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दिल से ग़ज़ल तक

प्रतिक्रियाएँ

 

हम सब गिलहरी की तरह राम सेतु के निर्माण में अपना अपना योगदान दे रहे हैं। उम्‍मीद है कि साहित्‍य की सुनहरी सुबह कभी वापस आयेगी। भाई पंकज से सुनहरे शब्द हमारे साथ साथ साहित्य की राह पर पथिक बनकर रौशन करेंगे, ऐसा विश्वास है। डॉ. दरवेश भारती जी, श्री आर.पी. शर्मा ‘महरिष’ जी की तरह ग़ज़ल की विधा के अनमोल माहिर उस्ताद हैं और उनसे मिलने पर मुझे हमेशा यही लगा है कि मैं ग़ज़ल के साथ गुफ़्तुगू कर रही हूँ। सरलता से, अपनी बयानी समझाने में और मार्गदर्शन करने में भी पीछे नहीं हटते। उन्हें मेरा विनम्र नमन।

(दरवेश भारती-ग़ज़ल के बहाने)

देवी नागरानी एक ऐसी विदेशी प्रवासिनी ग़ज़लकारा है जिनकी ग़ज़लें अंकुरित न्यू जर्सी में होती हैं, तो पल्लवित एवं पुष्पित भारत की उर्वरा धरती पर, जिसकी माटी से आती सौंधी सौंधी सुगंध मन को अति भाती एवं सुहाती है।

श्री आर.पी. शर्मा ‘महरिष’ (सहन-ए-दिल-2017) 

मुंबई की प्रख्यात ग़ज़लगो शाइरा, स्वर्गीय मरियम गज़ाला ने जो उद्गार व्यक्त किए थे वह यादगार बन कर रह गए हैं, यथा:

“जैसी कर्मठ, हिम्मतवान, और जांबाज़ वे महिला हैं, उनको देखकर हिंदुस्तानी नारी पर मुझे गर्व होता है। इनमें एहसास की नमी है और हालात की आँधियों से लड़ने की शक्ति भी। उनके शे’रों में उनके अनुभवों का निचोड़ है। अमेरिका जैसे देश में रहकर भी वे अपने संस्कार नहीं भूलीं। भारतीय महिला की गरिमा और महिमा का वो जीवंत उदाहरण है।”

मरियम गजाला-मुंबई (दिल से दिल तक-2008)

शाइर ज़िन्दगी की जटिलताओं के बीच अपने संघर्ष का इज़हार करने के लिए एक उपकरण ढूँढ़ता है जो देवी जी की ग़ज़लों में अभिव्यक्त हुई है। देवी जी तकनीकी नज़ाकतों से भी भली भाँति परिचित हैं।

महावीर शर्मा (दिल से दिल तक-2008)

“ये कैसी ख़ुशबू है सोच में जो
कि लफ़्ज़ बन कर गुलाब महका”

देवी नागरानी जी ने यह महकता हुआ शे’र तो कहा ही है, साथ ही ‘महक’ को लेकर उन्होंने एक अन्य शेर भी कहा है जो मा’नी-आफरीनी (अर्थ के चमत्कार) का एक उत्कृष्ट नमूना है तथा असाधारण एवं अलौकिक है।

आर.पी. शर्मा, पिंगलाचार्य ((दिल से दिल तक-2008)

रचनाओं से गुज़रते वक़्त थोड़ी-सी परेशानी होती है कि ऐसा क्यों लगता है कि रचनाकार सिर्फ़ बाग़ीचों से नहीं बियाबानों से भी गुज़रा है, कहीं-कभी उँगलियों की पोरों में काँटे भी चुभे हैं, संगमरमरी पाँवों में बिवाइयाँ भी फटी हैं और जब बड़ी शान्ति से, बग़ैर आँसू बहाए सिर्फ़ नम शब्दों में वे ज़िन्दगी के तज़ुर्बे बयान करती हैं तो आदर से सर झुक जाता है इस रचनाकार के प्रति जो आज एक विश्व-नागरिक है!

