अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता सजल

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सांस्कृतिक आलेख सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध हाइबुन काम की बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य सिनेमा चर्चा ललित कला स्वास्थ्य तकनीकी

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा यात्रा वृत्तांत डायरी रेखाचित्र बच्चों के मुख से बड़ों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

पत्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया पर्यटन

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

हसीन सपने

 

वह बेरोज़गार था। लेकिन उसने अफ़सरशाही बख़ूबी देखी और उनकी मान, प्रतिष्ठा तथा ऐशोआराम भी देखे। 

एक दिन वह गहरी नींद में सो रहा था। एक सपना उसके दिमाग़ में चलने लगा कि वह भी क्लास वन ऑफ़िसर हो गया हैं। दरवाज़े पर दरबान है। घर के चारों ओर पुलिस का पहरा है। दरबान आते-जाते सेल्यूट बजाता है। ड्राइवर कार का दरवाज़ा खोलता है। वह कार में बैठता है। फिर कार सरपट ऑफ़िस की ओर दौड़ने लगती है। कार ऑफ़िस में रुकी। ड्राइवर ने कार का दरवाज़ा खोला। चपरासी ने अटैची और फ़ाइलें अपने हाथ में ले लीं। ऑफ़िस में मातहत कर्मचारी उन्हें देखकर खड़े हो गए और नमस्कार की मुद्रा में सभी की गर्दनें हिलने लगीं। चेंबर में दो एसी चल रहे थे और वे कुर्सी पर पसर गए। 

तभी एक चीखती सी आवाज़ कान के पर्दे के आर-पार हो गई। वह हड़बड़ाकर उठ बैठा। बहन बोली-भैया सुबह हो गई है तुम्हें फुटबॉल की प्रैक्टिस के लिए मैदान में नहीं जाना है क्या? 

उसकी जब आँखें खुली तो वह जो सुखद सपना देख रहा था वह छन्न से टूट गया। वह हक़ीक़त में लौट आया था। उसे अपना सपना “मुंगेरीलाल के हसीन सपने” जैसा लगा। 

उसने गहरी ठंडी सांसें छोड़ीं और चहल-क़दमी करने लगा। 

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

105 नम्बर
|

‘105’! इस कॉलोनी में सब्ज़ी बेचते…

अकथित दर्द
|

दोपहर प्रिया जब कॉलेज से घर आयी तो ननद सास…

अकेलेपन का बोझ
|

“हैलो मेनका! बिज़ी तो नहीं? कहीं मैं…

अगर तुम मिल जाओ 
|

अख़बार में छपा यह समाचार हृदय विदाकर था।…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

लघुकथा

गीत-नवगीत

कविता-मुक्तक

गीतिका

ग़ज़ल

दोहे

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं

लेखक की पुस्तकें

  1. ओस नहाई भोर