अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता सजल

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सांस्कृतिक आलेख सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध हाइबुन काम की बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य सिनेमा चर्चा ललित कला स्वास्थ्य

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा यात्रा वृत्तांत डायरी रेखाचित्र बच्चों के मुख से बड़ों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

पत्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया पर्यटन

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

मेरे पिता जी 

 

 8 जनवरी को मेरे पिता (ज्ञानी करतार सिंह) का जन्मदिन होता है। 22 मई, 2013 को 92½ साल की उम्र में उनका निधन हो गया था। उनका जन्म 1921 ई. में एक बहुत ही साधारण, मेहनतकश परिवार में हुआ था। चार भाइयों और दो बहनों में से वह चौथे नंबर पर थे। यानी, एक भाई और एक बहन पिता से छोटे थे, एक बहन और दो भाई बड़े थे। पिता के परिवार के पास बहुत कम ज़मीन थी, जिससे एक बड़े परिवार का गुज़ारा बहुत ही मुश्किल से होता था। 

मेरे पिता अपने परिवार में सबसे ज़्यादा पढ़े-लिखे इन्सान थे। वे न सिर्फ़ पढ़े-लिखे ही थे, बल्कि अपने परिवार में नौकरी करने वाले वह एकमात्र व्यक्ति थे। उनके माता-पिता तो अनपढ़ थे ही, बल्कि उनके बाक़ी भाई-बहन चार-पाँच क्लास से ज़्यादा नहीं पढ़ पाए और वे छोटे-मोटे काम करके अपने-अपने परिवार का पेट पालते रहे। मेरे पिता ने घर के कामों में मदद करते हुए अपनी पढ़ाई जारी रखी और गाँव के स्कूल से अपनी शुरूआती पढ़ाई की। आगे की पढ़ाई के लिए वे मुक्तसर (पंजाब) में अपनी बुआ के पास चले गए, जहाँ बहुत मुश्किल हालात में उन्होंने खालसा हाई स्कूल से दसवीं की परीक्षा अच्छे अंकों से पास की। दिन में वे स्कूल में पढ़ते और शाम को खेतों से मवेशियों के लिए चारा लाते और चूल्हे में आग जलाने के लिए लकड़ियाँ तोड़ कर लाते। 

1937 में मैट्रिक की परीक्षा फ़र्स्ट क्लास में पास करने के बाद उन्होंने 1938 में संत अतर सिंह की अकाल संस्था, मस्तुआणा (पंजाब) से ज्ञानी की परीक्षा पास की और वहीं से खंडे-बाटे की पाहुल भी हासिल की, यानी अमृत-पान किया। 1940-41 में उन्होंने शहीद सिख मिशनरी कॉलेज, अमृतसर (पंजाब) से ‘सिख मिशनरी कोर्स’ पास किया। सितंबर 1942 से अक्तूबर 1949 तक उन्होंने तलवंडी साबो और मुक्तसर (दोनों पंजाब में स्थित) के खालसा स्कूलों में पंजाबी और धार्मिक अध्यापक के तौर पर कार्य किया। (यह भी एक अजीब इत्तेफ़ाक है कि जहाँ से {नगर तलवंडी साबो से} उन्होंने अपनी नौकरी की शुरूआत की, मैं वहीं से सेवानिवृत्त हुआ। फ़र्क़ बस यह रहा कि उन्होंने स्कूल में अध्यापन किया और मैंने काॅलेज में) और 24 अक्तूबर 1949 से 31 जनवरी 1979 तक उन्होंने कोटकपूरा, बरगाड़ी, मुदकी, गोनियाना मंडी के सरकारी स्कूलों में अपनी सेवाएँ प्रदान कीं। अध्यापन के दौरान उन्होंने ओ.टी. पास की और लगभग तीस साल तक पंजाबी अध्यापक के तौर पर सी. एंड वी. अध्यापक (क्लासिकल और वर्नाक्यूलर टीचर) के तौर पर काम किया। 

अध्यापक लगने के बाद भी मेरे पिता ने धरती से अपना नाता नहीं छोड़ा और हमेशा अपनी जड़ों/विरासत से जुड़े रहे। उन्होंने पूरी ज़िंदगी साधारण कुर्ता-पायजामा पहना और कभी पैंट-शर्ट नहीं पहनी। वे हमेशा साइकिल चलाते थे। अपनी बेटियों-बेटों की शादियों में किसी भी तरह के दिखावे या धूमधाम से वह हमेशा दूर रहे। यह मेरे पिता ही थे, जिन्होंने अपने सात बेटे-बेटियों (दो लड़कियाँ, पाँच लड़कों) को अपने से ज़्यादा पढ़ाई के लिए प्रोत्साहित किया और उन सभी को पोस्टग्रेजुएट तक की पढ़ाई करवाई। मेरी माता जी बिल्कुल अनपढ़ थीं और वे सिर्फ़ घर के कामों तक ही सीमित थीं। लेकिन मेरे पिता अपनी छोटी सी आय से घर के सारे ख़र्चों के साथ-साथ बच्चों की पढ़ाई के लिए भी पैसे बचाते थे। 

हम पाँच भाइयों में से चार सरकारी कॉलेजों में प्रोफ़ेसर रहे, जबकि एक ने बिजली बोर्ड में बड़े अधिकारी के तौर पर कार्य किया; एक बहन सरकारी हॉस्पिटल में नर्सिंग सिस्टर के तौर पर और दूसरी स्कूल लाइब्रेरियन के तौर पर कार्यरत रहीं। मेरे पिता यद्यपि चाहते तो दूसरे लोगों की तरह अपने बेटों की शादियों में दहेज़ के पैसों से घर भर लेते, लेकिन उन्होंने बारात में घर के सदस्यों के अलावा किसी बाहरी व्यक्ति को न्योता नहीं दिया और न ही पैसे ऐंठने के लिए कोई रिसेप्शन पार्टी रखी। सारी शादियाँ घर पर रहकर सादे ढंग से संपूर्ण कीं और किसी होटल/मैरिज पैलेस की ज़रूरत नहीं समझी। हमारे परिवार की किसी भी शादी में कोई डीजे नहीं बजा, कोई नाच-गाना नहीं हुआ, कोई ढोल-नगाड़े का शोरोगुल नहीं था। घर के सदस्य बिना बैंड-बाजे के शादी में जाते और वापस आते थे। मेरे माता जी लोगों का मुँह मीठा करवाने के लिए गली-मोहल्ले में लड्डू ज़रूर बाँटती थीं, लेकिन उन्होंने कभी किसी से शगुन का एक पैसा भी नहीं लिया। 

मेरे पिता ने अपनी पूरी ज़िंदगी में अपने लिए कभी कोई ज़मीन, जायदाद या घर नहीं बनाया और पूरी ज़िंदगी किराए के मकानों में बिता दी। जब भी हमारे परिवार में अपना घर बनाने की बात होती, तो वह गुरुवाणी की यह पंक्तियाँ बोल कर सबको चुप करा देते थे:

“फरीदा कोठे मंडप माड़ीयां उसारेंदे भी गये॥
कूड़ा सौदा कर गये गोरीं आए पये॥”

(यानी, बाबा फरीद जी कहते हैं कि इस दुनिया में बहुत से लोगों ने बड़े-बड़े महल-कोठियाँ ज़रूर बनवाईं, लेकिन उन्होंने यह झूठी शानो-शौकत में ही जीवन बिता दिया और अंत में क़ब्रों में समा गये। आज ऐसे लोगों को जानने वाला कोई नहीं है) 

पिता जी को घर में ख़ाली बैठकर समय बिताना पसंद नहीं था, इसलिए वह किताबें, अख़बार, मैगज़ीन पढ़ते रहते और उनमें से अच्छी-अच्छी बातें नोट करके या काटकर फ़ाइलों में सहेज लेते। मेरे पास आज भी उनकी ऐसी क्लिपिंग्स की पाँच फ़ाइलें मौजूद हैं, जो ज़्यादातर सेहत और पढ़ाई से जुड़ी हुई हैं। 

पिता जी ने अपनी पूरी ज़िंदगी में कभी कोई नशा नहीं किया, न ही गपशप करके, ताश/जुआ खेलकर, या ख़ाली बैठकर समय बिताया। उनका मक़सद साफ़ और स्पष्ट था—अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देना और एक ख़ुशहाल और बेहतर ज़िंदगी के लिए तैयार करना। उन्होंने गुरबख्श सिंह प्रीतलड़ी (पंजाबी लेखक) की सोच को अपना आदर्श बनाया हुआ था और अपनी ज़िंदगी को सेहतमंद रखने के लिए प्राकृतिक तरीक़ों का इस्तेमाल करते रहते थे। उन्होंने अपनी ज़िंदगी में बहुत कम दवाइयों का इस्तेमाल किया और अपनी ज़िंदगी के आख़िरी दिनों तक सारा काम अपने हाथों से करते रहे। 

भाषा के अध्यापक होने के कारण पिता जी सुंदर लेखन के प्रति सजग रहते थे। उनकी अपनी लिखावट बहुत सुंदर थी, जिसे हम बच्चों ने भी अपनाया। प्रोफ़ेसर बनने से पहले हम चारों भाइयों ने 1962 से 1984 तक पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला में कैलिग्राफिसट के तौर पर काम किया। पिता जी अपने विद्यार्थियों को क़लम से लिखने की प्रेरणा देते रहते थे। सुंदर लिखावट की एक दिलचस्प घटना का ज़िक्र करना यहाँ अवांछित नहीं होगा: यह मुक्तसर (पंजाब) की घटना है। छुट्टियों में पिता जी हमें ‘गुरुद्वारा टुट्टी गंढी’ (मुक्तसर में स्थित) ले जाते थे और हम सरोवर की परिक्रमा में पेड़ों के नीचे बैठकर नोटबुक्स में सुंदर लिखावट करते थे। वहाँ पिता जी तो आराम करते या फिर सो जाते। एक बार ऐसे ही दिनों में मेरे बड़े भाई ने अपनी नोटबुक में सुंदर लिखाई की और फिर खेलने लग गया। एक यात्री वहाँ से गुज़रा तो नोटबुक में सुंदर लिखावट देखकर उसने पिता जी से पूछा, “मास्टर जी, आपने तो पूरा पन्ना ख़ुद ही लिख दिया, बच्चे को भी कुछ सिखाना चाहिए!” 

उस यात्री को लगा था कि इतनी सुंदर लिखावट कोई बच्चा नहीं कर सकता। लेकिन मेरे पिता ने पूरी बात साफ़ की और मेरे भाई से यात्री के सामने और लिखवाकर दिखाया। 

उनका एक और बड़ा टेलैंट था—स्टेज-संचालन। जब भी स्कूल में कोई समागम होता, तो मेरे पिता को ही यह ज़िम्मेदारी दी जाती। हाल ही में मेरी एक प्रसिद्ध पंजाबी लेखक और पूर्व आईएएस अधिकारी श्री जंग बहादुर गोयल जी से फ़ोन पर बात हुई तो उन्होंने मुझे बताया कि 1974 में वे गोनियाना मंडी के एक स्कूल में ‘मोटिवेशनल लेक्चर’ देने गए थे, जहाँ उनके बड़े भाई श्री प्यारे लाल गोयल हेडमास्टर थे। (मेरे पिता यहीं अध्यापक थे)। जंग बहादुर गोयल ने मुझे बताया कि ज्ञानी जी (यानी मेरे पिता) ने वहाँ बहुत बढ़िया स्टेज-संचालन किया था। मेरे पिता की यह ख़ूबी मुझमें भी अपने आप आ गयी है। कॉलेज अध्यापक की नौकरी के दौरान मैं ही हर समागम में स्टेज-संचालन करता रहा हूँ। 

