क्विक ऐप्स पर बढ़ती निर्भरता
आलेख | काम की बात डॉ. सुरंगमा यादव15 Jan 2026 (अंक: 292, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
गति और सुविधा का मेल कहे जाने वाले त्वरित कॉमर्स ऐप्स बड़ी तेज़ी से लोकप्रिय होते जा रहे हैं। यदि आप चाहते हैं कि आपको आपकी आवश्यकता की चीज़ें घर बैठे और तुरंत मिल जाएँ, तो ये ऐप्स बहुत सहायक हैं। श्रम, समय और कुछ हद तक पैसा तीनों की बचत करने वाले ये ऐप्स अत्यंत मददगार साबित हो रहे हैं, विशेषकर बड़ी उम्र के लोग जो बाज़ार जाकर सामान ख़रीदने में उतनी शीघ्रता नहीं कर सकते या रात में बाहर जाना सुगम व सुरक्षित न हो, तो रात्रि में एक निश्चित समय तक ये ऐप्स चीज़ें उपलब्ध कराते हैं। स्विगी इंस्टामार्ट, ब्लिंकिट, डंजो डेली, जेप्टो, बिग बास्केट तथा फ़्लिपकार्ट मिनट्स आदि इन सभी से सबसे बड़ा लाभ यह है कि आपातकालीन स्थितियों में जब आपको तुरंत कुछ चाहिए जैसे दवा, दूध, फल, सब्ज़ी, स्नैक्स तब यह बहुत उपयोगी हैं। अत्यधिक व्यस्तता, ख़राब मौसम या रात के समय इनकी उपयोगिता और भी बढ़ जाती है। ये ऐप्स उत्पादों की विस्तृत शृंखला प्रदान करते हैं। रोज़मर्रा के सामानों के अलावा इलेक्ट्रॉनिक्स, सौंदर्य उत्पाद तथा पालतू जानवरों के सामान जैसी अन्य छोटी-मोटी ज़रूरतों को भी कवर करते हैं। पारंपरिक ख़रीदारी की अपेक्षा ई कॉमर्स डिलीवरी से समय तथा कुछ शर्तों के साथ पैसे की भी बचत होती है, इसी प्रकार फ़ूड डिलीवरी ऐप्स स्विगी, जोमैटो, रैपिडो फ़ूड डिलीवरी, क्लाउड किचन आदि भी बहुत ज़्यादा लोकप्रिय हो रहे हैं।
त्वरित डिलीवरी ऐप्स ज़रूरतों को पूरा करने का एक आधुनिक बेहतरीन तरीक़ा है, परन्तु किसी भी सुविधा का सूझबूझ के साथ प्रयोग लाभदायक होता है अन्यथा अत्यधिक सुविधा समस्या बन जाती है। सुपर फ़ास्ट डिलीवरी प्रदान करने की लागत अक्सर उत्पादों की क़ीमतों में जुड़ जाती है, जिससे पारंपरिक ख़रीदारी की तुलना में ये महँगा हो सकता है। डिलीवरी चार्ज फ़्री करने के लिए हमें न्यूनतम ख़रीदारी करनी पड़ती है। उदाहरण के लिए ₹20 की चॉकलेट ख़रीदने पर बाज़ार में आपको ₹20 ही देने होंगे, इन ऐप्स से लेने पर या तो डिलीवरी चार्ज लगभग ₹30 दीजिए या कम से कम ₹150 का सामान ख़रीदिए। दोनों ही स्थितियों में नुक़्सान उपभोक्ता का है। इस प्रकार इस सुविधा का इस्तेमाल करने के लिए आपको अतिरिक्त भुगतान करना ही पड़ेगा। घर बैठे डिलीवरी की सुपरफ़ास्ट सेवा के कारण उपभोक्ता अनावश्यक चीज़ें भी ख़रीदते रहते हैं। मन पर नियंत्रण रखने की प्रवृत्ति कम हो रही है। ज़रूरत, इच्छा और लालसा का फ़र्क़ और भी कम होने लगा है। ज़रूरत वो चीज़ें हैं जो जीवन और अस्तित्व के लिए ज़रूरी है जैसे भोजन, पानी, हवा, सुरक्षा। इच्छा के अंतर्गत वे चीज़ें आती हैं जो जीवन को बेहतर बनाती है लेकिन ज़रूरी नहीं है जैसे फोन, महँगे कपड़े, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण आदि। डिज़ायर या लालसा ही दुःख का सबसे बड़ा कारण है जैसे बहुत चीज़ें, पैसा, शक्ति, हैसियत से ज़्यादा सुविधाएँ आदि। हमारे भारतीय परिवेश में तो ये माना जाता है कि जब कोई तीव्र इच्छा हो तो तुरंत उसे पूरा न करें, कुछ देर ठहरकर सोचें कि क्या वह इच्छा इतनी ज़रूरी है कि उसे अभी पूरा किया जाए, ये चिंतन आत्म नियंत्रण की शक्ति को बढ़ाता है। आज हमने छोटी-छोटी चीज़ों को लालसा बना लिया है, मुझे अभी चॉकलेट खाना है तो खाना है, मुझे अभी ये चाहिए तो चाहिए। पहले माता-पिता बच्चों को ये समझा भी देते थे कि जब बाज़ार जाएँगे तब ले आयेंगे। अक्सर ऐसा होता था जब बच्चे अपनी ज़िद भूल भी जाया करते थे, लेकिन आज बच्चे भी ये समझते हैं कि कोई भी चीज़ कैसे तुरंत मिल सकती है। सुपर फ़ास्ट डिलीवरी ऐप्स इस प्रवृत्ति को बहुत बढ़ा रहे हैं। मन में विचार आया, ऑर्डर किया, चीज़ हाज़िर। अब हम अपनी छोटी-छोटी इच्छाओं को नियंत्रित करना भी भूल रहे हैं। आज का युवा चार क़दम पैदल चलकर मार्केट जाने में झिझक रहा है, जबकि मार्केट में हम कई उत्पादों को देखकर तुलनात्मक रूप से फ़ायदेमंद चीज़ ख़रीद सकते हैं। इन ऐप्स पर ज़्यादातर बड़ी मात्रा के पैकेट की उपलब्ध होते हैं, जो अनावश्यक रूप से ख़रीद लिए जाते हैं तथा कई बार उपयोग में भी नहीं आते।
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