जीने की कहानी
काव्य साहित्य | कविता मुनीष भाटिया15 Jun 2026 (अंक: 299, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
दावा नहीं करती दवा,
रोग मिटाने का कभी,
दुआ काम करती है वहाँ,
बस दो मीठे बोल लिए।
पता चल जाता है,
कौन अपना, कौन पराया,
बोल ही तो होते हैं,
शख़्सियत का आईना।
झूठ-फ़रेब के रिश्ते-नाते,
न कोई अपना, न पराया,
मतलब की दुनिया में,
मोहरा बनाते अपने ही।
चित्त और मात होती
जहाँ उन्हीं के मुताबिक़,
किस पर करें भरोसा,
किसको मानें अपना यहाँ।
हैं हम भी तो आख़िर,
उसी भीड़ में शामिल,
उँगली किसी ओर करते हैं,
तो चार अपनी ओर होती हैं।
इसलिए न हो शिकवा,
न रखे गिला किसी से,
जो लिया, यहीं से लिया,
जो खोया, यही का होगा।
चार दिन की ज़िंदगानी है,
हँस-खिलकर जी लें इसे,
यही तो जीवन की रवानी है,
यही जीने की कहानी है।
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