नारी: एक करुण पुकार
काव्य साहित्य | कविता मुनीष भाटिया15 Mar 2026 (अंक: 294, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
सदियों से मानव की कमज़ोरी
नारी को समझा गया हर बार,
विजय चिह्न समझ लूट लिया
जैसे कोई युद्ध का उपहार।
कभी अपनों की बेरुख़ी झेली,
कभी दुश्मनों की तलवार,
युद्धभूमि की आग में जलकर
सहती रही अस्मिता पर प्रहार।
आज बदल गया रूप समय का,
पर चाल वही, व्यवहार वही,
नारी : एक करुण पुकार
सदियों से मानव की कमजोरी
नारी को समझा गया हर बार,
विजय चिन्ह समझ लूट लिया
जैसे कोई युद्ध का उपहार।
कभी अपनों की बेरुखी झेली,
कभी दुश्मनों की तलवार,
युद्धभूमि की आग में जलकर
सहती रही अस्मिता पर प्रहार।
आज बदल गया रूप समय का,
पर चाल वही, व्यवहार वही,
छद्म प्रेम का जाल बिछाकर
भटकाया जाता बार-बार।
अब जागे समाज, बढ़े चेतना,
पहचाने चेहरे भेड़ियों के यार,
शिक्षा, साहस और सजगता से
टूटेगा छल का हर जाल।
जिस दिन नारी का मान सुरक्षित,
और होगा उसका सच्चा सत्कार,
तभी सच्चे अर्थों में जग में
नारी दिवस होगा साकार।
भटकाया जाता बार-बार।
अब जागे समाज, बढ़े चेतना,
पहचाने चेहरे भेड़ियों के यार,
शिक्षा, साहस और सजगता से
टूटेगा छल का हर जाल।
जिस दिन नारी का मान सुरक्षित,
और होगा उसका सच्चा सत्कार,
तभी सच्चे अर्थों में जग में
नारी दिवस होगा साकार।
अन्य संबंधित लेख/रचनाएं
टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
कविता
सजल
साहित्यिक आलेख
सामाजिक आलेख
विडियो
उपलब्ध नहीं
ऑडियो
उपलब्ध नहीं