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डाकिया

डाकिया डाक लाया
डाकिया डाक लाया
ये गाना,  तो हम सबने बचपन से है गाया।
ख़ाकी कपड़ा पहन कर इक काका, 
कहीं दावत का न्योता 
तो कहीं
संबंधियों की चिट्ठी है लाया।
 
साइकल पर सवार झोली लटकाये,
किसी के घर ख़ुशी तो,  
किसी के घर ग़म का समाचार है लाये।
किसी के यहाँ आयी है नानी की चिट्ठी, 
तो किसी के यहाँ लाये है दादी की चिट्ठी।
 
चिलचिलाती धूप हो, या हो कड़ाके की ठण्ड,
काका से समाचार मिलने ना होते थे बंद।
कभी झमाझम बदल थे बरसते, 
भीगते काका, 9 से 5 की ड्यूटी थे करते
चिट्ठियों को सँभालते, घर-घर थे पहुँचते, 
साइकिल पर सवार, बजाकर घंटी करते हुए नमस्ते।
डाक आयी डाक आयी काका थे चिल्लाते
 
काका रखते थे ख़बर सबकी 
कि, 
किसके यहाँ बँटेगी आज पास होने की मिठाई 
और किसकी होगी फ़ेल होने पर  पिटाई। 
और पता था उन्हें कि 
किसकी हुई है नौकरी पक्की। 
कभी लाते थे किसी की लौटने की ख़बर 
तो कभी लाते थे पैसों से भरा हुआ कवर। 
 
सभी के समाचारों को बाँटते, 
ख़ाकी कपड़े में साइकिल पर घंटी बजाते 
काका ही तो थे.... 
जो कभी किसी को ख़त पढ़ कर सुनाते,
तो कभी किसी की ख़ुशी में झूम जाते। 
 
ना अब दीखते है काका, ना दीखते है ख़त। 
ना अब होती है असमय घण्टी की पुकार, 
ना होती है अब डाक टिकिटों की बौछार।
 
अब तो  भैया ऑनलाइन का ज़माना है आया,
काका की जगह अब ई-मेल है छाया।
दोस्त संबन्धी तो फ़ेसबुक से जुड़े हैं,
और काका भी अब कुरीयर सुविधा में जुड़े हैं।
सिर्फ़ यही नहीं, आजकल तो, 
 
अमेज़न फ़्लिपकार्ट ही घर-घर सामान हैं पहुँचाते, 
और पैसे तह ऑनलाइन ही ट्रांसफ़र है हो जाते।  
 
लोगों ने भी कर ली है अब पोस्टकार्ड से दूरी,  
आजकल तो बस,  अब है एक फ़ोन  कॉल की ही दूरी।
अब ना है डाक का किसी को इंतज़ार ,
आजकल तो बस, 
अब वीडियो कॉलिंग से ही होते जाते हैं सारे बात-विचार।
 

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