अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य ललित कला

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा वृत्तांत डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

अनपढ़ माँ

यूँ तो गोमती रोज़ ही अपने बहू-बेटे को सर फेंक कर काम में जुटा देखती, लेकिन पिछले कुछ दिनों से उसने जो जुनून उनमें देखा, ऐसा पहले कभी नहीं देखा! - दिन-रात वह दोनों कमप्यूटर पर दीदे गड़ाए रहते। आपस में खुसुर-पुसुर करते, आशा-निराशा साफ़ उनके मुख पर तैरती नज़र आती। ऐसा आभास होता जैसे किसी ख़ास काम की खोज में हों। कई बार अंग्रेज़ी में किसी से फोन पर भी लम्बा वार्तालाप करते सुना, पर गोमती ने कभी कुछ पूछा नहीं। जब कभी भी वह उनके आस-पास उपस्थित होती तो बहू-बेटा अचानक अंग्रेज़ी में बतियाने लगते। पिछले कुछ दिनों से कभी-कभार बेटा माँ से लाड़-प्यार भी जताने लगा था। और तो और, सास की कही बातों पर अचानक बहू ने मुँह फुलाना भी छोड़ दिया था। यह सब देख गोमती मन ही मन बुदबुदाती, "हो ना हो कुछ घुईंयाँ तो पक रही हैं।” कभी वह अनजानी शंका में घिर कर ख़ुद ही मन को ढा लेती और कभी ख़ुद ही ढाढ़स दे फिर कामों को निपटाने में लग जाती। कुछ ही दिनों बाद घर का माहौल बदला-बदला सा लगने लगा। बहू-बेटा चहके-चहके से नज़र आने लगे। चारों ओर अचानक अबोली ख़ुशी का नाद सुनाई देने लगा। कुल मिला कर कहें तो घर में रामराज्य सा हो गया।

छुट्टी का दिन था, माँ ने मेज़ पर नाश्ता लगाया। मनपसंद व्यंजन देखते ही बेटा बोला, "अरे वाह! क्या बात है माँ, आज तो सब कुछ अपने बहू-बेटे की पसंद का बनाया है।"

फीकी सी मुस्कान देते गोमती बोली, "अरे खा लो बेटा, क्या पता फिर कब! अच्छा, यह तो बता कब का जाना तय किया है विदेश?”

यह सुनते ही, पति-पत्नि एक दूसरे को आवाक देखते रह गए। उनकी आँखें ऊपर की ऊपर ही टँगी रह गईं और मुँह तो जैसे निवाला चबाना ही भूल गया। बिना उनकी ओर ताके गोमती बोली, "अरे! खाओ भई, रुक क्यों गए? क्या अच्छा नहीं लगा?”

सकपकाते हुए से दोनों एक साथ ही बोले, “ नहीं-नहीं, बहुत स्वादिष्ट बना है। लेकिन माँ, तुम्हें किसने बताया हमारे जाने का?”

"तेरी माँ भले स्कूल ना गई हो बेटा, पर उसकी आँखें बहुत पढ़ी-लिखी हैं। जीवन में अनुभवों की कई जमातें पास की हैं उसने। फिर तुम्हारी गुलाबी मुस्कानों के पीछे का पढ़ लेना कौन मुश्किल है उसके लिए!"

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

अँधेरा
|

डॉक्टर की पर्ची दुकानदार को थमा कर भी चच्ची…

अंजुम जी
|

अवसाद कब किसे, क्यों, किस वज़ह से अपना शिकार…

अंडा
|

मिश्रा जी अभी तक'ब्राह्मणत्व' का…

अंतर 
|

"बस यही तुम में और मनोज में अंतर है,…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

लघुकथा

कहानी

कविता - हाइकु

पुस्तक समीक्षा

पुस्तक चर्चा

कविता-माहिया

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं