क्लस्टर मिसाइलों जैसी कविताएँ
अनूदित साहित्य | अनूदित कविता प्रो. नव संगीत सिंह15 Mar 2026 (अंक: 294, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
मूल : सुखिंदर, संपादक: संवाद, माल्टन, कनाडा।
poet_sukhinder@hotmail.com
हिंदी अनुवाद : प्रो नव संगीत सिंह, पटियाला (पंजाब)
प्रवासी पंजाबी कविता
कविता के रणक्षेत्र में उतरकर,
मेरी कविताएँ,
क्लस्टर मिसाइलों की तरह,
एक ही समय में, बहु-दिशात्मक होकर
प्रदूषित वातावरण की विभिन्न बुराइयों पर
गुरिल्ला विस्फोट करती हैं।
कमज़ोर-दिल, कविता के पाठक
इसी कारण,
मेरी कविताओं से एक दूरी बनाकर चलते हैं—
उन्हें डर रहता है कि कहीं ये कविताएँ
उनके दिमागों में प्रवेश कर,
उनके दिमाग़ों को तार-तार न कर दें।
मेरी कविताओं का पहला निशाना
वे भ्रष्ट धार्मिक महंत हैं
जो चंबल घाटी के डाकुओं की तरह
धर्मनिष्ठ मठों के खज़ानों को लूटते हैं।
मेरी कविताओं का दूसरा निशाना
वे लुटेरे राजनीतिज्ञ हैं, जो
शोषितों-मजदूरों-किसानों के कल्याण के लिए आए फंड को,
अपनी जेबों में डाल अमीर बन जाते हैं।
मेरी कविताओं का तीसरा निशाना
वे बेईमान पुलिस अधिकारी हैं,
जो नशीले पदार्थों के तस्करों के साथ मिलकर,
देश में नशे का 'छठा दरिया' बहाते हैं।
मेरी कविताओं का चौथा निशाना
वे बलात्कारी शिक्षक हैं, जो
विश्वविद्यालय की छात्राओं की मदद करने की आड़ में,
बेबस छात्राओं का बलात्कार करते हैं।
मेरी कविताओं का पाँचवाँ निशाना
वे मुर्दा-ज़मीर साहित्यकार/बुद्धिजीवी हैं,
जो उपाधियों, सम्मानों और पुरस्कारों की ख़ातिर,
हर रोज़ सरकारी अधिकारियों के सामने दुम हिलाते हैं।
मेरी कविताओं का छठा निशाना
वे अंध-भक्त लोग हैं,
जो हत्यारों, गैंगस्टरों और राजनीतिक गुटों के इशारे पर,
धर्म, जाति और नस्ल के नाम पर
सांप्रदायिक दंगे करते हैं।
मेरी कविताओं का सातवाँ निशाना हैं
बौद्धिक कंगाल, आलोचक, संपादक, बुद्धिजीवी, पत्रकार,
जो, महज़ व्हिस्की की एक बोतल के लिए
बदमाशों, गुंडों, हिंसक तत्वों को बढ़ावा देते हैं।
मेरी कविताओं का आठवाँ निशाना हैं
वे हरामख़ोर व्यापारी
जो, अपने मुनाफ़े की ख़ातिर
नदियों, झरनों, झीलों के पानी को दूषित करते हैं
कविता के रणक्षेत्र में उतरकर
अपनी कविताओं को 'क्लस्टर मिसाइलों' की तरह
अपने निशानों की ओर दागते हुए मैं—
- निडर
- निःसंकोच
- बेपरवाह
- मोह-हीन
होकर चलता हूँ।
हमारे समय में
कविता लिखना
किसी भी तरह से कम नहीं है
रणक्षेत्र में उतरने से।
जागृत चेतना वाले कवि
हमेशा ही समाज की विरोधी ताक़तों
के निशाने पर होते हैं।
जागृत चेतना वाले कवि
पल-पल मृत्यु से सटकर गुज़रते हैं।
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