अनुरागी प्रेम
काव्य साहित्य | कविता डॉ. पल्लवी सिंह ‘अनुमेहा’1 Mar 2025 (अंक: 272, प्रथम, 2025 में प्रकाशित)
अनुराग तो कर लिया तुमने,
अपने पूरे राग से,
लेकिन क्या सँभाल सके तुम,
मेरे निष्कलंक अन्तःकरण को,
क्या तुम स्तुत्य कर पाए,
मेरी नासमझ नादानियों को,
बताओ, क्या तुम समझ सके,
मेरे नादान प्यार की भाषा को . . .?
अनुराग में लिखी मैंने अपनी कविताओं में
कभी भी तुमको उपमेय नहीं बनाया,
सदैव एक जगह दी,
तुमको उपमान मानकर,
जो हमेशा ही एक नई प्रकृति
दिखाता है,
मुझे पावन चाह की।
मैंने तो अपने पूरे जीवन में,
सर्वोपरि रखा है तुमको,
और . . .
लेकिन क्या तुमने दिया है कभी
सच्चे रूप में मान मेरी आत्मा को . . .
क्या तुम पहुँचा सके मुझे
उस चरम तक मेरे प्रयत्नों को ले?
क्या दिया कभी तुमने पुरस्कार,
मुझे मेरे व्यवहार के मानिंद . . .?
यह मेरा अनुरागी प्रेम,
जो सिर्फ़ तुम्हारे प्रेम में ही
उन्मादी है,
जिसने कर लिया स्वयं को
तुम तक ही सीमित . . .
बंद कर ली हैं आँखें,
मैंने वही सुना . . .
जो तुमने मुझे सुनाया,
वहीं तक देखा,
जहाँ तक तुमने मुझे दिखलाया,
अपने पूरे मन-तन से मैंने तुम्हें
हर पल सहलाया . . .
तुमने तो पूरे जगत को
अपना बतलाया,
कह सके एक बार भी
मैं हूँ सिर्फ़ तुम्हारा जीवन,
क्या तुमने ज़रूरी समझा,
मेरे अनुरागी प्रेम की
पाक महक को,
बताओ, क्या तुम मुझे वह जगह
दे पाये . . .
जिसका दृष्टांत देते हो,
सदैव समझदारी के रूप में।
मैंने चाहा सदैव एक निर्णय पर,
कि मुझे ख्याति मिले,
बस इतना ही न . . .
मैं तुम्हारे लिये
समझ होकर भी नासमझ रही हमेशा,
तुम सब जानते हो ये,
फिर भी अनजान रहे,
एक बात और ये भी कि—
मैंने तुम्हारी आवाज़ को ही
अपना पसंदीदा संगीत कहा,
तुम्हारी महक में ही,
मैं मदहोश-सी डोलती रही . . .
किन्तु क्या तुम,
ये सब आकलन कर पाए हो कभी?
इस सबके मध्य,
सिर्फ़ मेरे अनुरागी मन की आस ही है,
मैंने सदैव तुम्हारे मुख पर,
उसमें उमड़ते भावों को
ध्यान से देखा और पढ़ा है,
लेकिन क्या तुमने इसमें
जुड़ी मेरी सार्थक इच्छाओं को जान,
आज अगर समय के साथ थोड़ी
परिस्थिति बदल गई . . .
तो क्या मुझे कुछ भी बोलने का
हक़ नहीं रहा,
प्रत्येक क्षण मेरे लिए
कुछ भी मायने नहीं रखता . . .?
आस करती थी,
सिर्फ़ और सिर्फ़ मेरे साथ की . . .
लेकिन क्या तुम खड़े हो,
सबको परे कर मेरे साथ . . .?
शायद नहीं,
और अब मैं ख़ुद से ही
लड़ने लगी हूँ,
अपने अधिकार के लिए,
तुम तो कह देते हो,
बड़ी आसानी से
कि–
समय के साथ सब बदलता है,
तो क्या रिश्ते भी बदल जाते हैं?
कभी . . .
छोड़ दे रहे हो,
बीच मझधार में,
मुझे अकेला,
अरे, मैं नादान–
है अनुराग मेरा ऐसा ही . . .
माफ़ कर दूँगी तुमको,
चली जाऊँगी बहुत दूर कहीं,
लेकिन क्या तुम उस अज्ञात सत्ता में,
माफ़ी दे पाओगे मुझे . . .?
ईश्वर की बनी नियामत है—अनुराग,
वह कहीं भी हो,
पर रखता है गिनती,
हर एक आँसुओं की . . .
बताओ, क्या तुम बच पाओगे,
उसके बनाये इस राग से,
क्या कर पाओगे न्याय मेरे साथ . . .!!
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