मेरे पिता इस बात को लेकर भी बहुत सजग रहते थे कि बच्चे क्या पढ़ते हैं। वे मुझे पंजाबी और अंग्रेज़ी पढ़ाने वाले टीचरों को उनकी ग़लतियाँ बताते थे। छठी क्लास में मेरे अंग्रेज़ी के अध्यापक ने 'थ्रस्टी क्रो' कहानी में लिखवाया, “ही सकुएंचड हिज थ्रस्ट एंड फ़्लू अवेय” (He squenched his thrust and flew away) मेरे पिता ने पहले तो मेरी ग़लती सुधारी और फिर अध्यापक को समझाया कि 'सकुएंचड' (squenched) शब्द नहीं होता, यह 'कुएंचड' (quenched) है। इसी तरह पंजाबी कवि प्रो. मोहन सिंह की एक कविता पढ़ाते समय पंजाबी अध्यापक ने उसमें एक पंक्ति “असीं कुणके खाधे रज्ज के . . . ” की जगह “असीं कणकां खाधियां रज्ज के . . . ” पढ़ाया तो मेरे पिता ने उन्हें समझाया कि यहाँ शब्द “कुणके” ही है, जिसका मतलब “प्रशाद” होता है। 

उन दिनों दुकानदार सब्ज़ी या फल के लिए ख़ाकी लिफ़ाफ़े ही देते थे, आज की तरह प्लास्टिक के लिफ़ाफ़े इस्तेमाल नहीं होते थे। मेरे पिता उन ख़ाकी लिफ़ाफ़ों को ठीक से सीधा करके हमारी किताबों/कॉपियों पर कवर की तरह चढ़ा देते थे। जो कवर वो चढ़ाते ते थे, वे अलग तरह के होते थे, जिनकी नक़ल करके मैं भी अपनी बेटी की किताबों/कॉपियों पर वैसे ही कवर चढ़ाता रहा हूँ। 

छठी क्लास से लेकर 80 साल की उम्र तक मेरे पिता सेवा भावना से दरबार साहिब मुक्तसर में माघी के मेले में सेवा करते रहे, साइकिल और गठरियाँ सँभालते रहे और उनका नाम शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी श्री अमृतसर के विज्ञापनों में छपता रहा। फिर जब वे बुज़ुर्ग हो गए, तो उन्होंने ख़ुद इस काम से माफ़ी-सहित छुट्टी ले ली। गुरु साहिबान के गुरपुरबों, नगर-कीर्तनों, प्रभात फेरियों के दौरान वे अपने परिवार के सदस्यों और छात्रों को साथ ले जाना और उसमें शामिल होना अपना नैतिक कर्त्तव्य समझते थे। 

यह सच है कि हमें किसी व्यक्ति/चीज़ की अहमियत तभी पता चलती है, जब वे हमारे बीच नहीं रहती। इसी तरह मैं भी आज ख़ुद को असहाय और बेबस महसूस कर रहा हूँ, अपने पिता के ज्ञान, समझदारी और सादगी से दूर, जिन्होंने बचपन से लेकर ज़िंदगी के आख़िरी समय तक कड़ी मेहनत की, संघर्ष किया और हमेशा कुछ न कुछ करते रहे। लेकिन उनका ज्ञान/शिक्षाएँ हमेशा मेरे साथ हैं, इसीलिए घने अँधेरों में भी मेरे पिता के ज्ञान के दीपक की रोशनी मेरा रास्ता रोशन करती रहती है। 

अपने विद्यार्थियों के बीच ‘अध्यापन के मसीहा’ और ‘कर्मयोगी इन्सान’ के नाम से विख्यात मेरे पिता साधारण होने के बावजूद एक असाधारण और आदर्श अध्यापक के तौर पर मक़बूल रहे। 

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

आयुष
|

आयुष हमारा नॉटी बॉय है, बहुत-बहुत शरारती।…

ऐ घड़ी! ठहरना ज़रा
|

प्रख्यात रंगकर्मी प्रतिभा अग्रवाल  …

कनकाभ-मेघ
|

मैंने नहीं देखा है हिमालय का स्वर्णमयी शिखर।…

दूसरी माँ की पीड़ा
|

मेरी चाची एक छोटी बच्ची को छोड़कर चल बसीं।…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

स्मृति लेख

रेखाचित्र

लघुकथा

पुस्तक समीक्षा

अनूदित कहानी

हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं