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है मुहब्बत गर तुम्हें, दिल से निभा सकता हूँ मैं

 

रमल मुसम्मन महज़ूफ़
फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाइलुन
 
2122    2122    2122    212
 
है मुहब्बत गर तुम्हें, दिल से निभा सकता हूँ मैं
चाहतों का सिलसिला दिल में छुपा सकता हूँ मैं
  
दर्द सीने में छुपाकर मुस्कुराता हूँ मगर 
चोट कितनी गहरी है, ये भी बता सकता हूँ मैं
  
रात की ख़ामोशियों में, तारे गिनता रहता हूँ 
ग़म के कितने छाले हैं, गिनकर बता सकता हूँ मैं
 
दिल की धड़कन में बसा लू़ँ, आज तुम को नाज़नीं
सामने गर तुम खड़ी हो, सर झुका सकता हूँ मैं
 
चाहता हूँ इक बसेरा, पर बना पाया नहीं
साथ मेरे तुम चलो तो घर बना सकता हूँ मैं
 
सूनी आँखों में, तुम्हारी जूस्तजू है मान लो
तुम कहो तो, फूल क़दमों में बिछा सकता हूँ मैं
 
तुम मुसाफ़िर, मैं मुसाफ़िर, अजनबी-से क्यूँ रहें
दिल में क्या अरमान है, तुमको सुना सकता हूँ मैं

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