अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता सजल

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सांस्कृतिक आलेख सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध हाइबुन काम की बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य सिनेमा चर्चा ललित कला स्वास्थ्य

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा यात्रा वृत्तांत डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र पत्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया पर्यटन

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

मासूम भय

 

मनुष्य अपनी प्रवृत्ति और समझ के आधार पर ग्रहण करता है। फ़िल्मों का असर वास्तविक जीवन पर कब, क्या और कितना पड़ता है? सचेतन-जागरूकता बढ़ी या भय? सीमारेखा तय कर पाना बड़ी मुश्किल होता है। 

आतंकवाद से संबंधित फ़िल्मों में जाने-अनजाने अक़्सर दिखाया जाता है कि स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस के उपलक्ष्य में उपस्थित भीड़ आतंकियों का आसान शिकार होती है। 

26/11/2008 का मुम्बई अटैक भी N.D.T.V. द्वारा सजीव प्रसारण बेटी देख चुकी थी। यह देश का दुर्भाग्य था या किसी धर्म विशेष से प्रभावित आतंकियों की पशुता? तय कर पाना आसान कहाँ? नज़र-अंदाज़ करना भी तो महामूर्खता होगी। 

जिसका भय आठ-नौ वर्षीय बेटी के दिमाग़ में बैठ चुका था कि वह कहीं गणतंत्र दिवस की भीड़ में जाएगी और आतंकवादियों के बम-ब्लास्ट का शिकार हो जाएगी। इसका एक उदाहरण प्रत्यक्ष था मेरे! 

जैसे ही पता चला कि (बच्चों में देशभक्ति की भावना जगाने के लिए) उसकी माता अर्थात्‌ मेरे कहने पर इस बार गणतंत्र दिवस का परेड देखने हम दिल्ली जा रहे हैं और इसके लिए रिज़र्वेशन भी हो चुका है। वह मुझ पर झल्ला और चिल्ला रही थी, “क्या माँ! तुम्हारी देशभक्ति के चक्कर में कहीं हम किसी पागल और सनकी आतंकवादी के आतंकी हमले के शिकार ना हो जाएँ?” 

यह भय उसके मन में ज़्यादा देर तक रहने नहीं दूँगी। जानकर और मानकर मैं शान्तचित्त अपनी बच्ची के भययुक्त मनोभाव को समझने का प्रयास कर रही थी। पशुता युक्त इस मानवीय दुनिया में वह ग़लत भी तो नहीं थी। 

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

105 नम्बर
|

‘105’! इस कॉलोनी में सब्ज़ी बेचते…

अँगूठे की छाप
|

सुबह छोटी बहन का फ़ोन आया। परेशान थी। घण्टा-भर…

अँधेरा
|

डॉक्टर की पर्ची दुकानदार को थमा कर भी चच्ची…

अंजुम जी
|

अवसाद कब किसे, क्यों, किस वज़ह से अपना शिकार…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

लघुकथा

व्यक्ति चित्र

कहानी

बच्चों के मुख से

स्मृति लेख

सांस्कृतिक कथा

चिन्तन

सांस्कृतिक आलेख

सामाजिक आलेख

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं

लेखक की पुस्तकें

  1. रमक-झूले की पेंग नन्हा बचपन