तुम्हारा यथार्थ
काव्य साहित्य | कविता नीरजा हेमेन्द्र1 Feb 2026 (अंक: 293, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
बहता जा रहा है जीवन
किसी नदी की भाँति
अनजाने-अनचिन्हें मार्गों पर
पथ बनाता हुआ
वाष्प . . . बादल . . . बारिश . . . पुनः जल
नदी के क्रमबद्व रूप
निर्माण . . . विध्वंस . . . पुनः निर्माण
इस प्रक्रिया के दोहराव की
पीड़ा की अनुभूति तुम नहीं कर पाओगे
तुम पर्वतों पर ठहरे घनीभूत बादल हो
ठहरोगे . . . बरसोगे . . . ढूँढ़ लोगे आलम्बन
किसी सतह का . . . किसी नदी का . . .
किन्हीं जल वितरिकाओं का
नदी की पीड़ा से अनभिज्ञ
तुम पर्वतों पर ठहरे घनीभूत बादल हो।
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