अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य ललित कला

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा वृत्तांत डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

पेंशन

दिन-रात पेंशन के लिए चक्कर लगाते चक्करघिन्नी से हो गए थे सुमेर चौधरी। आए दिन दफ़्तर के एक से दूसरे कमरे के चक्कर लगाते सुबह से शाम हो जाती और हाथ लगती फिर वही निराशा, जिसे जेब में डाल भारी कदमों से चल देते घर की ओर। इंतज़ार करती पत्नी ने आज फिर लटका मुँह देखा तो रुआँसी हो बोली, "अजी कब तक चलेगा ऐसा, मीरा के पापा। अब तो रसोई के सब डब्बे भी मुँह चिढ़ाने लगे हैं।" आठ वर्षीय ननिहाल आई धेवती की ओर इशारा करती बोली, "एक लाड़ ना लड़ा सकी इसे। आज तो चावल का दाना तक नहीं है घर में। जाओ बाज़ार से पाँव भर चावल ही ले आओ।"

बाज़ार का नाम सुनते ही गुड़िया नाना के साथ जाने को मचलने लगी।

"बिटिया तुम थक जाओगी बहुत दूर है बाज़ार। धूप भी बहुत तेज़ है किसी दिन शाम को ले चलूँगा तुम्हें।"

"ले क्यूँ नहीं जाते.. ज़रा मन बहल जाएगा बच्ची का।"

ढीले हाथ से जेब टटोलते हुए उदास आवाज़ में बोले, "पाव भर चावल भी मुश्किल से हो पाएगा।" बेबसी से गुड़िया की ओर देख बोले, "इसने यदि किसी गुब्बारे पर भी हाथ रख दिया तो सह नहीं पाऊँगा।"

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

अँधेरा
|

डॉक्टर की पर्ची दुकानदार को थमा कर भी चच्ची…

अंजुम जी
|

अवसाद कब किसे, क्यों, किस वज़ह से अपना शिकार…

अंडा
|

मिश्रा जी अभी तक'ब्राह्मणत्व' का…

अंतर 
|

"बस यही तुम में और मनोज में अंतर है,…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

लघुकथा

कहानी

कविता - हाइकु

पुस्तक समीक्षा

पुस्तक चर्चा

कविता-माहिया

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं