी थी। 

जोई के रग-रग में बंगाली लहज़ा समाया हुआ था। कभी मैं उसे कहता था कि मोटी औरतें सुंदर नहीं होती है, यद्यपि उसकी पाँच फुट चार इंच लंबाई, इकसठ किलो वज़न, शरीर के सुगठित उभार उसे संपूर्ण नारीत्व प्रदान कर रही थी। वह कहा करती थी, शरीर के अनुसार किसी के सौंदर्य का आकलन करना अच्छी बात नहीं है। हाँ, प्रत्येक मनुष्य अद्वितीय है और सुंदर भी। अवश्य, सभी में सुंदरता देखना उसकी आदत थी। मगर उस दिन, जब मैंने दोस्तों का नाम लेकर झूठ बोला कि उनकी नज़रों में वह मोटी है, तो उसने प्रतिक्रिया जताई, शब्दों को चबाए बिना ”मैं जानती हूँ कि मैं स्वस्थ और सुडौल औरत हूँ। सच्चे पुरुष सुडौल और सुगठित औरत पसंद करते हैं, जबकि कुत्तों को हड्डियाँ ही पसंद आती हैं। सोच लो, तुम किस श्रेणी में आते हो।"

अवश्य, वह अपने मज़ाक के लहज़े पर हँसने लगी थी और बात को वहीं पर ख़त्म करना चाहती थी। फिर मैंने शेखी बघारना शुरू किया कि मेरी माँ, आँटी और शीला कितनी दुबली-पतली हैं। कहा, ”आह, तुम जानती हो न, मेरी माँ तो एकदम फिटम-फिट है!" यह सुनकर उसे और ज़्यादा ग़ुस्सा आया। मैं करता भी ऐसा ही था, उसे इतना ग़ुस्सा दिलाता था कि वह अपना आपा खो बैठे। नाराज़ होकर वह कहने लगी, ”मैं उन तीस किलो की मछलियों के बारे में नहीं सुनना चाहती हूँ, जिनके वक्ष सपाट हो और चेहरे पर झुर्रियाँ! तुम्हारे भाई का बच्चा नहीं है क्योंकि शीला सेक्सी नहीं है और सेक्सरहित शादी की वज़ह से तुम्हारे पिताजी को प्रोस्टेट कैंसर हुआ था।"

सुनकर मुझे भयंकर ग़ुस्सा आया और जी भरकर ज़ोर से चिल्लाया, मगर वह कुछ नहीं बोली। उसने मेरे अहम को चोट पहुँचाई थी। ग़ुुस्से में भनभनाते हुए, मैंने ‘बाय‘ ‘सी यू टुमारो‘ कहकर उसका घर छोड़ दिया था। इस तरह से, मैं उसे सज़ा देता था। सर्दी-जुकाम का बहाना कर कुछ दिनों तक उससे दूरी बनाकर रखता था, उसके कॉल या मैसेज का भी जवाब नहीं देता था। वह मेरे लिए दुखदायी औरत होती जा रही थी। वह कहती थी, मुझे अधिक चापलूसी की आवश्यकता है और अहंकार-तुष्टि की, अन्यथा मैं अंतर्धान हो जाऊँगी। ऐसी थी हमारे संबंधो की रूपरेखा। वह मेरे आगे के पदक्षेपों के बारे में अंदाज़ लगा लेती थी। सही में, मुझे उससे दूरी बढ़ाने में ख़ुशी का अहसास होने लगा था, मैं जानता था कि जब उसे पीड़ा होगी, वह मुझे फोन करेगी, या मैसेज भेजेगी, मगर हमारे घर नहीं आई, सिवाय केवल एक बार, उस घटना वाली सुबह को छोड़कर। वह उस दिन भी हमें मिलने नहीं आई, जिस दिन उसने मुंबई छोड़ दिया। वह चुपचाप चली गई, मुझे मेल भेजकर। 

साफ़ तौर पर जोई मेरे लिए ‘कठिन औरत‘ हो गई थी, मैं उससे छुटकारा पाना चाहता था, मगर हमारे साझेदारी वाले बिज़नेस के कारण हमारा परिवार नहीं चाहता था कि मैं उसे बीच में छोड़ दूँ, उससे मुझे अच्छा ख़ासा धन मिल जाता था और मेरे पास कम से कम ऑनलाइन ख़रीददारी के लिए पर्याप्त पैसे हो जाते थे। इसके अतिरिक्त, मेरे भीतर संबंध तोड़ने का साहस भी नहीं था, वह अच्छी तरह जानती थी कि मैं ऐसा नहीं कर सकता। इसलिए यह दायित्व उसने अपने सिर पर लिया, मुझे ‘गुड बाय‘ कहकर, अपने दिल के टुकड़े करते हुए। उसके मुंबई छोड़ने के दो दिनों बाद मैंने उसका यह मेल देखा, मैं हतप्रभ रह गया, मगर मन ही मन ख़ुश हुआ कि आख़िर उससे छुटकारा मिल गया। मैंने उसे फोन करना भी उचित नहीं समझा, मगर तुरंत ही बैंक खाते देखना शुरू कर दिया। आश्चर्य की बात थी! बैंक खाता स्थायी तौर पर बंद कर दिया गया था और जितने पैसे उस खाते में थे, उन्हें मेरी माँ के खाते में ट्रांसफ़र कर दिए थे, एक नोट के साथ- "मधुजी, इस खाते का सारा पैसा जयंत का है। कृपया उसे दे दीजिएगा। धन्यवाद”

कुछ हफ़्तों के बाद, मैंने गूगल पर उस बिज़नेस की जानकारी चेक की और पाया कि उस कंपनी का सीईओ उसका जूनियर करनाल वाला सपन कुमार था, जो कि समर्पित और वफ़ादार अधीनस्थ अधिकारी था और कई सालों से हमारे बिज़नेस में आने के लिए अनुरोध कर रहा था, मगर वह हमेशा उसे नज़र-अंदाज़ कर रही थी, क्योंकि यह केवल जॉय-जोई का ड्रीम प्रोजेक्ट था। वह सोचती थी कि यह बिज़नेस उन्हें हमेशा के लिए जोड़कर रख सकता है। शायद वह ऐसा अनुभव करती थी, जबकि मैं हमेशा इसे अस्थायी संबंध के तौर पर मानता था। जोई स्वप्नदर्शी थी, कई बार वह कहा करती थी, "जॉय, मैं चाहती हूँ कि तुम और मैं अमृता प्रीतम और इमरोज़ बनकर जीवन का शेष हिस्सा एक साथ जीएँ। मैं जानती हूँ तुम्हें ‘कमिटमेंट फोबिया‘ है, तुम शादी करना नहीं चाहते हो मगर चलेगा। शादी मेरे नसीब में भी नहीं है, इस बिन्दु पर, जब तक कि तुम्हारा कैरियर न बन जाए और उसके लिए तुम तैयार न हो जाओ।”

हर महीने में उसके सैलरी खाते में लाखों रुपए जमा होते देख मुझे ईर्ष्या होती थी, यहाँ तक कि लॉकडाऊन अवधि में भी। मैं सोचा करता था, रुको, मेरा भी समय आऐगा, मुझे भी इतना पैसा मिलेगा, मिस जोयिता! मेरे माँ-बाप इतने चतुर नहीं थे, इसलिए मेरा मार्गदर्शन नहीं हो पाया, अन्यथा मैं तुमसे ज़्यादा बुद्धिमान था! वह उन्मुक्त विचारों की महिला थी और उसकी दृष्टि में ‘हाऊस वाइफ़-हाऊस हसबैंड‘ जैसे कोई मुद्दे नहीं थे। वह कहा करती थी, कोई भी घर पर रह सकता है मगर उसे घर के कामों में रुचि हो, यद्यपि घर पर रुकने के कई विकल्प भी है जैसे कोई हमेशा ‘वर्क फ़्रॉम होम‘ कर सकता है। क्वारेंटीन के दौरान वर्चुअल ऑफ़िसों की अवधारणा की वह प्रबल समर्थक थी और वह ख़ुद भी दिल लगाकर ‘वर्क फ़्रॉम होम‘ कर रही थी। जब भी वह सेमिनारों और पब्लिक स्पीचों में श्रोताओं को इसके बारे में बताती थी तो मुझे बहुत ख़राब लगता था। मुझे उसकी विचारधाराओं से नफ़रत थी, मैं उसका दिल दुखाना चाहता था। एक दिन मैंने गर्व के साथ कहा, भले ही मुझे लोग तथाकथित ‘बेरोज़गार‘ समझे, मगर फिर भी सुंदर-सुंदर औरतें मुझ पर मरती हैं। मेरी भी बाज़ार में क़ीमत है। मेरे पास शादी का बाज़ार है, इसके अतिरिक्त मन ही मन सोचा करता था, शीला मेरे लिए अतिरिक्त फ़ायदा है, वह भी मुझ पर जान निछावर करती है। मेरे दोस्त की पत्नी, जिसे मैं भाभी कहता हूँ, ने मुझे मेरे फोटो भेजने का मैसेज दिया, ताकि वह अपनी बहिन से शादी करवा सकें। तुरंत ही मैंने अपने पसंदीदा फोटो उसे भेज दिए। दुर्भाग्यवश, जोई ने मुझे भाभी के साथ बात करते हुए देख लिया, यह देखकर उसे बहुत दुख हुआ। वह परेशान हो गई और पहली बार मेरा विश्वास चरमरा गया था। वह कहने लगी – "मुझे उम्मीद है, भाभी जानती होगी कि तुम काम नहीं कर रहे हो?” मैं मन मसोस कर गया। मुझे उससे डर लगने लगा। उस लड़ाई के बाद यद्यपि हमने समझौता कर लिया, मगर वह ज़ख़्म नहीं भर पाया। 

माँ को जोई अच्छी नहीं लगती थी, मगर उसके मुँह पर कहने की हिम्मत नहीं हुई क्योंकि उसका बेटा वहाँ काम करता है। ग़रीब सब्ज़ी वालों से जोई ख़रीददारी के बाद बचे हुए पैसे वापस नहीं लेना चाहती थी, बॉलकोनी से ही उन्हें अपने पास रखने का इशारा करती थी, जिससे उनके चेहरे पर मुस्कराहट खिल जाती थी। उसी दौरान, सब्ज़ी बेचने वालों से माँ और शीला एक रुपए के लिए भी ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाती थी। इसलिए वे उसे लालची औरत समझते थे, जोई से तुलना कर। जोई कभी भी अपने पुराने अख़बार कबाड़ी वाले को नहीं बेचा करती थी, वह उसे मुफ़्त में ऐसे ही दे देती थी, जबकि माँ तराजू के पास खड़ी रहकर एक किलो कबाड़ी तुलवाने तक खड़ी रहती थी। जोई से नफ़रत करने के कई कारण थे माँ के पास, जोई का अहंकार, जोई की उदारता हमें ग़रीब अनुभव करवाती थी, उसका बड़प्पन हमें नीचा दिखाता था। 

हमें उसके घर में काम करने वाली, उसके ऑफ़िस का चपरासी, श्यामानंद से भी घृणा होती थी। जब शीला अस्पताल में थी और उसके बाद अपने ननिहाल में, तब मम्मी को खाना बनाना पड़ता था, वह सारे समय चिड़चिड़ाती थी और मुझे बर्तन साफ़ करने पड़ते थे, झाड़ू-पोंछा करना पड़ता था क्योंकि आदर्श को ऑफ़िस के लिए घर से काम करना पड़ता था। यद्यपि उसकी तनख़्वाह में काफ़ी कटौती हो गई थी, फिर वह इस परिवार का ‘कमाऊ पुत्तर‘ था, जैसा कि सगे-संबंधी कहा करते थे। निजी कार्यालयों में या तो काम बंद कर दिया गया था या फिर तनख़्वाह में कटौती, जबकि जोई केंद्रीय सरकार की नौकरी में थी, सिक्योर जॉब मे अपना काम-काज होने के बाद वह सुस्ताने लगती थी और श्यामानंद घर के सारे काम-काज कर लेता था। एक दिन मैंने जोई से कहा, "अपने आपको देखो, तुम शराब पीकर आराम फ़रमाती हो और नौकर-चाकर घर का काम-काज कर लेते हैं। जबकि हमारा सारा दिन खाना बनाने, झाड़ू-पोंछा लगाने और सफ़ाई करने में बीत जाता है।”

उसने उत्तर दिया था, "अरे, यह तुम्हारे बिग बॉस का घर है।” अप्रत्यक्ष रूप से उसने मेरी बेइज़्ज़ती की थी। हम हमेशा उससे शिकायत करते रहते थे कि श्यामानंद ग़लत जगहों पर कचड़े की थैलियाँ रखता है, कोरोना के समय में इस बिल्डिंग में आकर। वह चुप रहती थी, ऐसी बातों पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं देती थी, क्योंकि उसके लिए ये सब ‘छोटी-छोटी‘ चीज़ें थी। 

इसके पीछे उसकी ख़ास सहेली शिखा का हाथ था। वह केरल की रहने वाली थी, काली-कलूटी, जिसे जोई दुनिया की सबसे सुंदर औरत कहा करती थी। शिखा ने उससे कहा था, ”मूर्खों की तरफ़ ध्यान मत दो।” इसलिए वह मेरे परिवार की तरफ़ ध्यान नहीं देती थी। जोई का शिखा के साथ रहस्यमयी संबंध था और कोलकत्ता के पुरुष मित्र से भी, जिसे वह अपने पूरे जीवन में तीन-चार बार मिली होगी, परंतु उससे आत्मीय संबंध था। वह हर छोटी-मोटी चीज़ों में उनसे मार्गदर्शन लेती थी और उसे बढ़ा-चढ़ाकर इस्तेमाल करती थी। उसके कोलकत्ता वाले दोस्त डॉ. शुभोदीप सरकार ने मुबई छोड़ने के बाद भी बिज़नेस बंद नहीं करने की सलाह दी थी, बल्कि करनाल के सपन कुमार को सारी ज़िम्मेदारी सौंपने का सुझाव दिया था। और उसने वैसा ही किया! पिछले दिन के लड़ाई-झगड़े को भूलने की जोई की बेशर्म आदत थी। उसकी हर सुबह ‘गुड मोर्निंग‘ के मैसेज से शुरू होती थी। मैंने कभी उसे कहा था, ”क्या तुम पागल हो? तुम्हें किसी मनो-चिकित्सक से मिलना चाहिए। क्या तुम्हारे दिमाग़ में तीन बटन हैं? एक लड़ाई वाला, दूसरा प्रेम का और तीसरा तुरंत मूड बदलकर सामान्य बर्ताव करने का, भले ही, भयंकर लड़ाई क्यों नहीं हुई हो?” 

वह कहती थी, ”मेरे प्रिय जॉय, यह तीसरा बटन ही है, जिससे दुनिया चल रही है और संबंध ज़िंदा है, अन्यथा हम प्रतिदिन एक-दूसरे से लड़-झगड़कर रिश्ते ख़त्म कर देते। इस बटन की वज़ह से, मैं अपने दुख को भूल जाती हूँ और दुख देने वाले को माफ़ कर देती हूँ। यह बटन ‘ईगो-फ़्री‘ बटन है।” मैं सोचता था, कैसी विचारधारा वाली पागल औरत है वह! वह हमेशा मेरे लिए खाना बनाती थी, घर के काम करने वाले जाने के बाद वह हमारे लिए कुछ व्यंजन बनाती थी और मुझे प्रेम से खिलाती थी। 

लॉकडाऊन की हर शाम को राष्ट्रीय टीवी चैनलों में जोई का वार्ता-अधिवेशन चलता था। टीवी वार्ता समाप्त होने के बाद हमारे लिए नाश्ता तैयार कर एक बार शाम के समय वह बड़े-बड़े मुद्दों पर बहस करना चाहती थी जैसे मनुस्मृति, रूसो की एमिले या मौलाना अशरफ अली थानवार की आचार संहिता, जो अप्रत्यक्ष रूप् से मुस्लिम दुल्हनों को मिलने वाला शास्त्रीय उपहार है। वह कहती थी, पंडित रमा बाई की पुस्तक ‘द हाई कास्ट हिन्दू वीमेन‘ मनु के नियमों पर सवाल उठाती है। ताराभाई शिंदे की ‘स्त्री पुरुष तुलना‘ पुस्तक में दहेज-प्रथा, गहनों के प्रति औरतों की आसक्ति और ‘दूसरेपन‘ की स्वीकार्यता पर कुठाराघात है। जोई, अधिकतर आत्माभिव्यक्ति और आत्मावलोकन वाली किताबें जैसे वर्जिनिया वुल्फ़ की ‘ए रूम ऑफ वन्स आऊन‘ और सिमोन डी बिवोर की ‘द सेकेंड सैक्स‘ पढ़ा करती थी। मुझे ख़राब लगने लगता था कि आख़िर वह क्या कहना चाहती है? वह कहती थी, कई पर्यावरण नारीवादिता के मुद्दे हैं जैसे जल-संरक्षण, प्राणी-जगत, पर्यावरण की चुनौतियाँ, लड़कियों के मुद्दे, उपनिवेशवाद, पूँजीवाद, बुज़ुर्गां की रक्षा, हाशिए पर रहने वालों के अधिकार, सभी के लिए भोजन और शिक्षा आदि। 

मगर उस समय मुझे उसके दीर्घ भाषण सुनने की क़तई इच्छा नहीं होती थी। मैं कहता था, ”ज़्यादा खाना मत बनाओ, माँ ने मुझे आज भरपेट खिला दिया है, ज़बरदस्ती से। आज हमने बहुत सारा परचूनी का सामान भी ख़रीदा है, पाँच लीटर वाले हैंड सैनिटाइज़र, ऑनलाइन शापिंग की। हे भगवान! जितना हम ख़रीदते हैं, मेरे घर वाले केवल ख़रीदते हैं, खाते हैं और मस्त रहते हैं, वास्तव में मैं इतनी ज़्यादा ऑनलाइन शापिंग और भोजन करने से तंग आ गया हूँ।”

हमेशा की तरह इस बार भी वह भड़क उठी, ”तुम्हारी मम्मी तुम्हें खिलाती है? तुम्हें अपनी गोद में लेकर? और हमेशा तुम भोजन, शॉपिंग, ग्रोसरी, हैंड सेनिटाइज़र्स की बातें क्यों करते रहते हो, जबकि दुनिया में बहुत सारे ऐसे मुद्दे बचे हैं, जिस पर बहस होनी चाहिए। क्या तुमने कभी सुंदर उपग्रह पृथ्वी के बारे में सोचा भी है? कोरोना वायरस हमें क्या संदेश दे रहा है? तुम लोग जीने के लिए खाते हो या खाने के लिए जीते हो? क्या कभी तुमने सुना है, महान लोग विचारों पर बहस करते हैं, मध्यम लोग व्यक्तियों पर और निम्न लोग केवल वस्तुओं पर।" 

मुझे बहुत ग़ुस्सा आया, क्या हम ‘निम्न‘ श्रेणी के लोग है? मैं चिल्लाया "तुम बंगाली औरत, बदज़ात! हमेशा तेल मसालों और सरसों के तेल में खाना पकाकर हमारे घर में नकरात्मक उर्जा फैला रही हो। तुम जाओ यार यहाँ से, निकलो इस घर से, अपने लिए दूसरी जगह ढूँढ़ो। यहाँ से भागो। मैं जा रहा हूँ। मुझे यहाँ कुछ नहीं खाना है। मेरी मम्मी ने मुझे आज बहुत खिला दिया है।”

मैं हमेशा उसे हमारे घर से चले जाने के लिए कहता था। आख़िरकर हम ज़मींदार थे और वह किराएदार! उस रात उसने भी खाना नहीं खाया और मुझे मैसेज भेजा कि वह उसे कभी भी और खाना नहीं खिलाएगी। मुझे बहुत ख़राब लग रहा था। बेचारी, वह केवल मेरे लिए खाना बना रही थी, और मुझे शायद उस पर चिल्लाना नहीं चाहिए था और अगर उसने मुझे खिलाना बंद कर दिय तो मुझे मम्मी के हाथों बनी बिना तेल-मसाले की दाल-चावल खाकर संतुष्ट रहना होगा। हमारे घर में केवल आदर्श कमाता था और खाने वाले दस। इसलिए कभी-कभी आदर्श और शीला अपनी ग्रोसरी वापस कर देते थे, जिसे मैं ऑनलाइन मँगाता था। मुझे जोई के यहाँ अच्छा खाना मिल जाता था। क्या अब ऐसा खाना कभी नहीं मिलेगा? नहीं, बिल्कुल नहीं। अगले ही दिन, उसने अपना तीसरा बटन स्विच ऑन कर दिया और पहले की भाँति ही मुझे भोजन परोसा। 

उन दिनों जब कभी जोई और मेरे बीच बहस छिड़ती थी, आमने-सामने या फोन पर, मैं मेरे ख़ास दोस्त राजेश खत्री को सुनाने के लिए रिकॉर्ड कर देता था। उसका तलाक़ होने जा रहा था और उसने मुझे यह कहकर संतुष्ट कर दिया था कि सभी औरतें स्वार्थी होती है। मगर मेरी आँटी ने जोई को कहानी का दूसरा पहलू बता दिया था कि राजेश अपनी पत्नी को प्यार नहीं करता है, वह और उसकी माँ उसके साथ बुरा बर्ताव करते हैं, इसलिए अंत में वह अपने प्रेमी के साथ भाग गई। मेरी आँटी ने तो उसे यहाँ तक कह दिया कि मेरी राजेश के साथ दोस्ती के पीछे का राज़ पैसा है, क्योंकि वह पैसे वाला आदमी है। सही में, मैं ग़लत कारणों की वज़ह से उसके साथ में था क्योंकि वह मेरे शराब के बिल भरा करता था। मगर जोई की राजेश खत्री की पत्नी के साथ सहानुभूति थी। यहाँ तक कि मेरी माँ भी राजेश खत्री के ख़िलाफ़ बोलती थी उसके सामने, जब जोई ने उसका बिज़नेस मुझे ऑफ़र किया था। माँ उस दिन ख़ुशी से फूली नहीं समाई थी और उससे कहने लगी थी कि राजेश मुझसे ईर्ष्या करता है। फिर भी, मुझे राजेश अच्छा लगता था और उसकी पत्नी के साथ लड़ाई-झगड़ोंं की रिकार्डिंग को मेरे मोबाइल पर सेव किया था, जिसे उसने मज़ाक-मज़ाक में मेरे पास भेज दिया था। जब मैंने जोई को चिढ़ाया कि मैंने उसकी मेरे साथ हुई बहसा-बहसी को रिकार्ड किया है और उसे राजेश को भेजने वाला हूँ।  

जोई ने कहा, "तुम और वह राजेश दोनों ही नारी-निंदक हो। मुझे ऐसे लोगों पर दया आती है। क्या तुम लोग सोचते हो कि आदमी ही अच्छे होते हैं और उनकी औरतों की ही ग़लतियाँ होती है? जीवन-साथी के बिना ज़िंदगी का सौंदर्य तुम खो दोगे। तुम दोनों दरकिनार कर दिए जाओगे और अकेले रहोगे। इसलिए अच्छा ही रहेगा,तुम उसे रिकार्डिंग भेज दो। मुझे उस मामले में न तो तुम्हारी और न ही उसकी परवाह है।"

मैंने कहा, "नहीं, जोई मैडम, तुम अकेली जीवन जियोगी, अगर मैं तुम्हे छोड़ देता हूँ। मेरे पीछे मेरा परिवार खड़ा है, अगर तुम मुझे छोड़ भी देती हो किसी दिन।"

"अच्छा, तुम सोचते हो तुम्हारे माँ-बाप हमेशा जीवित रहेंगे। नहीं तो, आदर्श और शीला तुम्हें सारी ज़िंदगी मुफ़्त में खिलाते रहेंगे? जॉय, काश! मैं तुम्हें एक आशीर्वाद और एक अभिशाप दे पाती। मेरा आशीर्वाद रहता कि तुम्हें कोई अपने लिए काम मिल जाए, ताकि तुम्हें दूसरों पर आश्रित नहीं रहना पड़े। और अभिशाप -तुम्हारे मोटा-तगड़ा दस सदस्यों वाले ख़ुशहाल कुटंब में, तुम्हारा बड़ा ड्रामा (‘हम साथ-साथ है’- वाला परिवार) अलग-अलग क़स्बों में जाकर रहने लगे। तुम में से हर कोई। तब तुम्हें पता चलेगा कि अकेले रहने का अर्थ क्या होता है।”

कितनी ख़राब थी वह!

एक बार राजेश खत्री ने मुझे मेसेज भेजा कि सारे औरतों के साथ रेप और मोलेस्टेशन के आरोप झूठे हैं और 75% रेप केस तो बने-बनाए हुए होते हैं। इसलिए कोई भी चतुर औरत आसानी से किसी भी आदमी को फँसा सकती है। 

मैंने ये सब बातें जोई को बताईं। वह बहुत ग़ुुस्से हो गई और कहने लगी, "व्हाट द हेल! राजेश तो मूर्ख है, मगर तुमसे मुझे ऐसी उम्मीद नहीं थी। भारत दुनिया की रेप कैपिटल है। अगर तुम ऐसी बातें सार्वजनिक मंच पर करोगे तो लोग तुम दोनों पर पत्थर मारेंगे। स्त्री-प्रताड़णा क्या कोई फ़िक्शन है ? अच्छी बात है?” 

मुझे बहुत ख़राब लगा। मैं उस पर पागलों की तरह चिल्लाने लगा, "तुम नारीवादी, अहंकारी, मार्क्सिट महिला हो! मैंने यहाँ आकर ग़लती कर दी।” और मैंने वह जगह छोड़ दी, यद्यपि मैं उसके हाथ का बना स्वादिष्ट डिनर कर चुका था। घर आकर मुझे बहुत ख़ुशी हुई कि मैंने उसे तरह-तरह की गालियाँ दी। 

जोई हमेशा कहा करती थी, शांति ही केवल धर्म है और केवल समझदारों को ही इसकी प्राप्ति हो सकती है। आख़िर क्यों नहीं, वह पुनर्जागरण वाली महिला थी। मुझे ये सारी बातें बकवास लगती थी,छद्म नारीवादिता। एक दिन मैं उसे शनि मंदिर लेकर गया और उसके सामने शनि देवता को तेल की पूरी बोतल चढ़ा दी। 

वह हतप्रभ थी। कहने लगी, "जॉय! एक पत्थर पर कीमती तेल क्यों उड़ेल रहे हो? यह तेल ग़रीब लोगों के खाने के काम आता है न?" उसका प्रश्नवाची लहज़ा मुझे क्रोधित कर रहा था। मैंने धीरे से समझाने की कोशिश की, "शनि भगवान तेल पीते हैं।”

"क्या!! क्यों??"

मुझे उसके ऐसे बेवकूफ़ी भरे प्रश्नों से नफ़रत थी। हमारे बीच वैचारिक मतभेद था। वह रोमिला थापर, अरूंधती रॉय, सोनिया गाँधी के पक्ष में बोलती थी और मैं उन्हें देशद्रोही वामपंथी मानता था। हर शाम को वह पूछती थी, "आज तुमने क्या-क्या काम किया?” मेरे उत्तर होते थे, "मैंने कुछ वेट लिफ़्टिंग की, कुछ पूजा-पाठ किया, ग्रोसरी ख़रीदने बाज़ार चला गया, राजेश खत्री से बातचीत की।” 

उसे कभी भी पता नहीं चला कि मुझे उसके इस प्रश्न से डर लगता था। वह कहा करती थी, "हमें अपने काम, उत्पादकता और सर्जनशीलता से सभ्यता को और सुंदर बनाने में योगदान देना चाहिए।” और मैं सोचता था कि वह बेकार की बात है। वह कहा करती थी, "ख़ाली दिमाग़ शैतान का घर होता है।” मैं सोचता था, शायद वह मेरे लिए कह रही है।

वह महसूस करती थी, हमारे वैचारिक मतभेद हमारे अंतरंग जीवन को भी प्रभावित करते है, ऐसा उसका मानना भी था। लेकिन मैं अपनी ज़रूरतों के बारे में पूरी तरह से जागरूक था। मैं मंगलवार और गुरुवार को छोड़कर हर दिन चिकन और अन्य माँसाहारी खाद्य पदार्थों का सेवन करता था और यहाँ तक कि मैं इन दो दिनों में सेक्स भी नहीं करता था। मैं इन दो दिनों में केवल पूजा-पाठ करता था। शीला मेरे लिए फूल और अन्य सामग्री की व्यवस्था करती थी। जोई तर्क करती थी, "यदि आप माँसाहारी हैं, तो आप किसी भी दिन माँस खा सकते हैं; मुझे नहीं लगता कि भगवान आपको केवल मंगलवार और गुरुवार को ध्यान से देख रहे हैं; उनके पास कुछ बेहतर काम भी होंगे। नहीं तो आपको जानवरों के प्रति दया भाव रखना चाहिए और शाकाहारी बनना चाहिए।” वह ख़ुद शाकाहारी थी। सेक्स के बारे में उसकी कोई ख़ास धारणा नहीं थी; जब भी मेरी इच्छा होती, वह मेरी इच्छाओं का मान रखती थी। कभी-कभी जब उसके ऑफ़िस का कोई महत्वपूर्ण काम होता था, और अगर मैं आग्रह करता था, तो वह इसे जल्दी से जल्दी पूरा करने की कोशिश करती थी। मैं यह जान गया था और इसलिए उससे पूछने लगा, "क्या मैं तुम्हें मजबूर कर रहा हूँ?" वह कहती थी, "नहीं!" 

