नये वर्ष कुछ ऐसे आना
काव्य साहित्य | कविता त्रिलोक सिंह ठकुरेला1 Jan 2021 (अंक: 172, प्रथम, 2021 में प्रकाशित)
नये वर्ष
कुछ ऐसे आना,
रह रह ख़ुशियाँ बरसें।
रहे न कोई भूखा-नंगा,
रहे न दुःख का मारा,
सब में जगें नई आशाएँ,
दूर हटे अंधियारा,
रात-दिवस
उत्सव जैसे हों,
सबके जीवन हरसें।
भय, आतंक, निराशा, छल से
मुक्त रहे जग सारा,
करें प्रेम का बीजारोपण,
पनपे भाईचारा,
कभी अभाव
न हो जीवन में,
कभी न जन-मन तरसें।
चलता रहे प्रगति का पहिया,
सब ही मंज़िल पायें,
सबके ही सपने पूरे हों,
सब मिल मंगल गायें,
सारा विश्व
एक घर सा हो,
सुख की फसलें सरसें।
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