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वो हवा शोख पत्ते उड़ा ले गई

वो हवा शोख पत्ते उड़ा ले गई
शाख़े-गुल को भी आख़िर दग़ा दे गई।

 

जिंदगी मेरी मुझसे ज़िया ले गई
किसलिये मौत आकर सज़ा दे गई।

 

शोख़ियाँ तो छुपाकर रखी थीं, मगर
मेरी मुस्कान मुझको दग़ा दे गई।

 

जो समझती रही वो नहीं तुम रहे
मुझको पैग़ाम जिन्से जफ़ा दे गई।

 

आ गई मौज हलकी सी साहिल पे क्या
आनेवाला है तूफ़ाँ, पता दे गई।

 

हिज्र की आग में दिल सुलगता रहा
बारहा याद देवी हवा दे गई।

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