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हंसदेह


(सॉनेट)
 
इस परिधि से पृथक प्राक्‌ पृथ्वी है नहीं
इस मयमंत समय का क्या अंत है कहीं? 
नहीं . . . नहीं अब नवजीवन नहीं स्वीकार
अति असह्य . . . अरण्यवास का अभिहार। 
 
भविष्य की भीति भस्म में बद्ध वर्तमान 
प्रत्यय एवं प्रणय में पराभूत . . . प्रतिमान
क्षणिक में क्यों नहीं क्षय होती क्षणदा? 
जैसे प्रेम में प्रतिहत प्रत्यूष की प्रमदा! 
 
नहीं स्वीकार नव्य नैराश्य से निविड़ता
अद्य अति असह्य है अतिशय अधीनता
उन्मुक्त-अध्वर-उन्मुक्त-अदिति उन्मुक्त 
हो, शीघ्र यह शरीर सरित हो पुनः शुक्त। 
 
हे, शब्द संवाहक! कहाँ है वह चित्रावली 
हंसदेह को अविस्मृत करती पत्रावली? 

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