अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु मुक्तक - 1

1.
अपनी परछाई भी कभी धोखा दे देती,
पर आँसू का साथ उम्र भर का होता है ।
हँसने के तो गीत विदूषक गा देते हैं,
किन्तु विछोह की आग सिर्फ़ हृदय ढोता है॥
2.
तुम्हारे इन्तज़ार में हम मज़ार बन बैठे
हो सके तो तुम कभी चिराग़ जलाते रहना ।
हमसे अगर नहीं है मुहब्बत अब भी तुमको
कसम है तुम्हें-यह राज़ किसी से न कहना॥
3.
कटती ज़िन्दगी कैसे बेचारा फूल क्या जाने 
गुज़रती दिल पर क्या-क्या यह तो ख़ार से पूछो ।
किनारों पर आकर भी कुछ तो डूब जाते हैं
जो डूबकर भी बच निकले मझधार से पूछो॥
4.
संकल्प जगें तो पर्वत भी हिल जाया करते हैं ।
टूट-टूट्कर शिखर धूल में मिल जाया करते हैं ।
मरुभूमि सहचरी बन सरिता हरियाली भरती
हथेली पर काँटों की फूल खिल जाया करते हैं॥

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

साहित्यिक आलेख

बाल साहित्य कविता

नवगीत

लघुकथा

सामाजिक आलेख

हास्य-व्यंग्य कविता

पुस्तक समीक्षा

बाल साहित्य कहानी

कविता-मुक्तक

दोहे

कविता-माहिया

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं