अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता सजल

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सांस्कृतिक आलेख सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध हाइबुन काम की बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य सिनेमा चर्चा ललित कला स्वास्थ्य

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा यात्रा वृत्तांत डायरी रेखाचित्र बच्चों के मुख से बड़ों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

पत्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया पर्यटन

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

ये फरवरी


प्रत्येक फरवरी
अपने संग ले आती है
फिर कोई नई अपूर्णता, 
कुछ यादें
जो पूर्ववर्ती जाड़े में
धूमिल हो रह गई थीं
पड़ी थीं किसी कोने में
 
इस बार 
वे पुनः उभरती हैं, 
शायद–
इस महीने की सुबहें
कुछ मिलिंद होती हैं
कुछ-कुछ उनींदी-सी
कुछ काहिल भी
जैसे हो कोई
अतीत की तस्वीरें
जिन्हें सालों बाद
खोला गया हो
एलबमों में से
और साँझें . . .
 
वो तो और भी
अथाह . . .
हल्की कँपकँपी में
सिमटी हुईं
किसी इंतज़ार में
डूबी हुईं
 
फरवरी
ख़्वाहिशों की ऋतु है
एक आधी-अधूरी
 
ख़्वाहिशें
कुछ प्रेमाभिव्यक्ति लिए हुए
जो कभी कहीं कहने से
थम गई थीं
कुछ मुलाक़ातें
जो सिर्फ़ तय होने के
बाद भी न मिल पाईं
और . . . . . . 
कुछ इकरार
जो समय के धुँधलके में
छूट गए . . . . . . 
 
यह महीना रहा
उन अलगावों का
जो हिय के मध्य
किसी अदृश्य डोरियों में
खिंचता रहा हो
न तो पूरी तरह
टूट पाए
और न ही पूरी तरह
जुड़ पाए . . . 
 
ऋतुराज की
प्रथम फुसफुसाहटों में
गुँथे हुए होते हैं
ये फरवरी के पुष्प
या तो खिलें
या कि ठिठक कर
रह गए
इसी अधूरेपन की
चाहत में
अपनी पहचान को
गढ़ती
ये फरवरी
 
कुछ बिखरे-अधूरे-से
सपनों
अधूरे से
अल्फ़ाज़
और 
अधूरे से 
आलिंगनों में
उलझी हुई 
ये फरवरी . . .!!! 

 डॉ पल्लवी सिंह 'अनुमेहा'
 लेखिका एवं कवयित्री
 बैतूल, मध्यप्रदेश

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

14 नवंबर बाल दिवस 
|

14 नवंबर आज के दिन। बाल दिवस की स्नेहिल…

16 का अंक
|

16 संस्कार बन्द हो कर रह गये वेद-पुराणों…

16 शृंगार
|

हम मित्रों ने मुफ़्त का ब्यूटी-पार्लर खोलने…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

चिन्तन

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं