पथिक
काव्य साहित्य | कविता डॉ. विनीत मोहन औदिच्य15 Jun 2026 (अंक: 299, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
(सॉनेट)
अगनित कष्टों में तप कर ही, जीवन का मधुमास सँवरता।
जितनी सहो अनकही पीड़ा, उतना ही व्यक्तित्व निखरता।
समय की आँधी चले घोर पर, टूट के इंसा नहीं बिखरता।
पी कर अनुभव कालकूट भी, कंठ के नीचे कहाँ उतरता?
घर के चूल्हे को सुलगाने, पुनः दधीचि अस्थियाँ गलायें।
स्वजनों की स्मित अभिलाषा पूर्ति देख, बहुधा हर्षायें।
ग्रीष्म, शीत, बारिश, पतझड़ में श्रम से अपनी त्वचा सुखायें।
कटु प्रवंचना सह कर मानो, दुख सागर के पार न जायें॥
साहस, दया, भक्ति, करुणा का, कभी साथ मत छोड़ो।
हों विपत्तियाँ चाहे जितनी, सच्चाई से मुख मत मोड़ो।
ईश्वर का सब अंश हैं मानव, ग़लत राह भूले, मत दौड़ो।
पुण्य कर्म ही साथ जाएगा, घड़ा पाप का निज तुम फोड़ो॥
पथिक! हार कर राम नाम से, तोड़ न लेना तुम नाता।
राम नाम के बिना यह जीवन, बस निष्फल है हो जाता॥
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