घुटन
काव्य साहित्य | कविता सत्येंद्र कुमार मिश्र ’शरत्’15 Aug 2020 (अंक: 162, द्वितीय, 2020 में प्रकाशित)
जादू था
या तिलस्म,
एक वर्ष
कब का बीत गया
पता ही नहीं चला।
इस संसार में
बस दो ही थे
एक- दूसरे में खोये
सब चिंताओं से मुक्त।
क्या-क्या नहीं हुआ,
लड़ना-झगड़ना,
रूठना-मनाना,
इंतज़ार करना।
मिलने के लिए
नए-नए बहाने बनाना
उसकी
एक
मुस्कान के लिए
कितनी-कितनी
झूठी-सच्ची
बातें बनाना।
शायद
सब झूठ था,
शुरू से
आभास होता था,
यह एक सपना है,
एक जादू है
जो सच नहीं है ।
रात ख़त्म होगी,
सपना टूट जाएगा
लेकिन
कैसे झूठ मान लूँ,
ज़िंदगी
सपना नहीं है,
जिसे भूल जाऊँ।
वह
याद बनकर
चुभती रहती है
नहीं-नहीं
काँटा नहीं,
सबसे अलग है
यह दर्द,
यह चुभन,
यह घुटन,
यह उदासी ,
जो शब्दों से ,
बयां नहीं होती।
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