अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता सजल

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सांस्कृतिक आलेख सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध हाइबुन काम की बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य सिनेमा चर्चा ललित कला स्वास्थ्य तकनीकी

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा यात्रा वृत्तांत डायरी रेखाचित्र बच्चों के मुख से बड़ों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

पत्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया पर्यटन

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

जन्मदिन की आत्मव्यथा

 

आज जीवन का एक और वर्ष
शांत स्वर में मुझसे कह गया—
मानव जन्म साधारण नहीं होता, 
यह ईश्वर का अनुपम वरदान है। 
 
अपार संभावनाओं के नभ में
हर पल उड़ान भरता है मन, 
सपनों के पंख लगाकर
छू लेना चाहता है अनंत गगन। 
 
किन्तु जन्म लेते ही मानव
उलझ जाता है संसार के जाल में, 
कभी झूठ, कभी फ़रेब, 
कभी अपनों से ही बने सवाल में। 
 
जीवन की अंतिम मंज़िल मृत्यु है, 
यह सत्य सभी जानते हैं, 
फिर भी न जाने क्यों
मोह-माया में भटकते रहते हैं। 
 
हर जन्मदिन पर मन पूछता है—
क्या पाया और क्या खोया? 
कितनों को अपना बना पाया, 
और कितनों से नाता खोया? 
 
धरा पर भटकता रहा इंसान
अनजान राहों की तलाश में, 
जो मिला उसे कम ही लगा
नई इच्छाओं की प्यास में। 
 
जानता है मानव कि
ख़ाली हाथ ही जाना है, 
फिर भी जीवन भर
संसार सजाना है। 
 
आज इस दिवस पर
बस इतना सा एहसास हुआ—
ऊँची उड़ानों से बड़ा सुख
अपनों के बीच लौट आना हुआ। 
 
यदि प्रेम, अपनापन और सुकून मिला, 
तो यही जीवन की सच्ची जीत है, 
वरना सब कुछ पाकर भी
मन भीतर से अधूरा ही रहता है। 

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

14 नवंबर बाल दिवस 
|

14 नवंबर आज के दिन। बाल दिवस की स्नेहिल…

16 का अंक
|

16 संस्कार बन्द हो कर रह गये वेद-पुराणों…

16 शृंगार
|

हम मित्रों ने मुफ़्त का ब्यूटी-पार्लर खोलने…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

सजल

साहित्यिक आलेख

सामाजिक आलेख

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं