अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई कतआ

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

कुंठा

अमर को इस शहर में आए दो माह हो गए थे। ट्रांसफ़र के बाद हुई डिस्टर्बेंस से अब निजात मिलने लगी थी। जीवन धीरे-धीरे व्यवस्थित हो चला था।। बच्चों का स्कूल चालू हो गया था। मिनी और पिंटू क्रमशः आठ और ग्यारह साल के दो बच्चे थे। आम बच्चों की ही तरह थोड़े नटखट, थोड़े होशियार। राखी उन्हें अपनी पलकों की छाँव में रखती। उनके हर क्रियाकलाप पर नज़र रखती। यूँ तो बाज़ार से कुछ भी लाना होता तो वह अमर को फोन कर देती थी। अगर वह फोन न भी करे और बच्चों की कोई माँग न भी हो तो भी अमर कभी ऑफ़िस से ख़ाली हाथ नहीं आता था। एक पिता को शाम को ख़ाली हाथ घर नहीं जाना चाहिए, ख़ास कर जब घर में छोटे बच्चे हों। इस बात का अमर को एहसास था। नन्ही मिनी तो पापा के चक्कर लगाने लगती थी। शायद पीछे कुछ छुपाया हो। पिंटू भी प्रश्नवाचक निगाहों से उसे देखता। अमर को इस सब की इतनी आदत हो गई थी कि वह शाम को घर पहुँचता तो एक पॉलिथीन का कैरीबैग हमेशा उसके हाथ में होता जिसमें कभी आइसक्रीम, कभी चिप्स–बिस्किट तो कभी फल या कुछ और होता। आज भी यही होने वाला था, लेकिन घटनाक्रम कुछ बदल गया। 

पिछले एक साल से वह मंगलवार को व्रत रखने लगा था। लंच ब्रेक में सिर्फ़ चाय पीता। आज उसने चाय पीते हुए एक पत्रिका हाथ में ले ली। सभी साथी इधर-उधर निकल चुके थे। उपवास के कारण थोड़ी ऊर्जा कम लग रही थी इसलिए वह बाहर नहीं गया। चाय की चुस्कियाँ लेते हुए उसकी आँखें पृष्ठ पर बाएँ से दाएँ फिसलने लगीं। एक तस्वीर देख कर वे ठहर गईं . . . जैसे कि बहती नदी के बीच कोई चट्टान आ जाए। चित्र में समुद्र के बीच एक द्वीप दिख रहा था जो रंग-बिरंगा था। जितने टॉफ़ी, बिस्किट, आइसक्रीम और चिप्स आदि के पैकिट उसने अब तक ख़रीदे थे उन सबके रंगीन आकर्षक लाल, नीले, काले रैपरों और पन्नियों से बना यह द्वीप जहाज़ की तरह पानी की सतह पर बहा जाता था।। इस चित्र में वह इस तरह खो गया कि चित्र, चित्र न रहा चलचित्र हो गया . . . नीचे लिखी इबारत पढ़ कर उसके कान खड़े हो गए। प्रतिदिन सैकड़ों लोग समुद्र किनारे- बीच पर सैर-सपाटा करने जाते हैं। वहीं खाते-पीते हैं और पॉलिथीन के ख़ाली पैकिट वहीं छोड़ आते हैं। समुद्र में जब ज्वार आता है तो ये सारा कचरा लहरों के साथ समुद्र में चला जाता है। इस तरह की पन्नियों का यह कचरा एक साथ एक जगह पर द्वीप की शक्ल में समंदर की सतह पर तैरते रहता है। रंग-बिरंगी पन्नियों से बना द्वीप . . . क्या हैरानी की बात है! ये मुंबई वासी भी कितने लापरवाह हैं। अभी पिछली बारिश में बाढ़ की विभीषिका भुगत चुके हैं। जबकि बारिश थोड़ी ही हुई थी लेकिन इतने में ही शहर पानी-पानी हो गया था। महानगर का जल निकासी तंत्र अर्थात ड्रेनेज सिस्टम, जगह-जगह पॉलिथीन फँसी होने से बाधित हो गया था।

अमर ने मेज़ पर मुक्का मारते हुए कहा – ये पन्नियाँ हमें बर्बाद कर देंगी। लेकिन किया भी क्या जाए? ये इतनी सुविधाजनक जो हैं। हर जगह उपलब्ध हैं। 

