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ऑनलाइन गेमिंग-एक मकड़जाल

 

अभी कुछ माह पहले की एक घटना मन को आज भी आंदोलित कर रही है। लखनऊ में ऑनलाइन गेम फ़्री फ़ायर के जाल में फँसकर एक 13 वर्षीय किशोर जो कि कक्षा छह का छात्र था, ने आत्महत्या कर ली। कारण वह 14 लाख रुपये गेम में हार गया था। ये 14 लाख रुपये की बड़ी रक़म उसके पिता ने मकान बनवाने के लिए खेत बेचकर जमा की थी। जैसे ही किशोर को ये पता चला कि पैसे ग़ायब होने की जानकारी पिता को हो गयी है, उसने डर के कारण फाँसी लगा ली। फ़्री फ़ायर बैटल रॉयल शैली का गेम है। बच्चे गेम में पसंद की चीज़ें ख़रीदने के लिए पैसे ख़र्च करते हैं और लाखों गँवा देते हैं। 

वर्ष 2022 से सरकार ने इसे बैन कर रखा है, लेकिन अभी भी ये चल रहा है। ऑनलाइन गेमिंग में पैसा लगाकर और भी बहुत से लोग जान-माल का नुक़्सान उठा चुके हैं। किशोर ही नहीं, बड़े भी इसकी लत में पड़ रहे हैं। छोटी कक्षाओं से लेकर दसवीं-बारहवीं, प्रतियोगी छात्र यहाँ तक की नौकरी पेशे वाले भी इसकी गिरफ़्त में आकर आत्महत्या कर चुके हैं। ये किसी एक शहर की बात नहीं पूरे देश में ऐसी घटनाएँ हो रही हैं। पिछले दिनों झांसी में आठवीं में पढ़ने वाले इकलौते बेटे की ऑनलाइन गेमिंग की लत से परेशान होकर माँ ने ख़ुदकुशी कर ली, बेटा दोस्तों के साथ पबजी खेलता था। ऐसी घटनाएँ कितनी भयावह हैं। ऑनलाइन गेमिंग की लत परिवार पर क़हर बनकर टूट रही है। टेक्नॉलोजी के बढ़ते प्रयोग के दुष्परिणाम विभिन्न रूपों में सामने आ रहे हैं, जिसमें से एक ऑनलाइन गेम की लत भी है। 

आज कम उम्र में ही बच्चों को मोबाइल, लैपटॉप इत्यादि मिल जाते हैं, जो उन्हें पढ़ाई के एक सहायक उपकरण के रूप में दिए जाते हैं लेकिन वे इनका दुरुपयोग करने लगते हैं। बच्चों के अपने कमरे हैं, अपनी प्राइवेसी है। डिवाइस में पासवर्ड लगा कर रखते हैं, ऐप हाइड भी कर देते हैं, अलग विंडो बना लेते हैं। बच्चे मोबाइल व लैपटॉप में एक साथ कई ऐप खोलकर रखते हैं, किसी की आहट पाते ही झट से उसे बदल देते हैं। ज़्यादा पूछ्ताछ करने पर बच्चे क्रोधित होकर चीखते-चिल्लाते हैं, तथा कई प्रकार के आरोप-प्रत्यारोप माता-पिता पर ही लगाने लगते हैं। कमरे में माता-पिता की उपस्थिति असहज करती है। बच्चे टेक्नालॉजी में एक्सपर्ट बन रहे हैं ये अच्छी बात है, परन्तु वे इसका ग़लत इस्तेमाल करके अपने लिए ही नहीं अपने घर-परिवार के लिए भी मुसीबतें खड़ी कर रहे हैं। सीधे-सादे माता-पिता समझ नहीं पाते हैं क्योंकि वे टेक्नॉलॉजी के इतने जानकार भी नहीं हैं। 

ये तो एक-दो खेलों का ज़िक्र था, ऐसे ही कितने ही खेल हैं जो बर्बादी के कारण बन रहे हैं। पैसे कमाने का लालच भी एक बहुत बड़ा कारण है ऑनलाइन गेमिंग का। इनमें से कई खेलों का विज्ञापन चर्चित चेहरे भी करते हैं, विज्ञापन के अंत में एक चेतावनी की औपचारिकता भी रहती है कि अपने जोखिम पर खेलें इसकी लत भी लग सकती है, परन्तु खेलने वाले इस पर ध्यान नहीं देते हैं। सबसे पहले इन विज्ञापनों पर रोक लगनी चाहिए। 

