ईश्वर का सानिध्य
काव्य साहित्य | कविता डॉ. विनीत मोहन औदिच्य15 Jun 2026 (अंक: 299, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
हठात् अपने प्रतिबिंब को
दर्पण में निहार कर
हतप्रभ रह गया हूँ मैं।
सिर पर श्वेत हो चले केश
आँखों के नीचे गहरे काले गड्ढे
त्वचा पर उभर आईं झुर्रियाँ
हाथों व पैरों की नसें।
समय का त्वरित वेग
ले आया है कदाचित् जरावस्था
या हैं यह रुग्णावस्था के लक्षण।
आश्चर्य! मन किंचित नहीं भयभीत
वरन् प्रफुल्लता से आलोड़ित
प्रस्तर वक्ष से फूट पड़ी है
मानो उत्साह की नन्ही कोंपल।
ईश्वर के चरणों का सानिध्य
प्रदान करता है गहन संबल
आत्मविश्वास, सुरक्षा व आत्मबल
प्रत्येक चुनौती का सहर्ष साक्षात्कार करने का॥
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