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भूत

 

आज गाँव में जहाँ भी देखो 
भूत ही भूत हैं
नशे के भूत हैं 
यमराज के दूत हैं
ये भूत अपना मायावी जाल बिछाते हैं
जिसमें युवा और किशोर लगातार फँसते जाते हैं
कर्म-धर्म-मर्यादा से इनको भटकाते
चोरी हिंसा लूटमार की राह चलाते
धीरे-धीरे देह में कर संक्रमण
कुछ दिन ख़ूब झुलाकर देते मृत्यु को निमंत्रण
नब्ज़-नब्ज़ का ख़ून चूस कमज़ोर बनाते
घर-घर में हैं चीख़-लड़ाई-शोर मचाते
आख़िर में ज़िंदगी का करते हैं भक्षण
आत्मा रोती निकल जाती है उसी क्षण
भारत-भविष्य पर संकट मँडराया है
इनके भयानक रूप ने हर बाप को डराया है
तांत्रिक-पड़े-पुजारी 
औ उठो हे! त्रिपुरारि
साधना-शक्ति-भस्म से
भस्म कर दो भूत भारी। 

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