डॉ. राजम नटराजन पिल्लै (चराग़-ए-दिल 2007)

देवी नागरानी के पास भाषा है, भाव हैं और छंदों-बहरों का ज्ञान है इसीलिए उनकी ग़ज़लों में लय भी है, गेयता भी है और शब्द-सौन्दर्य भी है। वे उपयुक्त, शब्दों के अनुसार छंदों का और उपयुक्त छंदों के अनुसार शब्दों का प्रयोग करने में प्रवीण हैं इसीलिए उनके एक-एक शे’र में माधुर्य और सादगी निहित है। अपनी ग़ज़लों में देवी नागरानी एक कुशल राजगीर की तरह कौशलता दिखाती हैं।

प्राण शर्मा यू.के. (चराग़-ए-दिल 2007)

मैं देवी जी की ग़ज़लों का मुरीद हूँ। उनके विचारों की सरलता, जीवन का अनुभव और जिया गया दर्शन जब मिलते हैं तो सुन्दर और असरदार अशआर जन्म लेते हैं।

अनूप भार्गव (चराग़-ए-दिल 2007) 

देवी के गज़लों के हर शेर से बूँद बूँद टपकता है अहसासों का तेज़ाब जिसमें हर इन्सान पा सकता है अपने सवालों का जवाब। कैसे दीवारो-दर छत का अच्छा मकान, यादों की भरी दुनियाँ का क़ब्रिस्तान बन जाता है, और एक हिम्मतवर इन्सान उसमें किसी दिये से नहीं 'चराग़-ए-दिल' से रौशनी करके मुक़ाबला करता है। हर नई चोट को मुस्कराता-ज़ख़्म बना लेता है और इस ज़ख्मे दिल के बहते लहू की बूँद-बूँद से जो शेर कहता है उसमें प्रेम है, बेबसी है, मायूसी है, हौसला है, नसीहत है। ज़िन्दगी का हर रंग है,

डॉ. संगीता सहजवानी (चराग़-ए-दिल 2007)

ग़ज़ल संग्रह अपने कलेवर में ग़ज़ल विधा के गुलशन के रंगबिरंगे गुलदस्ते समोए हुए है। इस संग्रह की तमाम ग़ज़लों में कथ्य एवं शिल्प की आश्चर्यजनक विविधता है लेकिन आह्लाद तो इस बात ही का है कि इन सबमें कलात्मक कसावट एवम् अपने समय की बोझिलता से संवाद करने का उत्कट जीवट एवम् दुर्दमनीय साहस है। अपने वतन से दूर रहकर अपनी मिट्टी, अपने परिवेश एवम् अपनी जड़ों को न भूल पाना जैसे देवी नागरानी की शख़्सियत का बेशक़ीमती दिलचस्प पहलू है और यही उनकी शायरी का सबसे ताक़तवर किरदार भी।

विजय सिंह नाहटा (चराग़-ए-दिल 2007) 

“यूँ तराशा है उनको शिल्पी ने
जान सी पड़ गई शिलाओं में।”

इस फ़न को सीखने की चाह में देवीजी ने अपने शब्दों के स्वरूप में जान फूँकने का सफल प्रयास किया है और छोटे बहर में एक नाज़ुक ख़याल को बरपा करना एक काब़िल क़दम है। दुख दर्द से हमारी पहचान तो होती है पर इनका अंदाज़े-बयां देखिये, कहती हैं:

श्याम जुमानी (चराग़-ए-दिल 2007) 