सूचना, मनोरंजन व पढ़ाई में सहायक मोबाइल, लैपटॉप इत्यादि घरों में कलह का एक नया कारण बन बन चुके हैं। फ़ोन का अत्यधिक इस्तमाल बच्चों को आक्रामक बना रहा है। किशोर ही नहीं, किशोरियाँ भी इस हद तक आक्रामक हो रही हैं कि परेशान अभिभावक राज्य महिला आयोग की जनसुनवाई में परामर्श के लिए पहुँच रहे हैं। 

आयोग की सदस्य मीनाक्षी भराला के अनुसार, “विभिन्न ज़िलों में होने वाली जनसुनवाई में हर बार तीन-चार मामले ऐसे सामने आ रहे हैं, जिनमें माताएँ अपनी बेटियों के फ़ोन अधिक इस्तेमाल करने से परेशान होकर मदद माँगने आती हैं। कई मामलों में नाबालिग़ बेटी को फ़ोन चलाने से रोकने पर माँ पर हाथ उठाने या हिंसक व्यवहार तक कर रही हैं (अमर उजाला 13-11-2025)।” 

आयोग के अनुसार ही एक माँ ने जब अपनी बेटी को फ़ोन चलाने से रोका, तो उसने नाखून से उसका मुँह नोंच लिया। संवेदनहीनता इस हद तक कि माँ रोती रही और बेटी हँसती रही। आज एक डायलॉग जो अक्सर बच्चे अपने माता-पिता से बोलते नज़र आते हैं—ये उनकी ज़िन्दगी है, वह जैसा चाहें वैसा जियेंगे ये कोई और तय नहीं करेगा। आज फ़ोन के अधिक इस्तेमाल से बच्चे आक्रामक हो रहे हैं, वे चिड़चिड़े व झगड़ालू हो रहे हैं। छोटी-छोटी बातों पर चीखते-चिल्लाते हैं तथा अभद्र भाषा का प्रयोग कर रहे हैं। बच्चों के मन की असंतुष्टि दिन-प्रतिदिन उनकी माँगों में बढ़ोतरी कर रही है तथा माता-पिता के साथ टकराव का कारण बन रही है। घर के सदस्य होटल की तरह अपने–अपने कमरों तक सीमित हो गए हैं। बच्चा अपने कमरे में बैठ कर कौन-सा गेम खेलता है, किससे बात करता है, क्या चीज़ देखता है, ये समझना बड़ा मुश्किल होता जा रहा है। बच्चे अपनी उलझनों को माता-पिता या घर के किसी अन्य सदस्य से बताना आवश्यक नहीं समझते। आज के बच्चे बड़ों को ये मान बैठे हैं कि उन्हें आज के समय का चलन नहीं पता है। उन्हें लगता है कि यह न जाने किस युग की बात कर रहे हैं। डिजिटल दुनिया से ज़्यादा जुड़ाव उन्हें वास्तविक जीवन से दूर करता जा रहा है। आधुनिक माँएँ तो ख़ुद ही बच्चों को मोबाइल और लैपटॉप के आकर्षण में उलझा रही हैं। छोटे-छोटे बच्चों को कार्टून दिखाकर खाना खिलाया जा रहा है। धीरे-धीरे ये बच्चों की आदत बन जाती है कि जब तक वे कार्टून नहीं देखेंगे तब तक खाना नहीं खाएँगे। थोड़ा बड़ा होने पर बच्चा ख़ुद ही मोबाइल में कार्टून देखने लगता है। पहले उन्हें कुछ समय के लिए मोबाइल दिया जाता है, धीरे-धीरे उस समय को बच्चे थोड़ा और थोड़ा करके बढ़ा लेते हैं और इस तरह से बच्चे में मोबाइल देखने की आदत पड़ जाती है। बच्चों में ये लत भयावह रूप धारण न कर ले इसके लिए हमें समय रहते सचेत होना पड़ेगा तथा बड़े बच्चों को धीरे-धीरे समझाकर या आवश्यकता होने पर मनोवैज्ञानिक परामर्श दिलाकर इस लत से छुटकारा दिलाना होगा। 

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