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चाँद का जादू

आकाश का विशाल दंगल
अनगिनत तारों के दर्शक करते
बेसब्री से प्रतिक्षा 
उस जग जादूगर की
बच्चे प्रफुल्लित 
उल्काओं से दौड़ते 
खेल रहे है इधर उधर
तभी सिर पर 
श्यामस्वर्ण रूमाल बाँधे
उस महाजादूगर का 
दंगल में प्रवेश 
तालियों से ज़ोरदार स्वागत
डमरु की डम डम से
ध्वनिमय हो उठा 
समूचा चराचर संसार
शुरू हुआ जादू का खेल 
अपनी संगीनी 
रजनी की काली साड़ी को
पलक झपकते ही बना दिया
दुग्ध धवल अतिसुन्दर
मात्र एक मुस्कान से 
कुमुदनियों पर डाला जादू
जैसे श्रीकृष्ण ने गोपियों पर
बूढ़े समुद्र में भी 
उत्पन्न कर दिया ज्वार
जो रोमांचित होकर निहार रहा है
आदिमित्र चकोर अचंभित सा 
देख रहा है अपलक
अचानक किसी ने कहा
ओह ! जादूगर की 
देह हो रही है छोटी
धीरे धीरे वह सींकिया 
शरीर का हो गया
फिर बिल्कुल ग़ायब
तो खुले गगन के 
नीचे सोने वाला 
बालक बोला घबराया सा 
ओ! जादूगर लौट आओ 
मेरा मन फिर से बहलाओ।

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