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तखत की ताकत

एक मशहूर आलोचक का कहना है, जैसे कहानी को उपन्यास का छोटा स्वरूप नहीं कह सकते उसी तरह लघुकथा को कहानी का छोटा अंश नहीं माना जा सकता है। कहानी कहानी है और लघुकथा लघुकथा। अगर कहानी शोला है तो लघुकथा चिंगारी है, पर है विचारों की लेनदेन जो भाषा द्वारा आदमी और समाज के विकास को क़ायम रखती है।

लघुकथा और कहानी को एक दूजे से अलग कर पाना मुश्किल है। लघुकथा अपनी लघुता में प्रवेश करके संवाद करती है, कहानियाँ अपने कथ्य और शिल्प के द्वारा, सामाजिक परिस्थितियों से गुज़रते हुए कुछ अनुभवों को एक सूत्र से बाँधती हुई मानवता का प्रतीक बनती रहती हैं। हमारे सिंधी समाज के जाने माने लेखक-संपादक-पत्रकार स्व. श्री जीवतराम सेतपाल जी ने ‘प्रोत्साहन’ के संपादकीय में इसके बारे में लिखा था, “लघुकथा आनंद की बौछार है, बरसात नहीं, होंठों की मुस्कान है, हँसी या ठहाका नहीं, यह मधुर गुदगुदी है, खुजली नहीं। लघुकथा फुलझड़ी है बम नहीं।”

हर लेखक की अपनी-अपनी राय है, अपनी अपनी अभिव्यक्ति है जो शब्दों में व्यक्त करते हुए लघुकथा के महत्त्व को दर्शाती है। श्री हरिशवंश राय बच्चन जी के शब्दों में, “लघुकथा का अपना महत्त्व है। सूरज को तिनका बनने के लिए कहा जाय, तो कितनी बड़ी मुसीबत उसके सामने आकर खड़ी होगी।” सच ही तो है—‘लघुकथा’ कलेवर में लघु होने के बावजूद भी रचनात्मक अस्तित्व से मानव मन के मर्म को छूकर अपना एक स्थायी प्रभाव अपने पाठक पर छोड़ती है। शायद इसलिए कि जन-जीवन की रोज़मर्रा के जीवन के, आस-पास घटित घटनाओं को थोड़े शब्दों में ज़ाहिर करने में अपनी दक्षता उसे हासिल हो गई है। अपने लघु आकार में कथा के तत्त्व की मौजूदगी की महत्त्वता ज़ाहिर कर पाना उसकी ज़रूरत है, जो वह इशारे से बयान कर देती है, परिभाषित नहीं करती।

2017 में मेरे पहले लघुकथा संग्रह “और गंगा बहती रही” पर आदरणीय हेमन्त उपाध्याय जी की सशक्त लेखिनी के हस्ताक्षर मेरे संग्रह के पहले पन्ने को सुशोभित करते रहे। उन्हीं के शब्दों में आज उनके लघुकथा संग्रह “तखत की ताक़त” की अनेक लघुकथाओं को पढ़ते हुए यहाँ दोहरा रही हूँ। “उपन्यास सौ से पाँच सौ पृष्ठ का होता है,  कहानी दो से दस पृष्ठ की होती है तो लघुकथा मात्र दो चार लाईन से एक डेढ़ पेज तक की ही होती है। लघुकथा में गहराई भी होती है विशलता भी होती है। अर्थात् लघुकथाएँ होती तो सूक्ष्म हैं किन्तु अर्थ स्थूल प्रदान करती हैं इसीलिए तो कहा गया है ‘देखने में छोटी लागे घाव करे गंभीर’।

श्री कान्ता राय जी ने अपनी प्रस्तावाना में अनेक कथाओं का विश्लेषण करते हुए लिखा है, “संस्कारित परिवेश में रची-बसी लघुकथाओं की मोहकता पाठक के मन को संतुष्ट करती है एवं ऐन्द्रिय चेतना को पुष्ट भी करती है। मंदिर की घंटियों का मधुर स्वर, भिखारियों के कोलाहल में नदी का स्वर और चिड़ियों की चहचहाहट की बसाहट इस पुस्तक को सामर्थ्यवान बनाती है।”

सच कहा है, वह सच जो नाकारा तो जा सकता है पर ग़लत है यह साबित नहीं किया जा सकता। जीवन के सच्चाई सामने रहती है, आँख मींच लेने से उससे दूर नहीं भागा जा सकता।

“तखत की ताक़त” के सृजनहार आदरणीय हेमन्त उपाध्याय जी की लेखन कला से गूँथी हुई १५० लघुकथाओं की वह कृति है, जिसमें जीवन से जुड़ी अनेक घटनाओं का ज़िक्र करती वेदनाएँ हैं, संवेदनाएँ हैं, कभी ख़ुशी कभी ग़म की झलकियाँ हैं, जो पन्ने पलटते कभी आँखों में सपने भर देती हैं, तो कभी सपनों का बना बनाया घरौंदा पल में बिखेकर आँखों को नम कर जाती हैं।

संग्रह के आगाज़ी पन्नों में अपना मत लिखते हुए आदरणीय नर्मदा प्रसाद उपाध्याय जी ने क्या ही सुंदर शब्दों में लघुकथा, कहानी व उपन्यास का विश्लेषण करते हुए लिखा है—कहानी या उपन्यास बादल हैं और लघुकथा बिजली, जो आकाश में जैसे ही कौंधती है उसकी चमक धरती पर उतर आती है। यह एक हक़ीक़त है, बिजली गरजकर अपनी अस्तित्व का ऐलान करती है।”

लघुकथा संपूर्ण अर्थों में विस्तृत विधा है। उस विस्तार से कुछ कथाएँ जो मेरे मन को छूते हुए कुछ जाने-पहचाने अहसाओं से जोड़ती रही है। ये आज के समय की एक सच्चाई है जो अब घर-घर की कहानी बनती जा रही है: माता-पिता का स्थान आदि-जुगादि से प्रथम माना जाता है। उनकी लघुकथा “माता-पिता का स्थान” आज के समय की एक ऐसी तस्वीर है जिसे देखते हुए भी अनदेखा किया जा रहा है। उल्लेख हुआ है: “दशहरे के दिन वृद्ध आश्रम में मिलनोत्सव मनाया गया। आए सभी स्वजनों ने अपनी ख़ुशी ज़ाहिर करते हुए ख़ुद अपने माता-पिता का गुणगान करते हुए अपने मनोभाव व्यक्त किये। वृद्ध आश्रम की साध्वी ने मौक़ा देखकर इस संकेत से सभी के सामने रखते हुए आग्रह किया कि ‘आज का दिन माता-पिता के साथ दिनभर बिता कर आपको आनंद प्राप्त हुआ है, अगर आप उन्हें घर ले जाओगे तो रोज़ ख़ुशी प्राप्त करोगे। कौन-कौन अपने माता-पिता को अपने साथ ले जाना चाहता है?’

फिर तो देखने वाली बात यह थी कि सब चेहरों से ख़ुशी छूमंतर हो गई।”

कहने का अर्थ यह है कि आज के दौर में कथनी और करनी में कोई तालमेल नहीं। दुख तो इस बात है कि आज की पीढ़ी जाने कौन-सी बुनियाद पर अपने आने वाले कल की नींव रख रही है।

लघुकथा ‘माटी का मोल’ मूँगफली बेचने वाले उस किसान की अपनी निजी सोच का प्रतिफल है, जो उस माटी के अनमोल मूल्य की क़द्र जानता है और यही उसके आचरण और संस्कृति का परिचायक बना है। हेमन्त जी ने बहुत ही सरल सुगम युक्ति से किसान और व्यापारी के चरित्र को उजगार करते हुए यह शिक्षाप्रद कथा बुनी है। ऐसी अनेक लघुकथाएँ लेखक के सिद्धांतमय सोच की उपज हैं जो समाज में रहते हुए जीवन के कई पड़ावों पर मार्गदर्शक बनकर सामने आती हैं।

‘धैर्य और संतोष’ में मल्लाह का बीच मंझदार में अपनी नौका पर सवार लोगों को सुकुशल पार लगाने के दायित्व को अंजाम देने का संकल्प सफल रहा। यह निष्ठा भाव तेजस्वी सोच की उपज है।

एक और लघुकथा जिसने मेरा ध्यान आकर्षित किया वह है ‘दहेज़ का लोभ’ मानव मन की लालसा का एक विचित्र पहलू है। अपने ही घर के बँटवारे के बाद भी मुनाफ़े का लालच मन में लिए बेटे की चाह रखता है जो शादी में दहेज़ ले आएगा, पर बेटी का कन्यादान करके सबाब कमाने की बात सोच ही नहीं पाता। ऐसा स्वार्थी इंसान जो अपना घर न बचा सका, जब पति-पत्नी का नाता न निभा सका, वो आगे बाप-बेटे, बेटे-बहू का घर-परिवार को संगठित रख पायेगा, यह कैसे सोच सकता है?

सोच प्रधान है, बहुत ही सीख देती लघुकथाएँ जो विचारों में हलचल मचा देती हैं और सोचने पर विवश करती हैं—जैसे त्याग और तपस्या, मालिक और नौकर, समाज में रहते हुए सही राह पर चलने के निर्णय लेकर जीवन को सरल बनाने की प्रथा को सामने रखती हैं। आदरणीय हेमंत उपाध्याय जी की क़लम की नोक के तेवर हर लघुकथा में कहीं न कहीं उज्वल राह करते हुए आगे बढ़ते हैं, इसमें कोई दो राय नहीं।

यह संग्रह हर पाठक वर्ग के घर में उपस्थित रहे और बच्चों को इससे कुछ सीख मिले ताकि आने वाले पीढ़ी अपना जीवन और समृद्ध कर पाएँ, इसी मंगल कामना के साथ संग्रह के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ।

—देवी नागरानी

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