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चालान

 

ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध जारी था। कोई भी देश पीछे हटने को तैयार नहीं था। हर तरह के शान्ति समझौते विफल हो रहे थे। भारत और अन्य देशों में पेट्रोल, डीज़ल और गैस की हालत बेहद गंभीर थी। सोने-चाँदी की क़ीमतें आसमान छू रही थीं। अमेरिका जैसे देशों में भी तेल और गैस की ऊँची क़ीमतों को लेकर हंगामा मचा हुआ था। प्रधानमंत्री और देश की राज्य सरकारों ने इन समस्याओं से निपटने के लिए कई तरह की योजनाएँ बनाईं। तेल और गैस की खपत कम करने और सोना-चाँदी न ख़रीदने के लिए सूचना जारी की गई। आम लोग सोना-चाँदी तो कम ख़रीद लेते, लेकिन तेल और गैस के बिना उनका गुज़ारा कैसे होता! सरकारों ने इसका एक समाधान यह निकाला कि सभी कार्यालय सप्ताह में दो दिन घर से ऑनलाइन काम करें, वाहनों का उपयोग कम किया जाए—यानी पेट्रोल और डीज़ल का कम इस्तेमाल किया जाए, साइकिल को प्राथमिकता दी जाए . . .

एक दिन हरिंदर ने संजीव और मनदीप से फोन पर बात की, “यार, क्यों न हम लोग अलग-अलग मोटरसाइकिल पर यूनिवर्सिटी जाने के बजाय, एक ही वाहन पर जाया करें! किसी दिन एक अपनी मोटरसाइकिल निकाल ले, तो कभी दूसरा।”

“तुम सही कह रहे हो, इस तरह हम ईंधन की खपत कम करने में योगदान दे पाएँगे,” संजीव और मनदीप ने अपनी सहमति जताई।

एक दिन रास्ते में यातायात पुलिस ने एक चेकपॉइंट पर रोककर एक ही मोटरसाइकिल पर बैठे तीन लोगों का चालान काट दिया, तो संजीव ने तुरंत कहा, “देखिए साहब, हमने यह क़दम सिर्फ़ पेट्रोल बचाने के उद्देश्य से उठाया है। हमारे बाक़ी सभी दस्तावेज़ पूरे हैं, हेलमेट भी पहने हुए हैं। अगर सरकारी कर्मचारी ही पेट्रोल बचाने के काम में बाधा बनते हैं, तो हम आगे से अपनी-अपनी मोटरसाइकिलों पर आ जाया करेंगे . . .”

यातायात पुलिस कर्मी दुविधा में था कि चालान काटे या नहीं . . . 

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