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बाल-मनोवृत्ति

आजकल बच्चों की कितनी ख़ूबसूरत रंग-बिरंगी किताबें हुआ करती हैं। आज से तीस वर्ष पहले भी हुआ करती थीं, परन्तु बड़े शहरों के कॉनवेंट विद्यालयों की किताबें ही केवल ऐसी थीं। 

बाल-सुलभ आकांक्षाओं की दृष्टि में, छोटे शहरों के प्राइवेट विद्यालयों की किताबों की रंगीनियाँ कुछ अधूरी प्रतीत होती थीं। मैंने तो दोनों दृष्टियों से देखा है। पटना में, पड़ोसी बच्चे जिनके पिता B.D.O. (खंड विकास पदाधिकारी) थे। उनकी चार बेटियाँ—बुलबुल, पुतुल, रानी और सोनी में से, रानी मेरी सम-वयस्क थी। वे सभी वहाँ के बहुत ही प्रतिष्ठित विद्यालय में पढ़ती थीं। 

मैं उत्सुकतावश रानी की किताबें पलट कर देखती थी। सचमुच वो किताबें बड़ी लुभावनी प्रतीत होतीं और कभी-कभी मैं बड़ा आकर्षण अनुभव करती। मुझे याद है कि उस समय मैं विद्या मंदिर की विद्यार्थी थी, जिसे नकार कर उनके विद्यालय में नाम लिखवाने की ज़िद कर के गई भी थी। गर्मियों के दिन थे। प्रात:कालीन कक्षा में स्कूल के नीति-नियमों को समझा-बुझाकर, शिक्षकों से डाँट खाने का भय मानकर रानी पल्ला झाड़ गई थी। अपनी कक्षा से बाहर गुलमोहर पेड़ के नीचे मुझे बिठा कर वह अपनी कक्षा में भाग गई थी। मैं धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा कर रही थी। बाद में उनके वर्ग शिक्षक ने वहाँ मुझे अकेले बैठे रहने का कारण पूछा और कक्षा में बैठाया। मुझसे प्रभावित होकर प्रधानाचार्य ने अभिभावक को मिलने के लिए बुलाया था। बच्चों के नामांकन के लिए, अभिभावक का उच्च शिक्षित होना, वहाँ की पहली शर्त थी। आठवीं कक्षा तक पढ़े मेरे पिता ख़ुद को असमर्थ मान, आत्मविश्वास की कमी से सामना करना नहीं चाहते थे। इस कारण मैंने तो उस समय घर पर पिता के सामने उनकी इस असमर्थता पर ख़ूब हो-हल्ला मचाया था। इस घटना से संबंधित कहानियाँ बचपन में मेरे माता-पिता कभी-कभी दोहराया करते थे। उस विद्यालय में ना पढ़ पाने का अफ़सोस मुझे, जाने कितने वर्षों तक रहा था। जो कि मेरी बाल मनोवृत्ति थी। 

मेरी छोटी बहन B.D.O. पद और उनके आकर्षक व्यक्तित्व के जादू से प्रभावित हो कर आई थी। गाँव पर बारात देखकर लौटी बहन से बड़ी माँ/ताई जी ने पूछा, "दुलहा कैसा था बेटा?" 

तो नाक सिकोड़ती हुई बोली, "दुलहा बैठा था तो रथ पर, किन्तु रथ के क़ाबिल नहीं था माँ।"  फिर थोड़ा रुक कर बोली, "मेरे लिए सुन्दर और B.D.O. दुलहा खोजना। वैसा काला-कलूटा नहीं।" काले दुलहे को देखकर प्रतिक्रिया स्वरूप B.D.O और सुंदर दुलहे की माँग छह से सात वर्ष की बच्ची कर रही थी। यह उसकी बाल मनोवृत्ति में थी। 

कभी-कभी बच्चों में ग़ज़ब का आत्मविश्वास भी रहता है जिससे संबंधित बात याद आ रही है। 'बबुआ पांडे' जो कि मेरे चचेरे भाई जी मुझसे एक वर्ष बड़े हैं। मैं उनकी चमची थी। वैसे देखा जाए तो हर कोई उनका चमचा था। बड़े बाबा का इकलौता पोता होने का सामाजिक-पारिवारिक जन्मजात विशेषाधिकार के साथ जो उत्पन्न हुए थे। एक बार जाने क्या सूझा? या गणित में कोणीय आकृति संबंधित किसी गृहकार्य पर काम करना होगा तो औजार बॉक्स की आवश्यकता पड़ी होगी या शहर के बाज़ार से मँगवाने हेतु अनुकरणात्मकता के लिए किसी के यहाँ से माँगना था। मुझे आदेश मिला, "मुखिया बाबा के यहाँ से हजार बॉक्स माँग कर लाओ। भैया माँगा है कहना।"

मुखिया बाबा या चाचा जो भी हमारे रिश्ते में रहे होंगे। पटना में पढ़ने वाली उनकी भतीजी गर्मियों की छुट्टी में गाँव आई थी। उससे माँग कर लाने का मुझे आदेश मिला था। 'हजार बॉक्स' शब्द और उसकी महत्ता से उस समय तक मैं अनभिज्ञ थी। मैं उसके आदेश को कंठस्थ करती हुई पहुँची थी। "भैया हजार बॉक्स माँगा है।"

सुनकर वह अचंभित, अर्थ स्पष्ट करने के लिए बोली तो जैसे-तैसे गणित से संबंधित संभावना को मैंने व्यक्त किया। तब हँसते हुए उसने पूछा, "औजार बॉक्स?"

"हाँ . . . हाँ यही दीजिए।"

सुनकर हँसते हुए वह लोट-पोट हुए जा रही थी। फिर स्पष्ट करते हुए मुझे उसने बताया, "अरे पगली यह औजार बॉक्स है, हजार बॉक्स नहीं।" 

मैंने भी बेझिझक स्पष्टिकरण करते हुए कहा, "भैया ने जो बताया था वही मैं बोली। "

किताब-कॉपियों के लिए तो कभी सोचना ही नहीं पड़ा। साक्षर माता-पिता की दृष्टि में एक मात्र लक्ष्य, ख़ुद से बेहतर भविष्य अपने बच्चों को देना था। बस मन में जो आता था, छोटी-बड़ी सूची लेकर, पढ़ाई के लिए यह ज़रूरी है कह कर माता-पिता के पास उपस्थित हो आओ। 

मध्यम वर्ग से संबंधित होने के कारण हमारी छोटी-छोटी आकांक्षाओं की पूर्ति यथासंभव आराम से हो ही जाती थी। एक बार यूँ ही मन की मौज में बाज़ार में चार रंगों (नीले, काले, लाल और हरे) के स्याही वाला बॉलपेन देखकर माँ से बोल कर पैसे ले लिए थे कि वैसी क़लम मेरे लिए बहुत ज़रूरी है। संभवतः उस समय तीन या चार रुपए मूल्य रहा होगा। जो उस समय के हिसाब से ज़्यादा था। रंगीन अक्षरों में बड़ा गौरवान्वित भाव जगा था। 

पटना के बाद लगभग तीन वर्षों तक माता जी के साथ हमें गाँव में रहना पड़ा था। तदोपरान्त हम पिता जी के कार्यस्थल बिहार शरीफ पहुँचे थे। हमारी बोली-व्यवहार में ठेठ भोजपुरिया संस्कृति और भाषा गहराई से जड़ जमा चुकी थी। माता जी ने भोजपुरी त्याग कर वर्तमान हिन्दी को (अंग्रेज़ी मान कर) अपनाने का पहला ज्ञान दिया था। जो माई से 'मम्मी' और बाबू जी को 'पापा' कह कर संबोधित करने के लिए निर्देशित किया गया था। आधुनिकीकरण की दिशा में यह हमारा पहला 'भाषा' परिवर्तन था। 

सबसे मज़ेदार बात यह भी है कि आठवीं कक्षा के क्रम में मझले मामा जी की शादी में, उम्र में शतक के क़रीब विशुद्ध सनातनी स्नातक वैष्णव परनाना जी से इसी मम्मी-पापा के सम्बोधन के कारण डाँट के साथ, किसी और की शैतानी की क़ीमत चुकाने में चक्रवृद्धि ब्याज दर पर एक थप्पड़ भी खाया था मैंने। जिसकी पूरी कहानी ऐसी है– माता जी का आदेश था कि जाओ नाना जी से खाना के लिए पूछ आओ। अब माता जी ने 'खाना' शब्द प्रयोग किया था अतः मैं भी असावधानी वश पूछ बैठी, "नाना जी आपका खाना लाऊँ?"

सुनकर परनाना की आक्रोशित प्रतिक्रिया हुई, "ये खाना क्या होता है? खाना-पखाना? मैं तुम लोगों पर ध्यान दे रहा हूँ कि माँ को मम्मी 'मरा हुआ मुर्दा' पिता जी 'कुत्ते का बच्चा' क्या यही भारतीय संस्कार है? उचित-अनुचित का कुछ ध्यान ही ना रहे?" और मैं शान्त, स्तब्ध आवाक रह गई थी। हालाँकि शान्त बच्ची रूप में कष्ट उतना ही रह गया था। अब किसी दिन विवाह के घर में आए विविध स्वभाव के बच्चों की किसी उद्दंडता से अनभिज्ञ बड़ों की आज्ञा
-पूर्ति में मैं उधर से गुज़र रही थी। अनभिज्ञता में परिणति एक धौल पीठ पर, अनेक में कोई एक बच्चा देख और समझ पाते नाना, तब तक झटके में मैं अकस्मात् प्रस्तुत थी। अब बच्चों की उद्दण्डता कितनी प्रबल रही होगी इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन जैसे धैर्यवान संत को भी अशान्त कर दिया था। सभी इस बात पर अचंभित भी थे और मिला किसे झटका? वह भी अलग विचारणीय प्रश्न था। 

सारी बातें अब सोचती हूँ, तो हँसी आती है। वो मेरा बचपना ही तो था, पाँचवीं कक्षा की बात है, जब "आवश्यक अन्य किताबों के अतिरिक्त अंग्रेज़ी शब्दों की, रंगीन तस्वीरों वाली किताब भी चाहिए पापा।" मैंने इच्छा ज़ाहिर की, पिता को बाज़ार जाने के लिए तैयार देखकर। जी हाँ, तब तक मैं हिन्दी-अंग्रेज़ी की सही सीमा पाँचवीं कक्षा सरस्वती शिशु मंदिर में पढ़ने के क्रम में समझ-जान चुकी थी। हमेशा की तरह पिता ने सुनकर, कोई सवाल नहीं उठाया। हमारी शिक्षा के प्रति सकारात्मक सोच सदैव उनमें रही है। 

पिता जहाँ ड्यूटी पर तैनात थे, वहाँ से बाज़ार की काफ़ी दूरी थी, सो आने-जाने में साइकिल से आराम से देढ़-दो घंटे लग ही जाते थे। किताबों के प्रति मेरी बेसब्री अपनी चरम पर होती थी। 

आज भी मुझे याद नहीं कि पिता ने मेरे लिए किताबों के अतिरिक्त कोई अन्य उपहार सोचा हो या दिया हो। कपड़े और अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति माता जी की ज़िम्मेदारियाँ रही हैं। घरेलू और सामाजिकता के संदर्भ में भी हमेशा पिता केवल आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वेतन की निश्चित राशि देकर निश्चिंत रहते। 

हाँ, तो अन्य किताबों के साथ वो अंग्रेज़ी की रंगीन तस्वीरों वाली किताब भी आई। कुछ हो ना हो बचपन में एक विशिष्टता होती है कि निष्पाप-मासूमियत में प्रत्येक छोटी सी बात भी उत्सव बन जाती है। इसके अतिरिक्त जब उस उत्सव में शामिल होने वाले छोटे-भाई बहनों का दल-बल भी साथ हो, तो फिर कहना क्या? अड़ोस-पड़ोस के बच्चों के साथ हमारा अच्छा व्यवहार सदैव उन्हें आकर्षित रखता। वह नि:संकोच आते और खेलते। 

मैं, पड़ोस के बच्चों के सामने ही झटपट सभी किताबों में ज़िल्द लगा ही रही थी कि बिजली चली गई। 

जब-तक लालटेन की रोशनी जली तब-तक सारी किताबों के बीच से एक मात्र वह सुनहरी किताब जो सबके उत्सुकता की केन्द्र-बिन्दु थी, ग़ायब हो गई। सारे बच्चे तो यहीं पर थे। कोई कहीं गया भी नहीं था फिर ऐसा कैसे हुआ भला?