पुस्तक की विषय सूची

  1. समर्पण
  2. दिल से ग़ज़ल तकः एक सन्दर्भ
  3. एक ख़ुशगवार सफ़र-दिल से ग़ज़ल तक
  4. दिल से ग़ज़ल तक अज़, देवी नागरानी
  5. मेरी ओर से—दिल से ग़ज़ल तक
  6. 1. सफ़र तय किया यारो दिल से ग़ज़ल तक
  7. 2. सागर के तट पे आते ही जिसने रची ग़ज़ल
  8. 3. सुन सको तो सुन लो उनकी दर्द जिनके दिल में है
  9. 4. न जाने क्यों हुई है आज मेरी आंख कुछ यूँ नम
  10. 5. ज़िन्दगी करना बसर उसके सिवा मुश्किल मगर 
  11. 6. ग़लत फ़हमी की ईंट छोटी थी फिर भी
  12. 7. माफ़ कैसे गुनह हुआ यारो
  13. 8. इल्म होगा उसको फिर तन्हाइयों का
  14. 9. हमसफ़र बिन है सफ़र ये जाने मंज़िल है कहाँ
  15. 10. ग़म कतारों में खड़े बाहर, मैं भीतर था निहाँ
  16. 11. कहाँ हैं गए सारे बच्चों के बच्चे
  17. 12. रौशनी की ये नदी बहती रहेगी रात भर
  18. 13. मिट्टी को देके रूप नया बुत बना दिया
  19. 14. राज़ की है बात जो भी राज़ उसको रहने दो
  20. 15. तेरे दर पर टिकी हुई है नज़र
  21. 16 . शमअ पर वो था जला बेवजह
  22. 17. ये हमराज़ को उसने बोला ही होगा 
  23. 18. बेवफ़ा से मुलाक़ात होती रही
  24. 19. कल जली जो ग़रीबों की थीं झुग्गियाँ
  25. 20. वो है रहता ख़फ़ा ख़फ़ा मुझसे
  26. 21. होगा विश्वास उन शफ़ाओं में
  27. 22. भीड़ में वो सदा रहा तन्हा
  28. 23. है ये अनजान सा सफ़र तो नहीं
  29. 24. शायरी इक इबादत है
  30. 25. हिफाज़त में हैं उसकी सब, इनायत की वो चादर है
  31. 26. फिर तो सब राज़ होंगे अयाँ देख लो
  32. 27. तेरे मेरे बीच वो नाता न था
  33. 29. कैसी ख़बरें हैं ये, क्या समाचार है
  34. 30. बादशाहत है कहीं और हैं कहीं गुमनामियाँ
  35. 31. क्या करता है तेरी मेरी, इन बातों में क्या रक्खा है
  36. 32. कहीं सर किसी का सलामत नहीं है 
  37. 33. शोर में भी ख़फ़ा है ये ख़ामोशियाँ
  38. 34. होती बेबस है ग़रीबी क्या करें
  39. 35. उसे ले आई जो शक्ति, वो आस्था की थी
  40. 36. नया रंग हो नया ढंग हो, नई आस और उमंग हो
  41. 37.  ईंट-गारा हर तरफ़ है घर नज़र आता नहीं
  42. 38. जब भी बँटवारे की सूरत आ गयी  
  43. 39. क्यों बात को बढ़ा के यूँ चर्चा बना दिया 
  44. 40. हैवानियत के सामने इन्सानियत झुके
  45. 41. साँसें जो ज़िन्दगी ने दी क्या जी रहे हैं हम
  46. 42. बने बेवफ़ा राज़दाँ देखो कैसे
  47. 43. ख़ुदी आस्माँ को लगी जब से छूने
  48. 45. लिखी बात दिल की ग़ज़ल के बहाने
  49. 46. जीत पाने की वजह कुछ और है
  50. 47. चमकती है बिजली यूँ बारिश के पहले 
  51. 48. इश्क में जब वो किसी का हो गया
  52. 49. वह किसी का भी क़र्ज़दार न था
  53. 50. लिखा जो तुमने क़लाम होगा
  54. 51. क्या ऐसा कोई किताब होगा
  55. 52. वहीं पे आता उबाल होगा
  56. 53. थरथराया रात भर तेरा अधर है
  57. 54. हो न बस में तेरे कुछ गर उसकी ख़्वाइश मत करो
  58. 55. तू न था कोई और था फिर भी
  59. 56. ख़ाली दिल का मकान था फिर भी
  60. 57. इन चरागों को जलना है अब रात भर
  61. 58. शीशे के घर में जो सदा रहते
  62. 59. अनकही जो बात दिल में रह गई
  63. 60. शिल्पी ने तराशी औरत 
  64. 61. मिट्टी को देके रूप नया बुत बना दिया
  65. 62. कोई बैठा मुझमें मुझे है बुलाता
  66. 63. काश उसका भी अपना घर होता
  67. 64. नये रंग निस दिन दिखाती है आँखें 
  68. 65. मिल गया उसको रास्ता होता
  69. 66. उजालों की बारात के हैं नज़ारे
  70. 67. बारहा उसके घर गया हूँ मैं 
  71. 68.  मुँह के बल फिर से गिर गया हूँ मैं
  72. 69. अँधेरी सी गली में कौन जाने घर ये किसका है 
  73. 70. अपनों की दोस्ती से डरते हैं
  74. 71.  मुस्कुराहट मेरी अब तो ढलते ढलते ढल गई
  75. 72. बाग़ में उनका तो शुमार न था 
  76. 73. आईना है दिखा रहा कोई
  77. 74. एक तुम हो एक मैं हूँ तेरी मेरी इक कहानी
  78. 75. नये साल का है आना मुबारक
  79. 76. ज़रा पत्थरो ध्यान देकर सुनो तुम
  80. 77. मुंतशिर हो ज़ेहन तो फिर कैसे कुछ लिख पाओगे
  81. 78. साँस का ईंधन जलाकर ज़िंदगी की लौ जले 
  82. 79. मेरी नब्ज़ छू के सुकून दे, वही एक मेरा हबीब है
  83. 80. लगती है मन को अच्छी, शाइर गज़ल तुम्हारी
  84. 81. दिल से दिल तक जुड़ी हुई है ग़ज़ल
  85. 82.  अनबुझी प्यास रूह की है ग़ज़ल
  86. 83. की शायरी भी हमने सजदे में सर झुकाकर
  87. 84. दर्द की तानें उड़ायेगी ग़ज़ल
  88. 85. सिमटती जो जाएगी लौ दर्दे-दिल की
  89. 86. जब भी बढ़ता है ग़म पास आती ग़ज़ल
  90. 87. क्या जाने मैंने क्यों लिखी, इस रेत पर ग़ज़ल
  91. 88. ये शाइरी क्या चीज़ है, अल्फ़ाज़ की जादूगरी
  92. 89. है बाग़ बाग़ मिरा दिल, ग़ज़ल की ख़ुशबू से
  93. 90. मेरे वतन की ख़ुश्बू 
  94. 91. लहू से लिखी वीरता की कहानी
  95. 92. यूँ अंधेरों में दीपक जलाओ
  96. 93. पहचानता है यारो, हमको जहान सारा
  97. 94. वो ही चला मिटाने नामो-निशाँ हमारा
  98. 95.  लोरी सुना रही है, हिंदी जुबाँ की ख़ुशबू
  99. 96. सुब्हदम तू जागरण के गीत गाती जा सबा
  100. 97. रहमत तेरी ए मौला अगर बेकराँ रहे
  101. 98. बहार आये तो आती है गुलों-गुलज़ार की ख़ुशबू  
  102. 99. जुदाई में हैं आँखें नम, वतन की याद आती है
  103. 100. क़ुरबान जाँ की जिसने वो भाई था हमारा
  104. 101. ‘हम हैं भारत के’ बताकर एक फिर से हो गए
  105. 102. उठो सपूतो देश के आओ 
  106. 103. अर्पण कर दें तन मन जान 
  107. 104. घरौंदे साहिलों पर जो बने हैं
  108. 106. इस देश से ग़रीबी हट कर न हट सकेगी
  109. 107. भूख भी आग के सिवा क्या 
  110. 108. दुलारा बापू
  111. 109. धरती माँ की लाज
  112. 110. भारत मेरा देश महान
  113. 111. आज़ादी के परवाने
  114. प्रतिक्रियाएँ
क्रमशः

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  1. दिल से ग़ज़ल तक
  2. भीतर से मैं कितनी खाली
  3. ऐसा भी होता है
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  6. दरिया–ए–दिल
  7. एक थका हुआ सच
  8. लौ दर्दे दिल की
  9. पंद्रह सिंधी कहानियाँ
  10. परछाईयों का जंगल
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  13. दरिया–ए–दिल
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