अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य ललित कला

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा वृत्तांत डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

ये मीडिया अगर मिल भी जाए तो क्या है

(साहिर लुधियानी से माफ़ी माँगते हुए)
 
ये ’व्हाट्सएप्प’ ये ’ट्विटर’
ये ’मीडिया’ की दुनिया
ये ’लाइक’ के भूखे
समाजों की दुनिया
 
ये इंसान के दुश्मन
’लिंचिंग’ की दुनिया
ये ’फ़ॉरवर्ड’ के भूखे
’रिट्वीट’ की दुनिया
ये दुनिया अगर मिल
भी जाए तो क्या है
ये दुनिया अगर मिल
भी जाए तो क्या है
 
हर एक ’पोस्ट’ बनावटी
हर एक ’कॉमेंट’ प्यासी
’मीडिया’ में उलझन
’फ़ॉलोवर्स’ में उदासी
ये दुनिया है या
’वर्चुअल आलम-ए- बदहवासी’
ये दुनिया अगर मिल
भी जाए तो क्या है
ये दुनिया अगर मिल
भी जाए तो क्या है
 
जहाँ एक ’ट्वीट’
है इंसान की हस्ती
ये बस्ती है मुर्दा
’चैट’ की बस्ती
जहाँ और जीवन
से है ’पोस्ट’ सस्ती
ये दुनिया अगर मिल
भी जाए तो क्या है
ये दुनिया अगर मिल
भी जाए तो क्या है
 
ग्रुप भटकती
है बदकार बनाकर
जवां ’हैशटैग’ सजते
है बाज़ार बनकर
जहाँ प्यार होता
है ’मीम’ बनाकर
ये दुनिया अगर मिल
भी जाए तो क्या है
ये दुनिया अगर मिल
भी जाए तो क्या है
 
जला दो इसे फूक
डालो ये ’व्हाट्सएप्प’
जला दो जला दो जला
दो इसे फूक डालो ये ’ट्विटर’
मेरे सामने से
हटा लो ये ’इंस्टाग्राम’
तुम्हारी है तुम ही
सँभालो ये ’फ़ेसबुक’
ये दुनिया अगर मिल
भी जाए तो क्या है
ये दुनिया अगर मिल
भी जाए तो क्या है.

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

अथ स्वरुचिभोज प्लेट व्यथा
|

सलाद, दही बड़े, रसगुल्ले, जलेबी, पकौड़े, रायता,…

अन्तर
|

पत्नी, पति से बोली - हे.. जी, थोड़ा हमें,…

अब बस जूते का ज़माना है
|

हर ब्राण्ड के जूते की  अपनी क़िस्मत…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

लघुकथा

रचना समीक्षा

पुस्तक समीक्षा

अनूदित आलेख

कविता

हास्य-व्यंग्य कविता

सामाजिक आलेख

पुस्तक चर्चा

स्मृति लेख

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं