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बेटी का जन्म

 

जनवरी के महीने में उस दिन (18 जनवरी) बहुत ठंडी हवा चल रही थी। सुबह क़रीब चार बजे मैं अपनी पत्नी को स्कूटर पर बिठाकर पंजाबी विश्वविद्यालय पटियाला के पास क़स्बा बहादुरगढ़ में स्थित गुरु तेग बहादुर की स्मृति में बने ‘गुरुद्वारा पातशाही नव्म’ में ले गया। ओस बूँदाबाँदी की तरह गिर रही थी! हालाँकि मैंने विंड-चीटर पहन रखा था, लेकिन मेरा चेहरा और दाढ़ी-मूँछें पूरी तरह भीग चुकी थीं। पटियाला के माता कौशल्या अस्पताल की वरिष्ठ महिला चिकित्सक डॉ. अमरजीत कौर ने कुछ हफ़्ते पहले ही पत्नी की जाँच की थी और डिलिवरी का दिन/समय बताकर ज़रूरी निर्देश दिए थे। 

बहादुरगढ़ गुरुद्वारा में माथा टेकने के बाद हम सुबह छह बजे सीधे अस्पताल पहुँचे। मैंने अस्पताल में एक निजी कमरा लिया और अपनी पत्नी को भर्ती कराया। हम घबराए हुए तो नहीं थे, लेकिन फिर भी एक तरह का ‘डर’ था। पता नहीं सब कैसा होगा . . .? और मन ही मन प्रार्थना कर रहे थे—संतान के सुखद आमद की। हमारे दोनों के मन में ऐसी कोई बात नहीं थी कि बेटा होगा या बेटी। हाँ, लेकिन यह ज़रूर चाहा था कि सब कुछ सुचारु रूप से हो जाए, बिना किसी परेशानी के . . .। 

शाम क़रीब पाँच बजे पत्नी को प्रसव कक्ष में ले जाया गया। मैं बाहर अकेला था। जैसे-जैसे समय बीतता गया, मैंने चौपई साहिब के पाठ शुरू कर दिए, “हमरी करौ हाथ दै रछ्छा . . .।” अंदर पत्नी ‘रहिरास साहिब’ का पाठ करने लगी थी। (पत्नी ने डिलीवरी के बाद मुझे यह सब बताया)। महिला चिकित्सक, डॉ. अमरजीत कौर, जिन्होंने डिलिवरी की प्रक्रिया को देखना थी, को तुरंत घर से अस्पताल बुलाया गया। क्योंकि उनके मुताबिक़ तो डिलिवरी का समय आधी रात के आसपास था। 

शाम के पाँच बजकर साढ़े सात मिनट पर नन्ही परी ने इस धरती पर दस्तक दी और जब महिला डॉक्टर ने बाहर आकर मुझे बताया कि बेटी और माँ ठीक हैं, तो मैंने हाथ जोड़कर भगवान का शुक्रिया अदा किया। अस्पताल के दर्जा चार कर्मचारियों को ख़ुशी में कुछ रुपए दिए। वे सभी हैरान थे कि बेटे के जन्म पर तो वे उनके सगे-सम्बंधियों से रुपए माँग कर लेते हैं, यह कैसा व्यक्ति है जो बेटी के जन्म पर अपने आप रुपए दे रहा है! मैंने अपने माता-पिता को, जो कोटकपूरा में थे; और पत्नी के परिजनों को, जो पास के गाँव पंजोला में रहते थे, रात क़रीब सात बजे फोन से सूचना दी (मेरे पास तब केवल एक लैंडलाइन फोन था)। अगले दिन पत्नी की माँ और भाई सुबह-सुबह अस्पताल पहुँचे; मेरे माता-पिता और बड़ी बहन भी दस बजे तक कोटकपूरा से बस द्वारा आ गए। 

मुझे पता था कि मेरी बेटी के जन्म पर कोई मुझे ‘बधाई’ नहीं देगा, इसलिए मैं नारियल के लड्डू का डिब्बा पहले ही ले आया था। जो भी मुझे मिलता, मैं पहले उसका मुँह मीठा करवा देता, ताकि उसको अपना चेहरा उदास न बनाना पड़े। मुझे ख़ुश देखकर उसको ‘बधाई’ देनी पड़ती। 

मेरी इकलौती बेटी रूही सिंह मेरे जीवन का गौरव है। उसके आने के बाद से हमने जीवन के हर क्षेत्र में सराहनीय उपलब्धियाँ हासिल की हैं। मैंने अपनी बेटी के बचपन में और अब तक जितनी भी कविताएँ रची हैं, उनकी प्रेरणा का स्रोत मेरी बेटी रही है। मेरी हर कविता में चाहे बच्चों की कविता हो, या कोई और, मेरी बेटी का नाम हमेशा लिखा होता है। इसके अलावा, मेरी आलोचना की पहली पुस्तक “भाई वीर सिंह दा काव्य सिद्धांत” जो 2009 में प्रकाशित हुई, का विमोचन भी मैंने बेटी के हाथों से करवाया था। 

मेरा मानना है कि यदि माता-पिता बेटी के जन्म को ‘ख़ुशख़बरी’ के रूप में लेते हैं, तो आपके दोस्त और रिश्तेदार आपको बधाई ज़रूर देंगे। और यदि माँ-बाप ही बेटी को बोझ समझने लगें तो औरों से क्या उम्मीद की जा सकती है! ऐसा नहीं होना चाहिए कि अगर लड़का पैदा हो तो हम ढोल बजाएँ, डीजे पर झूमें, किन्नरों को नाचने के लिए बुलवाएँ और अगर लड़की पैदा हो तो हम उसे ‘पत्थर’ समझ कर बेइज़्ज़त करें! 

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