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रेलवे क्वार्टर

बिना फाटक का रेलवे लेबल-क्रॉसिंग होने के कारण अक़्सर लोग हड़बड़ाहट में रेल-दुर्घटना के शिकार हो जाते थे। चलती रेल से टकरा, कट कर जाने कितनी जानें गई थीं? नशे के कारण, गाड़ी अनियंत्रित-असंतुलित होकर या इंजन जाम हो जाने से, अक़्सर कोई ना कोई जान-ज़िंदगी मांस के लोथड़ों में सिमट जाती। 

कुमारधुबी के रेलवे लेबल क्रॉसिंग गेट के बग़ल में ही एक सरकारी क्वार्टर है, जिसके भूतिया होने की कई कहानियाँ जनश्रुतियों में विख्यात हैं। 

कोलियरी के कारण माफ़ियाओं और चोरों के छोटे-बड़े गिरोहों की सक्रिय भागीदारी रहती ही है। यहाँ के जन-जीवन में नशाखोरी, उधारी और सूदखोरी अपनी अलग ही प्रचण्डता और नृशंसता के लिए कुख्यात हैं। 

जिस दिन वेतन मिलता उसी दिन सूदखोर महाजन अपने-अपने उधार पर ऊँचे ब्याज दर वसूलने पहुँच जाते। आसानी से दे दो वरना मार-पिटाई से पैसे वसूलना उन्हें ख़ूब आता। 

दबंगई के कारण, किसी से कोई पंगा हुआ तो हत्या कर शव को आस-पास की झाड़ियों में फेंक कर ग़ायब हो जाते थे अपराधी। 

रेलवे ट्रैक से बिलकुल सटा हुआ, मैं जिस पुराने क्वार्टर की बात कर रही हूँ– गतिमान ट्रेन का कंपन, किसी भूकंप की तीव्रता लिए कंपायमान उस क्वार्टर को थरथरा देता। उस सम्पूर्ण अस्तित्व के साथ उसमें मौजूद सजीव-निर्जीव प्रत्येक अणु-अणु झंकृत हो उठता। किसी सुपर फ़ास्ट ट्रेन के गुज़रने पर, कहीं घर ढह तो नहीं रहा, सोया हुआ व्यक्ति अकस्मात् भ्रमित हो जाने जैसा अनुभव करता। 

क्वार्टर के नाम पर एक कमरा, फिर बरामदा, उसके बाद सीमित, अपर्याप्त, एक छोटी रसोई और पिछले हिस्से की तरफ़, अलग एक कोने में शौचालय बना हुआ था। किन्तु उसके आँगन के सामने की एक दीवार गिर जाने से बाहरी संपर्क आसान था। जिसका अनुचित लाभ उठाते हुए अवांछित तत्वों का शिकार हो जाना, सहज-सरल बात थी। 

गुज़रती रेलगाड़ी की भयंकर शोर– घड़घड़ाहट में घुटती, चीख़-पुकार की आवाज़ दब सी जाती। पर सबसे विभत्स और विकराल रूप होता– टूटे पाखाना शीट में फँसा हुआ अकड़ा उल्टा मृत शरीर अर्थात् सिर नीचे पाखाना शीट में फँसा हुआ, और खड़ा धड़ शीर्षासन की मुद्रा में। 

ऐसा एक नहीं, कई बार हुआ। अब वो आपसी रंजिश का परिणाम हो या जो भी, कुछ सच, कुछ झूठ, इसे भूत-प्रेत से जोड़ कर आसानी से अलग रंग दे दिया जाता। 

पर कुछ वहाँ के वातावरण में व्याप्त रहता जो असंतुलित करके बेचैनी भरता। कोयले के गर्द-ग़ुबार से पटी सड़कें-गलियाँ, घर-बाहर। धूलकणों में भी कोयलें की श्यामल परछाइयाँ हावी होकर, रंगीनियों को भी अपने रंग में रँगने को उतावली प्रतीत होतीं। जब भी कोई ख़तरे का सायरन बजता, लोगों का रक्त जम जाता। पल-पल मौत का साया सिर पर मँडराता अनुभव होता। 

मृत्यु के देवता, यमराज अपनी विकराल पाश में किसे बाँध कर अपनी सत्यता सिद्ध करने निकलेंगे, पता नहीं? सभी अपने-अपने परिजनों के कुशल-मंगल की प्रार्थना करने लगते। दिन के उजाले पर गुलाबी गोरापन भी ग़ज़ब पीलिया जैसा दिखता। जिधर देखो उधर कोयले की कालिख तन-मन, दिल-दिमाग़ पर पोतने पर आमादा। पर, सबसे क्रूर सत्य पापी पेट, रोज़ी-रोटी का सवाल था। 

हमारी शिक्षा व्यवस्था के लिए ज़रूरी था कि कहीं एक जगह पर रह कर पढ़ाई करें। पिता अपने स्थानांतरण के कारण समय-समय पर आकर, मिलकर चले जाते। कभी-कभी माता जी चली जातीं हाल-चाल जानने। छुट्टियों में दो-चार दिनों के लिए कभी-कभार हम सभी चले जाते। 

वह क्वार्टर, ठीक रेलवे लाईन के बग़ल में ही था। जब मेरे पिता वहाँ स्थानांतरित होकर पहुँचे थे तो सारे अन्य नये क्वार्टर में कोई न कोई परिवार रह रहा था। एकमात्र विकल्प वही था जो परित्यक्त, क्षतिग्रस्त था। पुलिस विभाग में कार्यरत एक से एक भयंकर परिस्थितियों से निपटने वाले हनुमान भक्त को जाने कौन सा भरोसा होता है? ये तो भक्त और भगवान ही जाने। 

जिसे भी पता चलता कि उस क्वार्टर में कोई रहनेवाला है। पुरानी घटनाओं को बता कर सावधान करने से नहीं चूकता। मेरे पिता उसे आश्वस्त करते हुए कहते, "मुझे कुछ भी नहीं होगा आपलोग निश्चिंत रहें।"

पिता को जब समझा कर लोग हार गए तब महिलाओं में हलचल मच गई, मेरी माँ को समझाने-बुझाने की। ताकि उस क्वार्टर में रहते हुए कोई अनिष्ट ना हो। 

पर अपने पति के दृढ़ संकल्प को वही मात्र जानती थी कि असंभव है डिगा पाना। नियत समय पर साफ़-सफ़ाई कर नियमित रामायण पाठ करके वह रहने लगे। 

किसी रात्रि ड्यूटी से वापस लौट कर थके-हारे सोए हुए थे कि गहन निद्रायुक्त स्वप्न में लगा उनके छोटे चाचा आकर बहुत ज़ोरों से दरवाज़ा खटखटा रहे हैं। 

उन्होंने नींद में ही उठकर दरवाज़ा खोलकर उन्हें अंदर लाकर बिठाया है- "बहुत ज़०रों की प्यास लगी है, मुझे पानी पिलाओ।"

सुनकर पानी का ग्लास भरकर लौटने पर वहाँ कोई नहीं था। 

चाचाजी . . . चाचा . . .! करते हुए नींद की अवस्था में ही वो बाहर तक दौड़ पड़े। पर दूर-दूर तक कोई भी नहीं था। तभी याद आया, "छोटे चाचा तो मर चुके हैं। वो कहाँ से आएँगें?"

एक सिहरन के साथ झटके में नींद या भ्रम का पटाक्षेप हुआ। तो पता चला कि क्वार्टर के बाहर वह स्तम्भित खड़े थे। आधी रात का समय था। तूफ़ानी हवा विचित्र शोर करती साँय-साँय चल रही थी। इसी तरह जानें कितनी बार परछाइयाँ आकर अपनी मौज़ूदगी दर्ज कर जातीं। 

वहाँ एक बार मेरे छोटे मामा पहुँचे थे। कुछ घंटे के लिए अकेले में वो बुरी तरह डरकर, घबराहट में पड़ गये थे, क्योंकि बहुत बेचैनी और अजीब सी गतिविधियों युक्त हलचल अनुभव हुआ था उन्हें। 

जबकि उनसे कुछ भी कहा नहीं गया था। वह भी उसी तरह आधी रात में दरवाजे़ पर किसी के बहुत ज़ोरों की दस्तक पर उठ गये थे। 

उस समय मैंने इन घटनाओं को सुनकर अपने पिता से जिज्ञासावश सवाल किया था, "क्या भूत-प्रेत होते हैं?"

सुनकर बड़े धैर्य से कहा, "जैसे अच्छे-बुरे लोग होते हैं वैसे ही हमारे आस-पास सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ऊर्जा भी हैं।  बस तुम उन्हें अनावश्यक रूप में तंग मत करो। ख़ुद में सकारात्मक रहो, नकारात्मक ऊर्जा अपने आप दूर रहेगी। तुम अपने हाव-भाव, विचार और व्यवहार से उन्हें आकर्षित करने या दूरी बनाए रखने में सफल हो सकती हो।" 

उस क्वार्टर में पूरी तरह साफ़-सफ़ाई रखते तीन-चार वर्षों तक मेरे पिता अपने आस्था-विश्वास सहित सुरक्षित रहे थे। 

जिस पर लोग आश्चर्यचकित होते और पूछते, "तुम आदमी हो कि भूत हो?" 

पिता मुस्कराते हुए कहते,  "सब हनुमान जी की कृपा है।"

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