अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता सजल

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सांस्कृतिक आलेख सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध हाइबुन काम की बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य सिनेमा चर्चा ललित कला स्वास्थ्य तकनीकी

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा यात्रा वृत्तांत डायरी रेखाचित्र बच्चों के मुख से बड़ों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

पत्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया पर्यटन

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

जीवन की जंग

 

जीवन की जंग लड़ता तन, 
पीड़ा से भरा हर श्वास, 
फिर भी सभी को चाहिए, 
लक्ष्यों का विकास। 
 
रिश्तों की थकान, 
दुनियादारी का बोझ अपार, 
फिर भी उलझे जाते हैं, 
लिए कामों के भार। 
 
भूल गए सभी शायद, 
इंसाँ कोई मशीन नहीं, 
हर धड़कन की क़ीमत होती, 
कोई मामूली चीज़ नहीं। 
 
उपलब्धियाँ तभी सार्थक हैं, 
जब संवेदना साथ चले, 
कर्त्तव्य के संग मानवता भी, 
हर निर्णय में साथ मिले। 
 
क्या लक्ष्य इतने आवश्यक हैं कि 
पीड़ा भी अनदेखी हो जाए, 
क्या व्यवस्था इतनी कठोर हो कि 
करुणा ही खो जाए? 
 
ऐसे क्षणों में ज़रूरत है, 
दुआ और प्यार की, 
न कि हर दिन बढ़ती हुई, 
चिंताओं के बोझ की। 
 
जीवन सबसे ऊपर है, 
यह बात समझनी होगी, 
संवेदनाओं से ही व्यवस्था को 
अब अपनी गरिमा गढ़नी होगी। 

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

 क़लम घिसाई
|

मैं क़लम-घिसाई करता हूँ ख़्वाबों की बुनाई…

 कुलक्षिणी
|

पैदा हुई तो दादी बोली जन्मी आज कुलक्षिणी…

 जयंती या पुण्य तिथि
|

रात सूरज जनेगी देख लेना सुबह सुबह तुम, उपेक्षा…

 तैर रहे हैं गाँव
|

धारा उपर  तैर रहे हैं  सब खादर…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

सजल

साहित्यिक आलेख

सामाजिक आलेख

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं