साँझ कुछ इस तरह
काव्य साहित्य | कविता नीरजा हेमेन्द्र1 Feb 2026 (अंक: 293, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
सिहरन भरी हवाएँ
दे रही हैं दस्तक
धीरे . . . धीरे . . . धीरे . . .
बन्द खिड़की पर
हवाओं की सरसराहट में
गूँज रहे हैं अब भी
फगुआ, चैती, कजरी के राग
नर्म ऋतुओं को गु़ज़रे अरसा हो गया
बन्द खिड़की खोल दी है मैंने
मौसम कुछ और सर्द हो चला है
साँझ छुपने लगी है कोहरे की चादर में
ताज़ा हवा की अनुभूति
गहराती रात्रि को
सुखद . . . अर्थपूर्ण बना रही है
कुछ उसी प्रकार जैसे बढ़ती उम्र
नवीनता की ओर बढ़ती है
आधुनिकता को आत्मसात् करती जाती है।
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