उसने आराम करने की ग़रज़ से कुर्सी के टिकने वाले हिस्से पर दोनों हाथ रखे फिर उन पर सिर टिका लिया। सहज ही ऊपर दृष्टि ऊपर की ओर चली गई और दीवार पर लगी एक पेंटिंग पर जा कर स्थिर हो गई। पेंटिंग में किसी आदर्श ग्रामीण परिवेश को चित्रित किया गया था। अमर उस सुरम्य ग्राम में मानसिक प्रवेश कर गया। वाह! वे भी क्या दिन थे। सामान लेने के उद्देश्य से घर से निकलो तो थैला हाथ में लो। पुरानी पेंट के बने थैले, जो अम्मां के हाथों के कौशल से मज़बूत और डिज़ाइनदार बन जाते थे। वैसे बाबू जी जूट या सूती कपड़े से बने थैले भी बाज़ार से लाते ही थे। पहले इत्मिनान से सामान की सूची बनती। अम्मां रसोई का सामान लिखवातीं, फिर हम बच्चे अपनी आवश्यकताएँ गिनाते। अधिक समान होने पर एक से अधिक थैले ले जाने पड़ते। तब एक थैले में बाक़ी थैलों को तहा कर रख लिया जाता। तेल–घी के लिये ख़ाली डिब्बा या कैन ले जाना होता। अम्माँ की बाबू जी को, ख़ास हिदायत होती आँखें बंद कर के मत उठा लाना, सब सामान देख-भाल कर लाना। बाबू जी हाथ पर मल कर, फिर सूँघ कर देखते कि घी नक़ली है या असली। आसपास के गाँव से छोटे किसान और पशुपालक अपना घी व्यापारियों को बेच जाते थे। यह घी दुकानों से फिर घरों तक पहुँचता था। अब तो हमें पता ही नहीं होता हम जो रैपर में सजा हुआ खाद्य पदार्थ घर ले कर जा रहे हैं उसका कच्चा माल किस गाँव से आया होगा। सिर्फ़ उत्पादक की निर्माता कंपनी या ब्रांड का नाम ही पढ़ने में आता है।

“हा हा हा एक किलो भिंडी होती ही कितनी है शर्मा जी। ख़ाँमख़ाँ भाभी जी को परेशान करते हो, आप ही लेते जाना,“ ये मनोहर जी थे जो अमर के सहकर्मी थे और एक दूसरे साथी परेश कुमार शर्मा जी को अपनी बेशक़ीमती सलाह दे रहे थे। 

“लेकिन मैं सब्ज़ी के लिए थैला-वैला कुछ नहीं लाया घर से,“ परेश बाबू ने अपनी मजबूरी बताई। उनके स्कूटर की डिग्गी में एक थैला हमेशा पड़ा रहता था।

“पॉलीथीन के कैरीबैग में लेते जाइये। शर्मा जी! ज़माना कहीं का कहीं पहुँच गया और आप अभी तक थैले-थैलियों में ही अटके हैं," मनोहर जी, शर्मा जी का मज़ाक उड़ा रहे थे।

बातचीत के इस शोर ने अमर को वास्तविकता के धरातल पर लाने का काम किया। तस्वीर से उतर कर उसकी दृष्टि पुनः पत्रिका के चित्र पर ठहर गई जो कि अब पहले से भी ज़्यादा भयानक लग रहा था। शाम को जब अमर घर पहुँचा तो उसके हाथ में थोड़े से फल थे। बच्चे फल खाने में उतनी रुचि नहीं दिखा रहे थे जितनी चिप्स खाने में दिखाते हैं। इसीलिए बेमन से मिनी रसोई में जा कर माँ के पास खड़ी हो गई। माँ लौकी छील रही थीं। छिलके और कुछ बचा हुआ भोजन माँ ने एक पॉलीथिन में डाला और बोलीं, “मिनी ज़रा इसे डस्टबिन में डाल आओ।“

मिनी ठुनक कर बोली, “मुझ से कचरा फिंकवाती हो?“

माँ ने बड़े प्यार से कहा, "नहीं मेरी प्यारी गुड़िया, इसमें कचरा नहीं है। ये तो छिलके हैं और थोड़ा तुम्हारे टिफ़िन का बचा हुआ खाना है।“

मिनी ने देखा डस्टबिन के चारों ओर कचरा फैला हुआ था। लोग दूर से ही कचरा फेंका करते जो थोड़ा-बहुत बाहर भी गिर जाता था। मिनी को भी पास जाने में घिन आ रही थी। उसने भी दूर से ही पन्नी फेंकी। मगर वह डस्टबिन में न जा कर बाहर ही गिर गई। अमर बालकनी में खड़ा ये दृश्य देख रहा था। वह तुरन्त राखी पर चिल्लाया, “बच्ची को कचरा फेंकने मत भेजा करो।“

राखी ने फिर उसी तरह सफ़ाई दी, “कचरा नहीं है, छिलके और कुछ बचा हुआ खाना है। बस।“

अमर के मन में आज एक नई चेतना उमंग रही थी। उसने और तेज़ हो कर कहा, “ये तुमने क्या किया? खाने-पीने की चीज़ तो पन्नी में डाल कर नहीं फिंकवानी थी।“

“तुमको लगता है गाय पन्नी सहित खाना निगल जाएगी?”

“तो क्या गाँठ खोल कर खाना निकालेगी फिर खाएगी?”

