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दोगला 

 

यूँ तो उस कॉलेज में शिक्षकों के दो गुट थे—एक प्रिंसिपल का विरोध करता था और दूसरा प्रिंसिपल का समर्थन करता था। लेकिन प्रो. तोची नाम का एक शिक्षक था, जो अंदर से प्रिंसिपल के साथ था और बाहर से विरोधी गुट के साथ। दरअसल, वह दोनों में से किसी से भी पंगा नहीं लेना चाहता था। वह प्रिंसिपल के पास जाकर उन्हें विरोधी गुट की योजनाओं के बारे में बताता और विरोधी गुट के पास जाकर प्रिंसिपल के ख़िलाफ़ बोलता, यहाँ तक कि उसे गालियाँ भी देता। 

विरोधी गुट का मुखिया, प्रो. गुरबंत, हमेशा प्रिंसिपल में ख़ामियाँ निकालता रहता था और जब भी प्रिंसिपल के कार्यालय में कोई बैठक होती, तो वह ऊँची आवाज़ में बोलता। एक दिन प्रो. गुरबंत ने शिक्षक संघ की बैठक बुलाई, जिसमें प्रिंसिपल के ख़िलाफ़ कुछ प्रस्ताव पेश किए गए। बैठक में मौजूद सभी शिक्षकों ने इन प्रस्तावों का समर्थन किया। दोहरे चरित्र वाला शिक्षक, प्रो. तोची, धीरे से उठकर चला गया। संघ ने काफ़ी देर तक उसका इंतज़ार किया, लेकिन वह नहीं आया। बाक़ी शिक्षकों ने उसके हस्ताक्षरों के बग़ैर ही प्रस्ताव पारित कर दिया। 

अगले दिन, जब गुरबंत और तोची कैंटीन में आमने-सामने आए, तो प्रो. गुरबंत ने उनसे पूछा, “यार, तुमने कल मीटिंग के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर ही नहीं किए!” 

तोची ने जवाब दिया, “प्रो. साहिब, मुझे तो दस्त लगे हुए थे, इसलिए मैं जल्दी उठकर चला गया।” 

प्रो. गुरबंत को उसका दोगलापन समझते देर ना लगी, क्योंकि आज वह कैंटीन में बैठकर ब्रेड पकौड़े खा रहा था। 

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