अगर मेरे उपवास के दिनों में वह ऐसा कोई आग्रह करती थी, तो मैं उसकी तरफ़ ध्यान भी नहीं देता था। मेरा मानना था, महिलाओं को अपनी शारीरिक ज़रूरतों के बारे में मुखर होने की ज़रूरत नहीं है। एक दिन मंगलवार को, उसने मेरे धैर्य की परीक्षा लेने की कोशिश की और मुझे बहकाने का प्रयास किया। मैं उस पर गरज पड़ा, "तुम सप्ताह में दो दिन भी ख़ुद को नियंत्रित नहीं कर सकते हो?" दृढ़ता से उसने उत्तर दिया, "जॉय, मैं तुमसे प्यार करती हूँ और ओर्गज़्म पाना चाहती हूँ। मुझे तुम्हारी आवश्यकता नहीं है। मेरा अपना तरीक़ा है, तुम मेरे सेक्स-टॉय नहीं हो। मैं सिर्फ़ देखना चाहती हूँ कि तुम कितने कर्मकांडी हो। दूसरे दिन कह रहे थे कि मैं मंगलवार और गुरुवार नहीं मानता हूँ, इसका मतलब तुम केवल मज़ाक कर रहे थे!" वह मुझे रँगे हाथों पकड़ लेती थी। वह बहुत स्वतंत्र थी और मज़बूत इरादों वाली भी! और ऐसे लोगों के साथ कौन जीवन बिताएगा ? 

वह वहाट्सऐप मैसेजों में शब्दों और वाक्यों की त्रुटि सुधारने का घृण्य कार्य करती थी। वह एक प्रकार से ओसीडी-बीमारी से ग्रसित थी, जिसे ग्रामर पेंडेंट्री सिंड्रोम कहते हैं। जो कुछ मैं लिखता था, उसमें ध्यानपूर्वक सुधार कर हँसते हुए यह स्वीकार करती थी। 

‘दिन के अंत में,‘ वह भाषण झाड़ती थी "हमें एक संबंध की मूलभूत आवश्यकताओं का ख़्याल रखना चाहिए- प्रथम आवश्यकता है ‘प्रेम‘। हमें असहमत होने के लिए सहमत होना चाहिए और हमारे सारे मतभेदों के बावजूद एक दूसरे को स्वीकार करना चाहिए।” शायद, वह इसका तीसरा बटन था, जिसे मैं कभी भी समझ नहीं पाया। मेरे लिए ज़िंदगी या तो सफ़ेद होती थी या फिर काली। मगर वह धूसर के सारे रंगों में विश्वास करती थी। 

समय मुट्ठी से बालू फिसलने की तरह बहता जा रहा था। मई महीना ख़त्म हो रहा था, और जून के कुछ दिन भी। भारत में लाखों की तादाद में कोरोना का संक्रमण बढ़ गया था और मुंबई सबसे ज़्यादा प्रभावित हुई थी। जिन लोगों को हम अपने जीवन में महत्वपूर्ण मान रहे थे, कोरोना संक्रमण से या तो अवसाद में थे या मौत के शिकार होते जा रहे थे। प्रतिदिन अख़बार मौतों, सरकारी नीतिओं की विफलताओं, आत्महत्याओं से भरे हुए थे, कुछ भी बदलने वाला नहीं था। जोई अभी भी ‘वर्किंग फ़्रॉम होम‘ कर रही थी, इसी दौरान दिल्ली में स्काइप पर उच्च स्तरीय दो-तीन साक्षात्कार देने पड़ रहे थे, जिसमें एक था संघीय सरकार में कैबिनेट सेक्रेटरी की पोस्ट का। 

उन दिनों मैं टीवी देखने के बहाने शीला के साथ अपने कमरे में अधिक समय बिताता था। हमारे घर में सिर्फ़ एक टीवी था, जो शीला और आदर्श के कमरे में लगा हुआ था। जब आदर्श ऑफ़िस चला जाता था, माता-पिता पड़ोसियों के साथ बात करने में व्यस्त हो जाते थे या छत पर चले जाते थे या लंच के बाद अपने कमरे में सो जाते थे, मैं और शीला उसके बिस्तर पर बैठ कर एकता कपूर के सारे टीवी धारावाहिक देखते थे और फिर उसकी कहानियों पर चर्चा करते थे। निस्संदेह, मुझे अच्छा लगता था, जब लोग कहते थे कि एकता कपूर हास्यास्पद महिला हैं, जिसने भारतीय टेलीविज़न को बर्बाद कर दिया है। इसमें मुझे समझदारी महसूस होती थी। 

मैं एक-दो दिन में एक बार जोई से मिला था, वह इत्मीनान से कह रही थी कि कोविड के कारण अपने नज़दीकी लोगों की मृत्यु से वह अवसाद से गुज़र रही है। 

मेरी योजना में जोई अंतिम और सबसे कम प्राथमिकता वाली थी। एक बार मैंने उसे मेसेज किया कि हम इस समय वहाँ मिलेंगे। वह समय की पाबंद थी। भले ही, वह मर जाएगी, लेकिन अपने एपोइटमेंट को रद्द नहीं करेगी, और नहीं एक मिनट की देरी। लेकिन मुझसे हमेशा देरी होती थी, 30 मिनट से लेकर दो घंटे तक, अनपेक्षित रूप से। वह बेचैन हो जाती थी, मुझे फोन करती थी, लेकिन मैंने जवाब देने की कभी ज़हमत नहीं उठाई। आख़िर मेरा एक परिवार था ! और उसके पास कोई नहीं था। उसके ख़ुशी, बैचेनी, इंतज़ार की घड़ियों में मेरे लिए प्राथमिकताएँ होती थीं - माँ की वॉशिंग मशीन चलाने में मदद करना, कपड़े सुखाने, हमारे घर के पर्दे उतारने और बदलने, शीला-आदर्श के लिए ऑनलाइन ऑर्डर देने, परिवार के सदस्यों को मेट्रो में उतारने, बेसमेंट में मेरे दोस्त अमित की मदद करने, इमारत के जल संसाधनों को चालू-बंद करने, मेरे बालों पर मेहँदी लगाना, लंबे समय तक शावर में नहाने आदि बहुत-सी चीज़ें थीं! तो क्या फ़र्क पड़ता,अगर वह अपने सहयोगियों, बॉस, डॉक्टर से अपॉइंटमेंट रद्द कर देती है तो? वह उनके साथ और कभी एपोइंटमेंट ले सकती है, है न? उन घंटों के दौरान वह इंतज़ार करते-करते थक जाती थी और क्रोधित होकर मुझे मेसेज भेजती थी, जिसका मैं कोई जवाब नहीं देता था। वैसे भी मैं उससे दो घंटे या उससे ज़्यादा समय बाद मिलता था। समय का इतना पाबंद होने की क्या ज़रूरत थी ?

भगवान कृष्ण ने जिस तरह शिशुपाल की सौ ग़लतियाँ करने पर अपने सुदर्शन चक्र से गला काट दिया था, उसी तरह जोई भी धैर्यपूर्वक मेरी सौ ग़लतियाँ करने की प्रतीक्षा कर रही थी, संबंध विच्छेद करने से पूर्व। बीच-बीच में, मैं उस पर चरित्र लाँछन के भी आरोप लगा रहा था, जब भी मुझे अच्छा नहीं लगता था, तब उसका किसी सहकर्मी के साथ संबंध जोड़कर व्यंग्य करता था, "और ऑफ़िस में तुम्हारे भाई कैसे हैं? धर्म भाई, है न?” मैं उसे उकसाने की कोशिश करता था, मगर वह शांति से सब-कुछ सहन करते हुए धीमी आवाज़ में कहती थी, "जॉय, तुम मुझसे उम्र में छोटे हो। तुम अभी भी इम्मेच्योर हो। मैं तुम्हें प्यार करती हूँ और तुम्हारा दिल दुखाना नहीं चाहती। इसलिए मैं तुम्हारे फ़ालतू सवालों का जवाब देना नहीं चाहती, यह सोचकर शायद एक दिन तुम सुधर जाओ। लेकिन एक बात कह दूँ, जब तक मैं तुम्हारी ग़लतियों पर बोलती हूँ या तुम्हें समझाने की कोशिश कर रही हूँ या झगड़ा कर रही हूँ, चिल्ला रही हूँ, बहस कर रही हूँ, तब तक हम दोनों के संबंध ठीक हैं। मगर जिस दिन मैं चुप हो गई और तुम्हारी फ़ालतू हरकतों को नज़र-अंदाज़ करना शुरू कर दिया, तब समझ लेना हमारे बीच सब कुछ ख़त्म। संबंध में पीछे क़दम उठाना भी मुझे आता है। केरल के पश्च-जल की तरह मुझे भी पीछे हटना आता है। अगर मैं चली गई तो फिर पीछे मुड़कर नहीं देखूँगी। मेरी चुप्पी से डरना सीखो, जॉय।"

विगत कई महीनों से मेरे मन-मस्तिष्क में यह भाव-प्रवण दमघोंटू आवाज गूँज रही थी। अवश्य, उसने मुंबई छोड़ने के बाद कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। 

*****

पाँच जून, 2020 को फिर से आदर्श का ऑफ़िशियल टूर आ गया, पुणे के लिए। उन्हें एयरपोर्ट छोड़कर, मैं शाम को राजेश खत्री से मिलने गया और दोनों ने वहाँ ख़ूब पी। अपने ऑफ़िस का काम ख़त्म होने के बाद पहले की तरह जोई ने फोन करते हुए मेरे हाल-चाल पूछे। मैंने उत्तर दिया, "हाँ, मैं ठीक हूँ। कल मिलते हैं।"

वह रात आज भी मुझे अच्छी तरह याद है, जब माँ शीला को मेरे कमरे में लायी थी और कहा था, एक रात उसको वहाँ बिताने के लिए, बल्कि मेरे कमरे में दो-तीन रात – यह कहकर कि उसके रूम का ए.सी. काम नहीं कर रहा है। मुझे हिचकिचाहट हुई। माँ चली गई दरवाज़ा बंद कर, टेबल से मेरा मोबाइल उठाते हुए। मुझे बहुत ख़राब लग रहा था, मैं बिस्तर के एक कोने में सोया हुआ था और शीला को फ़र्श पर गद्दा बिछाकर सोने के लिए कहा। वह सो न सकी, कुछ समय तक गद्दे पर उछलती रही, फिर वह उठकर अपने कमरे में चली गई और अपने साथ पॉल जॉन सिंगल माल्ट व्हिसकी की बोतल तथा दो गिलास लेकर आई। उसने मु़झे ऑफ़र किया, मैंने कहा, "मैं पहले से ही ले चुका हूँ, मुझे माइग्रेन है। मैं सोना चाहता हूँ।"

वह कहने लगी, "क्या मैं सिर की मालिश कर सकती हूँ, कम से कम?"

मैंने अपने जीवन की सबसे बड़ी ग़लती की, यह कहते हुए, "हाँ, तुम कर सकती हो।"

आख़िरकर, वह परिवार का हिस्सा थी। उसने एक बड़ा पेग बनाया और मेरे सामने रख दिया और धीरे-धीरे मेरा सिर दबाने लगी। मैंने थोड़ी-थोड़ी व्हिसकी पीना शुरू किया और सिर मालिश का आनंद लेने लगा। उसने और ज़्यादा शराब उँड़ेली और ज़्यादा, आधी रात तक। मुझे यह भी याद नहीं है कि कब उसकी नाज़ुक उँगलियों ने मेरे सिर से हटकर मेरे शरीर के चारों ओर थिरकना शुरू कर दिया था। नहीं चाहते हुए भी, मेरा यौवन जाग उठा था। शरीर में सिहरन उठ रही थी, मुझे जोई का संभ्रम होने लगा था, शीला ने अपने लहसुन जैसे दुर्गंध वाले मुँह से चुंबन कर मेरा मुँह बंद कर दिया। मैं अपना आपा खो बैठा। मैंने ताक़त के साथ उसे उठाया और नज़दीक लाकर अपने शरीर से भींच लिया और उसके सपाट वक्ष-स्थल को सहलाने लगा, उसके मुँह की दुर्गंध को बर्दाश्त करते हुए भी। कुछ ही सैकेंडो में हम दोनों में मानो विस्फोट-सा हो गया और मैं उसके भीतर समा गया। अचानक मैं सो गया, मगर वह सो नहीं पाई। दूसरे घंटे में, अपने दीर्घ चुंबनों से उसने मुझे उठाया और मेरे लिए फिर से सारा घटना-क्रम दोहराना, यंत्रवत, ज़रूरी था। इस बार मैं नहीं थका, व्हिसकी ने अपना काम किया। शीला ने कई सालों से अपनी उर्जा बचाकर रखी थी, केवल मेरे लिए और दोनों बार उसने मेरे कानों में यही बात बुदबुदाई। 

अगली सुबह, जब मैं उठा तो चकित रह गया, उसके मर्दाना सपाट नग्न शरीर के पास मुझे सोया देखकर। 

"बाक़ी लोग कहाँ है? तुम यहाँ क्यों हो?" 

"शांत हो जाओ जयंत, मम्मी-पापा कल रात से रिश्तेदारों के घर चले गए हैं। चार दिनों के बाद लौटेंगे।”

मुझे ऐसा लग रहा था, जैसे किसी ने मेरा गला दबा दिया हो। पूरे दिन भर मैंने अपना मोबाइल बंद रखा, वह डाइनिंग टेबल पर पड़ा हुआ था। दरवाज़ा बंद करके पूरे दिन सोता रहा, शीला ने जो कुछ भी टेबल पर रखा था, उसे चबाते हुए। शायद वह भी पूरे दिन सोती रही। शाम को, आठ बजे के आस-पास, शीला मेरे रूम में डिनर लेकर आई और साथ में व्हिसकी भी। खाने-पीने के बाद उसने मुझे ज़ोर से अपनी तरफ़ खींच लिया, मैं अपने आपको रोक नहीं पाया। 

तीन दिनों तक ऐसे ही चलता रहा, हमने कई बार संभोग किया (नहीं, हमने प्यार नहीं किया), जब तक कि मैं ख़ाली नहीं हो गया। 

चौथे दिन, नौ बजे के आस-पास, हमारे घर की घंटी बजी। शीला ने दरवाज़ा खोला। अपनी क़सम तोड़कर जोई ने दौड़ते हुए हमारे घर में प्रवेश किया, उसने मुझे संदिग्धावस्था में देखा। वह अपना मॉस्क पहने हुई थी, नाक और मुँह ढककर सीधे वह मेरे कमरे में घुसी और मेरे बिस्तर पर बैठ गई। वह अपना धीरज खो चुकी थी, इन चार दिनों की नीरवता वह बर्दाश्त नहीं कर पाई। 

"यह क्या है, जॉय?"

