हुई ग़ायब सआदत है
शायरी | ग़ज़ल अविनाश ब्यौहार1 Feb 2021 (अंक: 174, प्रथम, 2021 में प्रकाशित)
विजात छंद
1222 1222
हुई ग़ायब सआदत है
बदी की अब इबादत है
जिसे हम ख़ौफ़ समझे थे
असल में सब सलामत है
पखेरू शांति के लौटे
जहाँ में बस क़यामत है
कुशलता से रहे दुनिया
ख़ुदा की ही इनायत है
सभी ने धन बटोरा है
कुपोषित सी दयानत है
भरा है कोष सरकारी
अमानत में ख़यानत है
अगर तारीफ़ के क़ाबिल
मिली फिर क्यों मलामत है
अन्य संबंधित लेख/रचनाएं
टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
लघुकथा
गीत-नवगीत
- आसमान की चादर पे
- कबीर हुए
- कालिख अँधेरों की
- किस में बूता है
- कोलाहल की साँसें
- खैनी भी मलनी है
- गहराई भाँप रहे
- झमेला है
- टपक रहा घाम
- टेसू खिले वनों में
- तारे खिले-खिले
- तिनके का सहारा
- पंचम स्वर में
- पर्वत से नदिया
- फ़ुज़ूल की बातें
- बना रही लोई
- बाँचना हथेली है
- बातों में मशग़ूल
- भीगी-भीगी शाम
- भूल गई दुनिया अब तो
- भौचक सी दुनिया
- मनमत्त गयंद
- महानगर के चाल-चलन
- लँगोटी है
- लू-लपटें
- वही दाघ है
- विलोम हुए
- शरद मुस्काए
- शापित परछाँई
- सूरज की क्या हस्ती है
- हमें पतूखी है
- हरियाली थिरक रही
- होंठ सिल गई
- क़िले वाला शहर
कविता-मुक्तक
गीतिका
ग़ज़ल
दोहे
विडियो
उपलब्ध नहीं
ऑडियो
उपलब्ध नहीं