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रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु मुक्तक - 2

1.
बस्ती एक बसाई थी कल
वहाँ पर ढेरों फूल खिलाए।
आज पहुँचकर सन्नाटे में
आशाओं की पौध लगाएँ॥ 
2.
नहीं हम रहे रोशनी चुराने वाले
हम अँधेरों में दीपक जलाने वाले।
यही सूरज से सीखा, चाँद से जाना
सदा चमकते उजाला लुटाने वाले॥
 3.
तूफ़ानों में दीपक जलाते चलें
हर मुश्किल में हम गीत गाते चलें।
चलना जिसे साथ वह ख़ुशी से चले
हर दुखी को गले से लगाते चलें॥
 

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