मैं नहीं समझ पाया, उसे क्या उत्तर दूँ। शीला उसे घर के बाहर जाने के लिए कह रही थी, मगर उसने उसकी तरफ़ बिल्कुल ध्यान नहीं दिया। बल्कि जोई सोच रही थी, कहीं मुझे बुखार नहीं हुआ हो या कहीं कोविड पॉज़ीटिव नहीं निकला हो। 

अचानक उसने मेरे ओढ़ी हुई पतली चादर को हटाया, मेरा तापमान देखने के लिए, तो उसने देखा मैं बिस्तर पर निर्वस्त्र था और चादर के नीचे जहाँ-तहाँ शीला के अंडरगारमेंट बिखरे हुए थे। वह ग़ुस्से से भिनभिना उठी और चिल्लाते हुए कहने लगी, "ये क्या तमाशा है जॉय? तुम तो ठीक-ठाक हो, फिर चार दिनों से तुम्हारा मोबाइल बंद क्यों था? यह औरत तुम्हारे कमरे में क्या कर रही है? तुम्हारे कपड़े कहाँ है? ये कपड़े किसके हैं? तुम्हारे माता-पिता और बाक़ी लोग कहाँ गए हुए हैं?”

शीला बीच-बचाव करते हुए कहने लगी, ”मैडम, आप यहाँ से इसी वक़्त चली जाइए। मम्मी-डैडी कल आएँगे, वे अपने रिश्तेदारों के घर गए हैं। हम एक हैं, मैं और जयंत। शायद सारी चीज़ें समझ गईं होंगी?” 

जोई सिंक के पास जाकर उलटी करने लगी, उसकी यह आदत थी, जब वह अपना तनाव बर्दाश्त नहीं कर पाती थी तो उसकी साँसे फूलने लगती थी और उलटी होना शुरू हो जाता था। 

जोई फिर मेरे पास आई और ख़ूनी दृष्टि से मेरी तरफ़ देखने लगी। वह हाँफ रही थी, उसके गाल पर आँसू लुढ़क रहे थे। अपने आँसुओं को पोंछते हुए वह कहने लगी, ”जॉय, तीन दिनों से तुम इस औरत के साथ इस ब्लडी घर में ताला-बंद हो और वे कपड़े उसके हैं, चारों तरफ़ तुम्हारे कमरे में बिखरे हुए? क्या तुम उसके आदमी हो, मूर्ख, पागल? इस घर में यह क्या चल रहा है? क्या मैं तुम्हारे लिए पर्याप्त नहीं थी? मैं तुम्हारा ख़ून कर दूँगी!!”

मैंने उत्तर दिया, ”मैडम, मैं तुम्हारा गुलाम नहीं हूँ। तुमने मुझे नौकरी नहीं दी है,समझी? शीला पर चिल्लाने की कोई ज़रूरत नहीं है, वह मेरे परिवार का हिस्सा है। तुम जा सकती हो।”

"सही कह रहे हो? तुम जैसे निकम्मे आदमी! मुझे तुमसे नफ़रत है।” उस समय उसके पास नफ़रत के भाव प्रकट करने के लिए शब्द कम पड़ रहे थे। 

जोई बिजली की गति से मेरा रूम छोड़कर चली गई, मेरी तरफ़ घृणा की दृष्टि से देखते हुए। उस समय वह भयानक और हिंसक लग रही थी। 

अंतिम बार मैंने उसे इस रूप में देखा था। मम्मी-डैडी घर आ गए थे। शीला को लेकर मम्मी रसोई-घर की ओर चली गई और दबी हुई आवाज़ में कानाफूसी करने लगी। 

आदर्श पुणे से वापस आ गया। मम्मी मुझे कहने लगी, ”अगर जोयिता मैडम चाहती है कि तुम उसके साथ काम करो, तो उसे पहले ‘सॉरी‘ बोलना पड़ेगा, क्योंकि उसने तुम्हें निकम्मा कहा है। वह कौन होती है? क्या वह तुम्हें खिला रही है। मैं अपने बेटे का पालन कर रही हूँ।”

शीला ने मम्मी को अच्छी तरह से सब-कुछ समझा दिया था। 

मेरा किसी से मिलने या बातचीत करने की इच्छा नहीं थी। लगभग दो हफ़्ते या ज़्यादा होंगे, मैंने अपना दरवाज़ा बंद रखा। पानी पीने या खाना खाने के समय ही खोलता था। जब भी मैं पानी पीने के लिए रसोई में आता था तो मैंने शीला को कभी भी हॉल या किचन में नहीं देखा और जब भी आदर्श मुझे देखता था, अपनी निगाहें घुमा लेता था। मैंने मम्मी-डैडी को यह कहते सुना था कि जोई बिल्डिंग छोड़कर चली गई है,सच में, मुंबई से दिल्ली-अपना नया कार्यभार ग्रहण करने। मम्मी ने डैडी को बताया कि उसने बिज़नेस का सारा लाभांश और बैंक खाते का सारा धन मम्मी के खाते में ट्रांसफ़र करवा दिया है। उसने अपने पास एक भी रुपया नहीं रखा, यद्यपि यह उसका बिज़नेस था। फिर भी उसने मम्मी के नाम नोट लिखकर अपना बैंक खाता बंद कर दिया था। 

जोई खातों का काम जानती थी। उसके दिनों के बाद मैंने उसका मेल पढ़ा। जुलाई में शीला की प्रेगनेंसी कंफ़र्म हुई। उसका लहसुन खाना बंद हो गया और धीरे-धीरे मुझसे मिलना भी। माँ उस चीज़ का विशेष ध्यान रखती थी। 

वास्तव में, मुझे घर के ऊपर के माले में शिफ़्ट कर दिया गया था, जहाँ जवान लड़के किराएदार थे, माँ ने एक रूम मेरे लिए ख़ाली करवा दिया और वह मुझे आशा, नौकरानी के हाथों चाय-नाश्ता खाना भिजवा देती थी। हाँ, हमने जब से शीला गर्भवती हुई थी, तबसे नौकरानी को रख ली थी। 