“ऐसा कुछ नहीं होगा। मैंने पन्नी में सिर्फ़ एक अंटा लगाया है जो फेंकते ही खुल गया होगा। वैसे भी यहाँ गाय कम ही आती है,“ राखी ने अमर को आश्वस्त करने की कोशिश की।

अमर ने पुनः गर्दन घुमाई तो देखा मिनी नाक दबा कर वहाँ से भागी आ रही है। अगले दिन रविवार था। हफ़्ते भर की थकान मिटा कर सोमवार को जब अमर ऑफ़िस के लिए तैयार हुआ तो एकदम तरोताज़ा था। दोनों बच्चे स्कूल जा चुके थे। राखी ने चम्मच प्लेट की खटपट के बीच मेज़ पर नाश्ता लगाया और दोनों खाने बैठ गए।

अमर ने कहा, ”मैंने एक प्रण किया है, यानी रिसोल्यूशन।”

राखी ने पूछा, "कैसा रिसोल्यूशन?”

“यही कि आज से हम लोग बाज़ार से पॉलिथीन के बने कैरीबैग में कुछ भी नहीं लाएँगे।“

 राखी की हँसी निकल गई। मुख से निवाला गिरते-गिरते बचा। बोली, “तो कैसे लाएँगे?“

“घर से थैला ले कर निकलेंगे।"

“और अगर अचानक याद आए कि कुछ लेना है तो?”

“उसका भी तोड़ है। मैं हमेशा गाड़ी की डिग्गी में एक थैला रखूँगा। तुम ऐसा करने में मेरी मदद करोगी।“

राखी को अमर की आँखों में भावुकता नज़र आई। उसका लहज़ा ऐसा था कि हाँ कहना पड़ा। इन्हीं बातों के साथ अमर ने नाश्ता ख़त्म किया और ऑफ़िस के निकल पड़ा। अभी कुछ ही दूर निकला था कि लोगों का झुंड दिखाई दिया। अमर गाड़ी छोड़, वहाँ पहुँच गया। उसने देखा एक गाय मरी पड़ी थी। उसका पेट फूला हुआ था। मुँह से झाग निकल रही थी। गर्दन और शरीर अकड़ा हुआ था मानो असहनीय पीड़ा भोग कर मरी हो। लोग सवाल-जवाब में उलझे थे।

"ये यहाँ आई कैसे?”

“मौत ले आई!”

“ठीक कहते हो भाई। यहीं कचरे के आस-पास डोलते देखा था मैंने इसे।“

“भूखी होगी।“

“ऐसे निर्दयी लोग हैं। मवेशियों के खाना-खुराक का ध्यान नहीं रखते बस दुहना जानते हैं।“

“हो न हो जूठन-छिलका आदि के साथ-साथ गाय पन्नी भी खा गई। पन्नी इसकी आँतों में फँस कर रह गई होगी। पेट दर्द से तड़पी होगी। देखो… इसकी देह पर कितनी धूल-मिट्टी चिपकी है।“

“नगरनिगम वालों को फोन करो।”

“हाँ, हाँ फोन करो, आ कर उठा ले जाएँ।“

अमर अब घर की ओर लौट रहा था। लुटा हुआ सा। उदास… आत्मग्लानि से भरा हुआ … जैसे गाय को उसीने मार डाला हो। जाने क्यों उसे लग रहा था गाय ने वही पॉलिथीन खाई होगी जो उस दिन मिनी ने लौकी के छिलके और टिफ़िन का बचा हुआ खाना रख कर फेंकी थी… और जिसमें राखी ने सिर्फ़ एक अंटा लगाया …. और जो फेंकते ही खुल जानी थी मगर मिनी ने बजाय फेंकने के उसे सड़क पर ही छोड़ दिया। हाँ…. शायद… नहीं- नहीं पक्का….ये वही पॉलीथिन है। 

तो क्या उसे गऊ-हत्या का पाप लगेगा? उनको नहीं लगेगा जो पन्नी में समान बेचते हैं? इनको भी नहीं जो पॉलीथिन बनाते हैं? विचारों की यह शृंखला जन्म ही न लेती अगर वह आज फिर पन्नी में फल न लाया होता। वह स्वयं को एक हत्यारा मानने लगा …इतना बड़ा पातक! बचना कितना आसान। पॉलिथीन का बहिष्कार।

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

......गिलहरी
|

सारे बच्चों से आगे न दौड़ो तो आँखों के सामने…

...और सत्संग चलता रहा
|

"संत सतगुरु इस धरती पर भगवान हैं। वे…

 जिज्ञासा
|

सुबह-सुबह अख़बार खोलते ही निधन वाले कालम…

 बेशर्म
|

थियेटर से बाहर निकलते ही, पूर्णिमा की नज़र…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कहानी

गीत-नवगीत

कविता

नज़्म

किशोर साहित्य कविता

हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी

किशोर साहित्य कहानी

विडियो

ऑडियो

उपलब्ध नहीं