मेरा तो रो-रो कर बुरा हाल। बड़ी अफ़सोस, मेरी सुन्दर किताब तो अभी यहीं थी। किसने ले ली?

सभी ढूँढ़ने लगे। जैसे उस किताब में रहस्यमय पंख निकल आया हो और वह उड़ गई या कोई जिन्न उठा ले गया। मेरी छोटी बहनें और अड़ोस-पड़ोस के वो बच्चे भी जो तत्क्षण मौजूद थे। सबके आकर्षण और सहानुभूति का केंद्र बिंदु बन चुकी थी वह किताब। 

बहुत विकट स्थिति। मेरा बचपना, उस किताब का मोह एवं सिर्फ़ मेरे पास उपलब्ध उस विशेषाधिकार युक्त अभिमान की पूर्ति, तीनों की संयुक्त-शक्ति चरम पर थी। उसके कारण छोटे-बड़े सभी हतप्रभ थे। 

दो घंटे बीत चुके थे। मेरी प्रिय किताब अभी तक किसी नवजात शिशु की तरह अपहृत, विलुप्त थी। मेरे जैसी परिपक्व-गंभीर लड़की ने अगर आसमान सिर पर उठाया था तो मामूली बात नहीं रह गई थी। 

तभी सामने वाली चाची अपनी छोटी बेटी रिंकी को लेकर गहरी रहस्यमयता के साथ घर के एकांत में चली गई। उसे बहला-फुसलाकर बड़े प्यार से पूछा, तो उसने बताया कि उसकी बड़ी बहन पिंकी, बिजली न रहने पर क्वार्टर के पीछे गई थी। 

पिंकी, जो मेरी सम-वयस्क थी पर छोटी-मोटी चोरियों की आदतों की शिकार थी। यह बात एक माँ से बेहतर भला और कौन जान-समझ सकता था?

एक उम्मीद जगी थी उनमें। उन्होंने  पहले प्यार से पूछा . . . पर असफल रहीं। फिर क्या? हारकर वह चप्पल से बेटी की पिटाई करने लगीं‌। अचानक से एक नई कहानी की शुरुआत से हम अचंभित और अनभिज्ञता में कुछ समझ नहीं पा रहे थे। 

माता के प्रश्नों और चप्पलों की बौछाड़ जनित उसका क्रंदन सुनकर बीच-बचाव में हम सभी को दौड़ना पड़ा था। अन्ततः मार-पीट करने पर स्वीकारोक्ति के साथ, वह अँधेरे में जाकर उस गुप्त स्थान, जहाँ पर किताब छिपाई थी, वहाँ से निकाल कर ले आई। 

किताब नंगी-धंगी, पूरी तरह मुड़ी, दुर्गति की शिकार, जिल्द-विहीन, श्रीहीन मेरे हाथों में पहुँची थी। कुछ क्षण पहले तक जिस पर इतना नाज़ था, इतनी जल्दी दुर्दशा प्राप्त करेगी; सोच और समझ पाना हम सभी के लिए अकल्पनीय था। 

बावजूद एक आश्वस्तता मिली कि चलो किताब मिल गई। जो बाल-सुलभ ईर्ष्यावश, पलक झपकते मात्र में चुरा ले गई थी, वह चतुर बुद्धि झट से छिपा कर सहानुभूति जताने वालों की टोली में भी शामिल थी। उसके पिता और मेरे पिता दोनों समान पद-प्रतिष्ठा प्राप्त कर्मचारी थे। बावजूद तत्क्षण प्राप्यता की आतुरता में पिंकी के लिए प्रतीक्षा की बात समझ से परे थी। यह उसकी बाल मनोवृत्ति थी। 
 

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