अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई कतआ

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

सच्चाई की जीत

ज्ञानपुर नामक गाँव में एक बुद्धिमान् व्यक्ति रहता था। उसका नाम था बुद्धिराज। गाँव वाले उसका बहुत आदर करते थे। एक बार बुद्धिराज घूमने के लिए दूर के एक गाँव में चला गया। उस गाँव का एक किसान बुद्धिराज की बातों से बहुत प्रसन्न हुआ।

किसान ने ख़ुश होकर अपनी सबसे सुन्दर गाय बुद्धिराज को भेंट में दे दी। वह गाय ख़ूब दूध देती थी।

बुद्धिराज गाय को लकर अपने गाँव की तरफ़ चल दिया। शाम हो गयी थी। गाँव तक पहुँचने में रात हो जाएगी। बच्चे गाय को देखकर बहुत ख़ुश होंगे। सबको सुबह–शाम दूध पीने को मिलेगा। गाय का नटखट बछड़ा उछलता–कूदता साथ–साथ चल रहा था।

एक ठग की नज़र गाय पर पड़ी। वह बुद्धिराज के पास पहुँचा ओर बोला– "बहुत प्यारी गाय है। बहुत दूध देती होगी।"

"हाँ, छह सेर दूध देती है।"

"तब तो यह गाय मेरे लिए बहुत अच्छी रहेगी,"– कहकर ठग ने बुद्धिराज के हाथ से गाय का रस्सा छीन लिया – "अब यह मेरी गाय है, तुम्हारी नहीं।"

"चोर, चोर!"– कहकर बुद्धिराज चिल्लाया।

शोर सुनकर आसपास के सभी लोग इकट्ठे हो गए। ठग बोला– "भाइयों यह मेरी गाय है। इसने ‘चोर–चोर’ की आवाज़ लगाकर आप सबको इकट्ठा कर लिया है। मुझे चोर कहने से यह गाय इसकी नहीं हो जाएगी।"

"यह झूठ बोल रहा है। यह गाय मेरी है। अगर यह मेरे हाथ से गाय का रस्सा न छीनता तो मैं क्यों चिल्लाता?"

"मैं यह गाय सौ रुपए में ख़रीद कर लाया हूँ,"– ठग ने कहा।

"मुझे यह गाय एक किसान ने भेंट में दी है,"– बुद्धिराज बोला।

"भाइयों, अब आप ख़ुद ही समझ लो। यदि यह गाय इसकी होती तो यह दाम ज़रूर बताता। भेंट में मिलने की बात यह इसलिए कह रहा है क्योंकि यह गाय इसकी नहीं है।"

"यह गाय मेरी ही है,"– बुद्धिराज ने कहा।

"तुम कैसे कह सकते हो कि गाय तुम्हारी ही है?"– ठग हँसा।

बुद्धिराज ने अपनी दोनों हथेलियों से गाय की दोनों आँखें ढक लीं – "यह गाय अगर तुम्हारी है तो बताओ, इसकी कौन सी आँख कानी है?"

ठग घबरा गया। उसने गाय की आँखें ठीक से देखी ही नहीं थी। वह हिम्मत करके बोला – "इसकी दाईं आँख कानी है।"

"आप सब सुन लें। यह दाई आँख कानी बता रहा है,"– बुद्धिराज ज़ोर से बोला।

"नहीं, नहीं! इसकी बाईं आँख कानी है,"– ठग ने हिम्मत करके कहा।

बुद्धिराज ने गाय की आँखों से अपनी दोनों हथेलियाँ हटा लीं – "आप लोग अच्छी तरह से देख लें। इस गाय की दोनों आँख कानी नहीं है।"

ठग भागने को हुआ लेकिन लोगों ने उसको पकड़ लिया। सबने उसकी ख़ूब पिटाई की। ठग ने सबके सामने क़सम खाई –"मैं अब कभी ऐसा काम नही करूँगा।"
 

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

आसमानी आफ़त
|

 बंटी बंदर ने घबराएं हुए बंदरों से…

आख़िरी सलाम
|

 अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिता में…

इमली
|

"भैया! पैसे दो ना!" वैभव ने कहा …

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

साहित्यिक आलेख

बाल साहित्य कविता

गीत-नवगीत

लघुकथा

सामाजिक आलेख

हास्य-व्यंग्य कविता

पुस्तक समीक्षा

बाल साहित्य कहानी

कविता-मुक्तक

दोहे

कविता-माहिया

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं