जीवन की जंग
काव्य साहित्य | कविता मुनीष भाटिया1 Jul 2026 (अंक: 300, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
जीवन की जंग लड़ता तन,
पीड़ा से भरा हर श्वास,
फिर भी सभी को चाहिए,
लक्ष्यों का विकास।
रिश्तों की थकान,
दुनियादारी का बोझ अपार,
फिर भी उलझे जाते हैं,
लिए कामों के भार।
भूल गए सभी शायद,
इंसाँ कोई मशीन नहीं,
हर धड़कन की क़ीमत होती,
कोई मामूली चीज़ नहीं।
उपलब्धियाँ तभी सार्थक हैं,
जब संवेदना साथ चले,
कर्त्तव्य के संग मानवता भी,
हर निर्णय में साथ मिले।
क्या लक्ष्य इतने आवश्यक हैं कि
पीड़ा भी अनदेखी हो जाए,
क्या व्यवस्था इतनी कठोर हो कि
करुणा ही खो जाए?
ऐसे क्षणों में ज़रूरत है,
दुआ और प्यार की,
न कि हर दिन बढ़ती हुई,
चिंताओं के बोझ की।
जीवन सबसे ऊपर है,
यह बात समझनी होगी,
संवेदनाओं से ही व्यवस्था को
अब अपनी गरिमा गढ़नी होगी।
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