आदर्श ने अपनी गर्भवती पत्नी को स्वीकार कर लिया था। उसे करना ही था। बाद में मुझे पता चला था कि वह हमारे परिवार द्वारा सोची-समझी साज़िश थी, बच्चे के ख़ातिर। हालाँकि जोई ने पहले से ही इसका अंदाज़ा लगा लिया था। यह बात नहीं थी कि मेरी नई ज़िंदगी और नए रूम में जोई की याद नहीं आती थी, बल्कि मैं उसके पास जाना ही नहीं चाहता था। कभी- कभार मैं गूगल पर उसे खोज लेता था। वह पब्लिक फ़िगर थी, उसका जीवन पारदर्शी था। मैं सब-कुछ जानता था कि वह अपनी नई भूमिका में दिल्ली में क्या कर रही है और मेरे पास उसके ख़िलाफ़ बोलने के लिए कुछ भी नहीं था। मैंने उसके बग़ैर जीना सीख लिया था। राजेश खत्री अधिकतर मिल जाया करता था, जबकि दूसरे दोस्तों ने मुझसे दरकिनार कर दिया था। उनका मेरे ऊपर से विश्वास उठ गया था या फिर जोई का बिज़नेस खोने की वज़ह से मेरे अनिश्चित भविष्य देखकर। 

जोई मेरे लिए अंतर्धान हो गई थी, कुछ भी यादगार के चिह्न छोड़े बिना। वह अपने साथ निस्संगता लेकर गई और मेरे लिए छोड़ गई स्मृतियाँ।  उसके बाथरूम में मेरे द्वारा छोड़े गए विमल साबुन के टुकड़ों और फूलदार टुथब्रश का पता नहीं, उसने क्या किया होगा? उसने मेरी कमीज़ का क्या किया होगा, जो मैं उसके घर पहनता था? उसके रेफ्रिजेरेटर में रखे मेरे बीयर का क्या किया होगा? तरह-तरह के सवालों का झंझावात मेरे मन में पैदा हो रहा था। 

दिसंबर 2020 तक कोरोना का कहर समाप्त हो गया था। ज़िंदगी फिर से अपनी पटरी पर लौटने लगी थी। क्वारेंटीन के बाद, लोग नए तरीक़े से सामान्य होने लगे थे, मास्क पहनकर किसी के पास तभी जाते थे, जब जाना ज़रूरी होता, दोस्तों, सगे-संबंधियों, मेहमानों और यहाँ तक जन-स्थानों पर जाना पसंद नहीं करते थे। अधिकतर शाम का समय मुझे खाने दौड़ता था, जोई के साथ गुज़री शामों की यादें आती थीं। 

अप्रैल 2021, शीला ने एक बच्चे को जन्म दिया, आदर्श के सिवाय सभी ख़ुश थे। माँ ने ऐसी व्यवस्था कर दी थी कि वह बच्चा कभी भी मेरे पास नहीं आए। समय बीतता गया। सन 2024 में, जब बच्चा चार साल का हुआ तो रिश्तेदार कहने लगे, ”ओह.... बच्चा अपने ताऊ जयंत पर गया है। वैसे ही भूरे बाल, गुलाबी होंठ और गोरी त्वचा। आह.. कितना मासूम लग रहा है!”

आदर्श ने रिश्तेदारों से मिलना-जुलना बंदकर दिया। शीला और आदर्श तेज़-तर्रार दंपती थी, वे अपनी और हमारी संपत्ति का अच्छी तरह हिसाब रख रहे थे। विगत दस-पन्द्रह सालों मे आदर्श हमारे घर का ख़र्च उठा रहा था और मम्मी-डैडी आँख बंदकर उनके लेखा-जोखा पर विश्वास कर रहे थे। इसलिए वे बिना कुछ पूछताछ किए, जहाँ कहा जाता था, उस पर हस्ताक्षर कर देते थे। इस वर्ष जनवरी में, हमें कोर्ट से एक नोटिस आया कि बिल्डिंग के नौ घरों में से एक घर, जिसमें अंकल-आँटी रहते थे, उसे छोड़कर सभी आदर्श-शीला की वैध संपत्ति बन चुके थे। मम्मी-डैडी बर्बाद हो गए थे। वे हमारे पुश्तैनी गाँव पोड़ी चले गए। माँ भी मुझे अपने साथ ले जाना चाहती थी, क्योंकि आख़िरकर मैं उनका गर्वीला अधिकार था। 

नहीं, मैं और गाँव जाना नहीं चाहता था। मैं वहाँ जाकर करूँगा भी क्या? मैं जोई को वापिस पाना चाहता था। मुझे हमारा बिज़नेस फिर से चाहिए था। मैंने उसके ई-मेल की पंक्तियों को कई बार पढ़ा, फिर से पढ़ा, ”जहाँ भी मैं जाऊँगी, एक रूम, प्यार तुम्हारे लिए रखे मिलेंगे।” क्या दिल्ली की इस आलीशान बंगले में उसने मेरे लिए कोई रूम रखा होगा? कौन जानता है, क्या पता? मैंने गहरी आह भरते हुए उसके घर की तरफ़ निगाहें घुमाई। इस बार हमारा दस सदस्यों वाला परिवार बिखर चुका था, अलग-अलग क़स्बों में अलग-अलग घरों मे और मैं ख़ुद दिल्ली की गलियों में भटक रहा था। एक बड़ा भरा-पूरा ख़ुश-मिज़ाज भारतीय परिवार का अस्तित्व ख़त्म हो चुका था। 

आह.. जोई... मैंने ऐसा क्या किया? क्यों मैंने हमारे लिए ऐसा किया? हम अपने लिए क्या-क्या करते?

मेरी ज़िंदगी में तुम्हारी परछाई अभी भी बची हुई है। तुमने हमारे जीवन की सममिति संरचना को तोड़ दिया। 

*****

आज जीवन के इस मोड़ पर मुझे सब-कुछ याद आने लगा। क्या बहुत देर हो चुकी है? उसके घर के सामने वाले विशाल दरवाज़े पर, दो बंदूकधारी सुरक्षा प्रहरी दिल्ली की सर्द भरी रातों में गश्त लगा रहे थे। सारी चीज़ें मेरे संभ्रम में जुड़ती जा रहीं थीं। 

जनपथ मार्केट की तरफ़ धीमे-धीमे क़दम बढ़ाते हुए, मैंने एक बंजारिन को देखा चूड़ियाँ बेचने वाली, हाड़कंपाती सर्दी से बचने के लिए पूरे कपड़े पहने हुई थी। उसके हाथों में दो बर्गर थे। उसने एक मेरी तरफ़ बढ़ाया, मैंने बिना हिचकिचाहट के उससे ले लिया, वह उदार थी और समझदार भी। 

”ओए चिकने, मैंने देखा है कि तुम पूरे दिन से इस बंगले की तरफ़ घूर रहे हो। माजरा क्या है? कुछ काम करना चाहते हो? उस घर की मालकिन अच्छी औरत है, वह हम झोपड़पट्टी वालों को दान भी करती है। मैं हर सप्ताह उसके घर की दीवारें और बगीचा साफ़ करती हूँ, कल मैं तुम्हें उसके गार्ड के पास ले जाऊँगी।"

मैं ऊनींदा था, उसने मुझे एक थैली पकड़ाई। शरीर और दिमाग़ में हल्का-हल्का दर्द हो रहा था। फिर उसने मुझे शराब के प्लास्टिक का पैकेट दिया, जिसे दिल्ली वे लोग ‘पव्वा‘ कहते हैं। मैं सो गया, गहरी नींद सोने की मेरी आदत पड़ गई थी। मेरा मस्तिष्क शून्य था और आधी रात को मेरे हाथों ने महसूस किया शीला की तरह सपाट वक्ष वाली बंजारन औरत के स्पर्श को, उसके मुँह से भी लहसुन की गंध आ रही थी। 

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