प्रथम प्रेम का रंग
काव्य साहित्य | कविता नीरजा हेमेन्द्र1 Feb 2026 (अंक: 293, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
बसंती हवाओं के साथ
खिल उठे हैं पुष्प सेमल के
एक परिचित-सा स्पर्श
एक जानी-पहचानी सी आहट
बिखरने लगी है हवाओं में
अन्तराल पश्चात् ये हवाएँ ले कर आयी हैं
कुछ विस्मृत-सी स्मृतियाँ
कुछ युवा दिन . . . और तुम्हें . . .
सेमल के पुष्पों की भाँति रक्ताभ हो उठा है
जीवन का ये बियाबान मौसम
स्मरण हैं मुझे अब भी वो क्षण
जब समेट लिया था तुमने
मेरा प्रेम अपनी मुट्ठियों में
कुछ इसी प्रकार रक्ताभ हो उठी थीं ऋतुएँ
मेरे चारों ओर बिखर गया था
प्रेम का लाल रंग
धूप भरे पथ पर चलते-चलते
प्रेम का वो रंग
यद्यपि फीका पड़ने लगा है किन्तु . . .
मेरे प्रथम प्रेम की अभिव्यक्ति का वो रंग
कच्चा नहीं था
सूर्यास्त के क्षितिज को अब भी सुनहरा कर देता है
प्रेम का वो रंग . . .
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