अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई कतआ

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

औक़ात

भारी क़दमों से नन्दन घर घुसा, बस्ता एक ओर रख कर घुटनों में मुँह देकर कोने में बैठ गया। माँ ने बड़ा लडियाते हुए रसोईघर से उसे पुकारा, "आजा नन्दन चाय पी ले मेरे लाल। देख आज तेरे लिए तेरे मनपसंद बिस्कुट भी लाई हूँ।"

कुछ देर इंतज़ार करने पर भी जब कोई जवाब नहीं मिला तो माँ उठ कर उसे कमरे में बुलाने गई। उसे यूँ उदास बैठा देखकर प्यार से बोली, "क्या हुआ बिटवा ऐसे उदास क्यों बैठा है। मास्टर जी ने कुछ कहा क्या?” 

अनमना सा नन्दन बोला, "नहीं माँ!”

तो फिर ऐसे घुटनों में मुँह दिए क्यों बैठा है?” 

उदास नज़रों से माँ को ताकते हुए नन्दन ने पूछा, “माँ औक़ात क्या होती है?"

माँ हैरान हो गई, “औक़ात?” फिर उसके सर पर हाथ फेरते हुए बोली, "भला तू यह क्यों पूछ रहा है?”

रुआँसी आवाज़ में नन्दन बोला, "आज कुछ लड़कों ने मुझे अपने साथ नहीं खेलने दिया और यह कह-कह कर बहुत चिढ़ाया कि तेरी औक़ात ही क्या है, एक मिट्टी के ढेले जितनी।"

उदास बेटे के मुँह से यह बात सुन कर माँ का कलेजा दुख से फट गया। आँखें मीच कर दुख के घूँट भरते हुए वह बोली, "छोड़ बेटा, इन बेकार की बातों पर ध्यान न दे, बस तू ख़ूब मन लगा कर पढ़ाई कर। इन लड़कों की बातों को यूँ मन पर मत ले।"

"क्यों माँ?” बरसती हुई आँखों से नन्दन ने पूछा, "क्या ग़रीबों का दिल नहीं होता, यह ग़रीबी खेल के आड़े भी क्यों आ जाती है?”

बेबसी से फटी अपनी छाती से बेटे को भींचते हुए माँ बोली, "बेटा तू केवल पढ़ाई को ही अपना एकमात्र लक्ष्य बना ले। फिर देखना यह माटी का ढेला कैसे दीपक बन कर जीवन के सब अंधकार चीर देगा। उस दिन उन लड़कों को ख़ुद ही पता चल जाएगा माटी का मोल और तुझे औक़ात का मतलब।"

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

अँधेरा
|

डॉक्टर की पर्ची दुकानदार को थमा कर भी चच्ची…

अंजुम जी
|

अवसाद कब किसे, क्यों, किस वज़ह से अपना शिकार…

अंडा
|

मिश्रा जी अभी तक'ब्राह्मणत्व' का…

अंधविश्वास
|

प्रत्येक दिन किसी न किसी व्यक्ति की मौत…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

लघुकथा

कहानी

कविता - हाइकु

पुस्तक समीक्षा

पुस्तक चर्चा

कविता-माहिया

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं