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क्या हैं हम . . .? 

 

जब रिश्ते करें परेशान, 
तो बदलना समझदारी लगता है, 
पर इंसान ख़ुद से हो परेशान, 
तो भी दोष दूसरों को ही देता है। 
 
दौर कुछ ऐसा आया है आज, 
कि हम दूसरों की कमियाँ देखते हैं, 
पर अपनी अंतरात्मा से
नज़र मिलाने में डरते हैं। 
 
रिश्ता बदलकर नई राह ढूँढ़ने में, 
हमें ज़रा हिचक नहीं होती, 
पर अपने भीतर झाँकने के लिए, 
हज़ार बहाने ढूँढ़ लेते हैं। 
 
क्या हैं हम इस नाशवान जग में, 
और क्या है औक़ात हमारी, 
एक ही पल में क़ुदरत अहं को
मिट्टी में मिला देती है। 
 
फिर भी इंसान की फ़ितरत है, 
कि ताउम्र ग़फ़लत में कटती है, 
झूठ, अहं और स्वार्थ के बादल, 
ख़ुद से कभी हटते नहीं। 
 
उम्र जब अपने अंतिम मोड़ पर, 
चुपचाप आकर होती है खड़ी, 
ना कोई अपना पास बचता है, 
ना मनमर्ज़ी का कोई साथ। 
 
तब समझ आता है आख़िरकार, 
कि ज़रूरत रिश्ते बदलने की नहीं थी, 
ज़रूरत तो थी ख़ुद को पहचानने की, 
और ख़ुद से मिलने की बस दरकार। 

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